निहारिका मे सितारों का जन्म

January 23, 2007

ब्रम्हाण्डीय नर्सरी जहाँ तारों का जन्म होता है एक धूल और गैसों का बादल होता है जिसे हम निहारीका (Nebula) कहते है। सभी तारों का जन्म निहारिका से होता है सिर्फ कुछ दुर्लभ अवसरो को छोड़कर जिसमे दो न्यूट्रॉन तारे एक श्याम विवर बनाते है। वैसे भी न्यूट्रॉन तारे और श्याम विवर को मृत तारे माना जाता है।

निहारिका दो अलग अलग कारणों से बनती है। एक तो ब्रह्माण्ड की उतपत्ती से ही है। ब्रह्माण्ड के जन्म के बाद ब्रह्माण्ड मे परमाणुओं का निर्माण हुआ और इन परमाणुओं से धूल और गैस के बादलों का निर्माण हुआ। इसका मतलब यह है कि गैस और धूल जो इस तरह से बनी है उसका निर्माण तारे से नही हुआ है बल्कि यह ब्रह्माण्ड के निर्माण के साथ निर्मित मूल पदार्थ है।

निहारिका के निर्माण का दूसरा तरीका किसी विस्फोटीत तारे से बने सुपरनोवा से है। इस दौरान सुपरनोवा से जो पदार्थ उत्सर्जित होता है उससे भी निहारिका बनती है। इस दूसरे तरीके से बनी निहारिका का उदाहरण वेल(Veil) और कर्क (Crab) निहारिकाये है। ध्यान रखे कि निहारिकाओ का निर्माण इन दोनो तरीकों के मिश्रण से भी हो सकता है।

निहारिकाओ के प्रकार

उत्सर्जन निहारिका (Emission): इस तरह की निहारिकाये सबसे सुंदर और रंग बिरंगी होती है। ये नये बन रहे तारों से प्रकाशित होती है। विभिन्न तरह के रंग भिन्न तरह की गैसों और धूल की संरचना के कारण पैदा होते है। सामान्यतः एक बड़ी दूरबीन (8+ इंच) से उत्सर्जन निहारीका के लगभग सभी रंग देखे जा सकते है। तस्वीर मे सभी रंगो को देखने के लिये लम्बे-एक्स्पोजर से तस्वीर लेनी पढ़ती है।

चील निहारिका(M16) और झील निहारिका (Lagoon या M8) इस तरह की निहारिका के उदाहरण है। M16 मे तीन अलग अलग गैसों के स्तंभ देखे जा सकते है। यह तस्वीर हब्बल से ली गयी है और इसे साधारण दूरबीन से इतना स्पष्ट नही देखा जा सकता। इस स्तंभो के अंदर नये बने तारे है, जिनसे बहने वाली सौर वायु आसपास की गैस और धूल को दूर बहा रही है। इसमे सबसे बड़ा स्तंभ १० प्रकाश वर्ष उंचा और १ प्रकाश वर्ष चौड़ा है। इसकी खोज १७६४ मे हुयी थी और यह हमसे ७००० प्रकाश वर्ष दूर है।
चील निहारिका

चील निहारिका

निचले दी गयी M 8 की तस्वीर भी हब्बल दूरबीन से ली गयी है। यह ५२०० प्रकाश वर्ष दूर है। इसकी खोज १७४७ मे हुयी थी। इसका आकार १४०X६० प्रकाश वर्ष है।

M8 निहारिका

परावर्तन निहारिका (Reflection): यह वह निहारीकाये है जो तारों के प्रकाश को परावर्तित करती है, ये तारे या तो निहारिका के अंदर होते है या पास मे होते है। प्लेइडेस निहारिका इसका एक उदाहरण है। इसके तारों का निर्माण लगभग १००० लाख वर्ष पूर्व हुआ होगा। हमारे सूर्य का निर्माण ५०,००० लाख वर्ष पूर्व हुआ था। ये सितारे धीरे धीरे निहारिकाओ से बाहर आ रहे है।

NGC 1333 – परावर्तन निहारीका

श्याम निहारिका (Dark): ऐसे तो सभी निहारिकाये श्याम होती है क्योंकि ये प्रकाश उत्पन्न नही करती है। लेकिन विज्ञानी उन निहारिकाओ को श्याम कहते है जो अपने पीछे से आने वाले प्रकाश को एक दीवार की तरह रोक देती है। यही एक कारण है कि हम अपनी आकाशगंगा से बहुत दूर तक नही देख सकते है।

आकाशगंगा मे बहुत सारी श्याम निहारीकाये है, इसलिये विज्ञानियों को प्रकाश के अन्य माध्यमों का(x किरण, CMB) सहारा लेना होता है।
निचले चित्र मे प्रसिद्ध घोड़े के सर के जैसी निहारिका दिखायी दे रही है। यह निहारिका एक अन्य उत्सर्जन निहारिका IC434 के सामने स्थित है।

घोडे के सर जैसी निहारिका

ग्रहीय निहारिका (Planetary): इन निहारिकाओ का निर्माण उस वक्त होता है जब एक सामान्य तारा एक लाल दानव (red gaint)तारे मे बदल कर अपने बाहरी तहों को उत्सर्जित कर देता है। इस वजह से इनका आकार गोल होता है। चित्र मे बिल्ली की आंखो जैसी निहारिका(Cat’s Eye NGC 6543) दिखायी दे रही है। इस तस्वीर मे तारे के बचे हुये अवशेष भी दिखायी दे रहे है।

बिल्ली की आंखो वाली निहारिका

दूसरी तस्वीर नयनपटल निहारिका(Retina IC 4406) मे वृताकार चक्र उसके बाजु मे दिखायी दे रहा है। तारे का घूर्णन और चुम्बकिय क्षेत्र इसे वृताकार बना रहा है ना कि एक गोलाकार।
ग्रहीय यह शब्द निहारिकाओ के लिये सही नही है। यह शब्द उस समय से उपयोग मे आ रहा है जब युरेनस और नेप्च्यून की खोज जारी थी। उस समय हमारी आकाशगंगा के बाहर किसी और आकाशगंगा के अस्तित्व की भी जानकारी नही थी।

नयनपटल निहारिका

सुपरनोवा अवशेष: ये निहारिकाये सुपरनोवा विस्फोट के बाद बचे हुये अवशेष है। सुपरनोवा किसी विशाल तारे की मृत्यु के समय उनमें होने वाले भयानक विस्फोट की स्थिति को कहते है। कर्क (Crab) निहारीका इसका एक उदाहरण है।

कर्क निहारिका

सितारों के जन्म की प्रक्रिया

सितारों के जन्म के पहली स्थिति है , इंतजार और एक लम्बा इंतजार। धूल और गैस के बादल उस समय तक इंतजार करते है जब तक कोई दूसरा तारा या भारी पिंड इसमे कुछ हलचल ना पैदा कर दे! यह इंतजार हजारों लाखों वर्ष का हो सकता है।

जब कोई भारी पिंड निहारीका के पास से गुजरता है वह अपने गुरुत्वाकर्षण से इसमे लहरे और तरंगे उत्पन्न करता है। कुछ उसी तरह से जैसे किसी प्लास्टिक की बड़ी सी चादर पर कुछ कंचे बिखेर देने के बाद चादर मे एक किनारे पर से या बीच से एक भारी गेंद को लुढका दिया जाये। सारे कंचे भारी गेंद के पथ की ओर जमा होना शुरु हो जायेंगे। धीरे धीरे ये सारे कंचे चादर मे एक जगह जमा हो जाते है।

ठीक इसी तरह निहारिका मे धूल और गैस के कण एक जगह पर संघनित होना शुरु हो जाते है। पदार्थ का यह ढेर उस समय तक जमा होना जारी रहता है जब तक वह एक महाकाय आकार नही ले लेता।

इस स्थिति को पुर्वतारा( protostar) कहते है। जैसे जैसे यह पुर्वतारा बड़ा होता है गुरुत्वाकर्षण इसे छोटा और छोटा करने की कोशिश करता है, जिससे दबाव बढते जाता है, पुर्वतारा गर्म होने लगता है। जैसे साईकिल के ट्युब मे जैसे ज्यादा हवा भरी जाती है ट्युब गर्म होने लगता है।

जैसे ही अत्यधिक दबाव से तापमान १०,०००,००० केल्विन तक पहुंचता है नाभिकिय संलयन(Hydrogen Fusion) की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है। अब पुर्वतारा एक तारे मे बदल जाता है। वह अपने प्रकाश से प्रकाशित होना शुरू कर देता है। सौर हवाये बचे हुये धूल और गैस को सुदूर अंतरिक्ष मे धकेल देती है।


काल-अतंराल(Space-Time) की अवधारणा

January 12, 2007

श्याम विवर की गहराईयो मे जाने से पहले भौतिकि और सापेक्षतावाद के कुछ मूलभूत सिद्धांतो की चर्चा कर ली जाये !

काल-अतंराल(Space-Time) की अवधारणा

सामान्यतः अंतराल को तिन अक्षो मे मापा जाता है। सरल शब्दो मे लम्बाई, चौडाई और गहराई, गणीतिय शब्दो मे x अक्ष, y अक्ष और z अक्ष। यदि इसमे एक अक्ष समय को चौथे अक्ष के रूप मे जोड दे तब यह काल-अंतराल का गंणितिय माडल बन जाता है।

भौतिकि मे काल-अंतराल का अर्थ है काल और अंतराल संयुक्त गणितिय माडल। काल और अंतराल को एक साथ लेकर भौतिकि के अनेको गुढ रहस्यो को समझाया जा सका है जिसमे भौतिक ब्रह्माण्डविज्ञान तथा क्वांटम भौतिकि शामिल है।

सामान्य यांत्रिकी मे काल-अंतराल की बजाय अंतराल का प्रयोग किया जाता रहा है, क्योंकि काल अतराल के तिनो अक्षो मे यांत्रिकि गति से स्वतंत्र है। लेकिन सापेक्षतावाद के सिद्धांत के अनुसार काल को अंतराल के तिनो अक्षो से अलग नही किया जा सकता क्योंकि , काल किसी पिंड की प्रकाशगति के सापेक्ष गति पर निर्भर करता है।

काल-अंतराल की अवधारणा ने बहुआयामी सिद्धांतो(higher-dimensional theories) की अवधारणा को जन्म दिया है। ब्रम्हांड के समझने के लिये कितने आयामो की आवश्यकता होगी यह एक यक्ष प्रश्न है। स्ट्रींग सिद्धांत जहां १० से २६ आयामो का अनुमान करता है वंही M सिद्धांत ११ आयामो(१० आकाशीय(spatial) और १ कल्पित(temporal)) का अनुमान लगाता है। लेकिन ४ से ज्यादा आयामो का असर केवल परमाणु के स्तर पर ही होगा।

काल-अतंराल(Space-Time) की अवधारणा का इतिहास

काल-अतंराल(Space-Time) की अवधारणा आईंस्टाईन के १९०५ के विशेष सापेक्षतावाद के सिद्धांत के फलस्वरूप आयी है। १९०८ मे आईंस्टाईन के एक शिक्षक गणितज्ञ हर्मन मिण्कोवस्की आईंस्टाईन के कार्य को विस्तृत करते हुये काल-अतंराल(Space-Time) की अवधारणा को जन्म दिया था। मिंकोवस्की अंतरालकी धारणा यह काल और अंतराल को एकीकृत संपुर्ण विशेष सापेक्षतावाद के दो मूलभूत आयाम के रूप मे देखे जाने का प्रथम प्रयास था।मिंकोवस्की अंतरालकी धारणा यह विशेष सापेक्ष्तावाद को ज्यामितिय दृष्टी से देखे जाने की ओर एक कदम था, सामान्य सापेक्षतावाद मे काल अंतराल का ज्यामितिय दृष्टीकोण काफी महत्वपूर्ण है।

मूलभूत सिद्धांत

काल अंतराल वह स्थान है जहां हर भौतिकि घटना होती है : उदाहरण के लिये ग्रहो का सुर्य की परिक्रमा एक विशेष प्रकार के काल अंतराल मे होती है या किसी घुर्णन करते तारे से प्रकाश का उत्सर्जन किसी अन्य काल-अंतराल मे होना समझा जा सकता है। काल-अंतराल के मूलभूत तत्व घटनायें(Events) है। किसी दिये गये काल-अंतराल मे कोई घटना(Event), एक विशेष समय पर एक विशेष स्थिति है। इन घटनाओ के उदाहरण किसी तारे का विस्फोट या ड्रम वाद्ययंत्र पर किया गया कोई प्रहार है।

काल-अंतराल यह किसी निरिक्षक के सापेक्ष नही होता। लेकिन भौतिकि प्रक्रिया को समझने के लिये निरिक्षक कोई विशेष आयामो काप्रयोग करता है। किसी आयामी व्यवस्था मे किसी घटना को चार पुर्ण अंको(x,y,z,t) से निर्देशीत किया जाता है। प्रकाश किरण यह प्रकाश कण की गति का पथ प्रदर्शित करती है या दूसरे शब्दो मे प्रकाश किरण यह काल-अंतराल मे होनेवाली घटना है और प्रकाश कण का इतिहास प्रदर्शित करती है। प्रकाश किरण को प्रकाश कण की विश्व रेखा कहा जा सकता है। अंतराल मे पृथ्वी की कक्षा दिर्घ वृत्त(Ellpise) के जैसी है लेकिन काल-अंतराल मे पृथ्वी की विश्वरेखा हेलि़क्स के जैसी है।

सरल शब्दो मे यदि हम x,y,z इन तिन आयामो के प्रयोग से किसी भी पिंड की स्थीती प्रदर्शीत कर सकते है। एक ही प्रतल मे दो आयाम x,y से भी हम किसी पिंड की स्थिती प्रदर्शित हो सकती है। एक प्रतल मे x,y के प्रयोग से,पृथ्वी की कक्षा एक दिर्घ वृत्त के जैसे प्रतित होती है। अब यदि किसी समय विशेष पर पृथ्वी की स्थिती प्रदर्शित करना हो तो हमे समय t आयाम x,y के लंब प्रदर्शित करना होगा। इस तरह से पृथ्वी की कक्षा एक हेलिक्स या किसी स्प्रींग के जैसे प्रतित होगी। सरलता के लिये हमे z आयाम जो गहरायी प्रदर्शित करता है छोड दिया है।

काल और समय के एकीकरण मे दूरी को समय की ईकाइ मे प्रदर्शित किया जाता है, दूरी को प्रकाशगति से विभाजित कर समय प्राप्त किया जाता है।

काल-अंतराल अन्तर(Space-time intervals)

काल-अंतराल यह दूरी की एक नयी संकल्पना को जन्म देता है। सामान्य अंतराल मे दूरी हमेशा धनात्मक होनी चाहिये लेकिन काल अंतराल मे किसी दो घटनाओ(Events) के बीच की दूरी(भौतिकी मे अंतर(Interval)) वास्तविक , शुन्य या काल्पनिक(imaginary) हो सकती है।काल-अंतराल-अन्तरएक नयी दूरी को परिभाषीत करता है जिसे हम कार्टेशियन निर्देशांको मे x,y,z,t मे व्यक्त करते है।

s2=r2-c2t2

s=काल-अंतराल-अंतर(Space Time Interval)

c=प्रकाश गति

r2=x2+y2+z2

काल-अंतराल मे किसी घटनायुग्म (pair of event) को तिन अलग अलग प्रकार मे विभाजित किया जा सकता है

.समय के जैसे(Time Like)- दोनो घटनाओ के मध्य किसी प्रतिक्रिया के लिये जरूरत से ज्यादा समय व्यतित होना; s2 <0)

.प्रकाश के जैसे(Light Like)-(दोनो घटनाओ के मध्य अंतराल और समत समान है;s2=0)

.अंतराल के जैसे (दोनो घटनाओ के मध्य किसी प्रतिक्रिया के लिये जरूरी समय से कम समय का गुजरना; s2 >0)

घटनाये जिनका काल-अंतराल-अंतर ऋणात्मक है, एक दूसरे के भूतकाल और भविष्य मे है,

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विश्व रेखा(World Line) : भौतिकि के अनुसार किसी पिंड का काल-अंतराल के चतुर्यामी तय किये गये पथ को विश्व रेखा कहा जाता है।

हेलि़क्स : स्प्रिंग या स्क्रू के जैसा घुमावदार पेंचदार आकार।


श्याम पदार्थ(Dark Matter)

November 3, 2006

भौतिकि मे श्याम पदार्थ उस पदार्थ को कहते है जो विद्युत चुंबकिय विकिरण(प्रकाश, क्ष किरण) का उत्सर्जन या परावर्तन पर्याप्त मात्रा मे नही करता जिससे उसे महसूस किया जा सके किंतु उसकी उपस्थिति साधारण पदार्थ पर उसके गुरुत्विय प्रभाव से महसूस की जा सकती है। श्याम पदार्थ की उपस्थिती के लिये किये गये निरिक्षणो मे प्रमुख है, आकाशगंगाओ की घुर्णन गति, किसी आकाशगंगाओ के समुह मे आकाशगंगा की कक्षा मे गति और आकाशगंगा या आकाश्गंगा के समुह मे गर्म गैसो मे तापमान का वितरण है। श्याम पदार्थ की ब्रम्हाण्ड के आकार ग्रहण प्रक्रिया() तथा महाविस्फोट केन्द्रीय संश्लेषण(Big Bang Ncleosynthesis)()प्रमुख भूमिका रही है। श्याम पदार्थ का प्रभाव ब्रम्हांडीय विकीरण के फैलाव और वितरण मे भी रहा है। यह सभी सबूत हमे यह बताते है कि आकाशगंगाये, आकाशगंगा समुह(Cluster) और ब्रम्हांड मे पदार्थ की मात्रा निरक्षित मात्रा से कही ज्यादा है, जो कि मुख्यतः श्याम पदार्थ है जिसे देखा नही जा सकता।

श्याम पदार्थ का संयोजन() अभी तक अज्ञात है लेकिन यह नये मुलभूत कणो जैसे विम्प (WIMP)() और एक्सीआन(Axions)(), साधारण और भारी न्युट्रीनो , ड्वार्फ तारो और ग्रहो(MACHO)() तथा गैसो के बादल से बना हो सकता है। हालिया सबूतो के अनुसार श्याम पदार्थ की संरचना नये मूलभूत कणो जिसे नानबायरोनिक श्याम पदार्थ(nonbaryonic dark matter) कहते है से होना चाहिये।

श्याम पदार्थ की मात्रा और द्रव्यमान साधारण दिखायी देने ब्रम्हाण्ड से कही ज्यादा है। अभी तक की खोजो मे ब्रम्हाण्ड मे बायरान और विकीरण का घन्त्व लगभग १ हायड्रोजन परमाणु प्रति घन मिटर है। इसका लगभग ४% उर्जा घन्तव देखा जा सकता है। लगभग २२% भाग श्याम पदार्थ का है ,बचा ७४% भाग श्याम उर्जा का है। कुछ मुश्कील से जांचे जा सकने वाले बायरानीक पदार्थ भी श्याम पदार्थ बनाते है लेकिन इसकी मात्रा काफी कम है। इस लापता द्रव्यमान की खोज भौतिकी और ब्रम्हाण्ड विज्ञान के सबसे बडे अनसुलझे रहस्यो मे से एक है।

सबसे पहले श्याम पदार्थ के बारे मे सबूत देने वाले कैलीफोर्निया ईन्स्टीट्युट आफ टेक्नालाजी के एक स्वीस विज्ञानी फ्रीटज झ्वीस्की थे। उन्होने कोमा आकाशगंगा समुह पर वाइरियल प्रमेय() का उपयोग किया और उन्हे लापता द्र्व्यमान का ज्ञान हुआ। झ्वीस्की ने कोमा आकाशगंगा समुह के किनारे की आकाशगंगाओ की गति के आधार पर कोमा आकाशगंगा समुह के द्रव्यमान की गणना की। जब उन्होने इस द्रव्यमान की तुलना आकाशगंगाओ और उनकी आकाश गंगा समुह (Cluster) की कुल प्रकाश दिप्ती के आधार पर ज्ञात द्रव्यमान से की तो उन्हे पता चला कि वहां पर अपेक्षा से ४०० गुना ज्यादा द्रव्यमान है। इस आकाशगंगा समुह मे दिखायी देने वाली आकाशगंगाओ का गुरुत्व इतनी तेज कक्षा के कारण काफी कम होना चाहिये, इन आकाशगंगाओ के पास अपने संतुलन के लिये कुछ और द्रव्यमान होना चाहिये। इसे लापता द्रव्यमान रहस्य(Missisng Mass Problem) कहा जाता है। झ्वीस्की ने इन अनुमानो के आधार पर कहा कि वहां पर कुछ अदृश्य पदार्थ होना चाहीये जो इस आकाशगंगा समुह को उचित द्रव्यमान और गुरुत्व प्रदान कर रहा है जिससे यह आकाशगंगा समुह का विखण्डन नही हो रहा है।

श्याम पदार्थ के बारे मे और सबुत आकाशगंगाओ की गति के अध्यन से प्राप्त हुये। इनमे से काफी आकाशगंगा एकसार है, इन पर वाइरियल प्रमेय लगाने पर इनकी कुल गतिज उर्जा(Kinetic Energy) इनके कुल गुरुत्व उर्जा का आधा होना चाहीये। प्रायोगिक नतिजो के अनुसार गतिज उर्जा इससे कहीं ज्यादा पायी गयी। आकाशगंगा के दृश्य द्रव्यमान के गुरुत्व को ही लेने पर , आकाशगंगा के केन्द्र से दूर तारो की गति वाइरियल्ल प्रमेय द्बारा गणित गति से कहीं ज्यादा पायी गयी। गैलेटीक घुर्णन वक्र कक्षा () जो घुर्णन गति और आकाशगंगा केन्द्र की व्याख्या करती है, इसे दृश्य द्रव्यमान से समझाया नही जा सकता। दृश्य पदार्थ आकाशगंगा समुह का एक एक छोटा सा ही हिस्सा है मान लेने पर इसकी व्याख्या की जा सकती है। आकाशगंगाये एक लगभग गोलाकार श्याम पदार्थ से बनी प्रतित होती है जिनके मध्य मे एक तश्तरी नुमा दृश्य पदार्थ है। कम चमकदार सतह वाली ड्वार्पह आकाशगंगाये श्याम पदार्थ के अध्यन के लिये जरूरी सुचनाओ का महत्वपूर्ण श्रोत है क्योंकि इनमे असाधारण रूप से साधारण पदार्थ और श्याम पदार्थ का अनुपात कम है और इनके केन्द्र मे कुछ ऐसे चमकिले तारे है जो बाहरी छोर पर स्थित तारो की कक्षा को विकृत कर देते है।

अगस्त २००६ मे प्रकाशित परिणामो के आधार पर श्याम पदार्थ , साधारण पदार्थ से अलग पाया गया है। यह परिणाम बुलेट आकाशगंगा समुह (Bullet Cluster) जो दो अलग अलग आकाशगंगा समुह की १५०० लाख वर्ष पहले हुयी भिडंत से बना है के अध्यन से मिले है।

आकाशगंगा की घुर्णन वक्र कक्षा

झ्वीस्की के निरिक्षण के ४० वर्षो बाद तक ऐसा कोई निरिक्षण नही मिला जिसमे प्रकाश और द्रव्यमान का अनुपात ईकाई से अलग हो। अधिक प्रकाश और द्रव्यमान का अनुपात श्याम पदार्थ की उपस्थिती दर्शाता है। १९७० के दशक की शुरूवात मे कार्नेगी इन्सीट्युट आफ वाशिण्गटन के एक विज्ञानी वेरा रूबीन ने एक नये ज्यादा संवेदनशील स्पेक्ट्रोग्राफ (जो कुंड्ली नुमा आकाशगंगा के सीरे की गति कक्षा को ज्यादा सही तरीके से माप सकता था) की मदद से कुछ नये परिणाम प्राप्त किये। इस विस्यमयकारी परिणाम के अनुसार किसी कुंडली नुमा आकाशगंगा के अधिकतर तारे एक जैसी गति से आकाशगंगा के केन्द्र की परिक्रमा करते है। इसका अर्थ यह था कि द्रव्यमान घनत्व अधिकतर तारो(आकाशगंगा केन्द्र) से दूर भी एकसार था। इसका एक अर्थ यह भी था कि या तो न्युटन का गुरुत्व नियम हर अवस्था मे लागु नही किया जा सकता या इन आकाशगंगा का ५०% से अधिक द्रव्यमान श्याम पदार्थ से बना है। इस परिणाम की पहले खिल्ली उडायी गयी लेकिन बाद मे ये मान लिया गया कि आकाशगंगा का अधिकतर भाग श्याम पदार्थ से बना है।

बाद मे इसी तरह के परिणाम इलीप्स के आकार की आकाशगंगाओ मे भी पाये गये। रूबीन के द्वारा ५०% प्रतिशत द्रव्यमान की गणना अब बडकर ९५% हो गयी है।

कुछ ऐसे भी आकाशगंगा समुह है जो श्याम उर्जा की उपस्थिती नकारते है। ग्लोबुलर आकाशगंगा समुह एक ऐसा ही आकाशगंगा समुह है। हाल ही मे कार्डीफ विद्यापिठ के विज्ञानीयो ने एक श्याम उर्जा की बनी हुयी आकाशगंगा की खोज की है। यह कन्या आकाशगंगा समुह (Virgo Cluster) से ५० प्रकाशवर्ष दूर है, इस आकाशगंगा का नाम VIRGOHI21 है। इस आकाशगंगा मे तारे नही है। इसकी खोज हायड्रोजन की रेडीयो तरण्गो के निरिक्षण से हुयी है। इसके घुर्णन कक्षा के अध्यन से वैज्ञानिको का अनुमान है कि इसमे हायडोजन के द्रव्यमान से १००० गुना ज्यादा श्याम पदार्थ है। इसका कुल द्रव्यमान हमारी आकाशगंगा मंदाकिनी के द्रव्यमान का दंसवा भाग है। हमारी आकाशगंगा मंदाकिनी मे भी दृस्य पदार्थ के द्रव्यमान से १० गुना ज्यादा श्याम पदार्थ मौजुद है।

श्याम पदार्थ आकाशगंगा समुह पर भी प्रभाव डालता है। एबेल २०२९ आकाशगंगा समुह जो की हजारो आकाशगंगाओ से बना है, इसके आसपास चारो ओर गरम गैसो और श्याम पदार्थ का आवरण फैला हुआ है। इस श्याम पदार्थ का द्रव्यमान १०१४ सुर्यो के द्रव्यमान के बराबर है। इस आकाशगंगा समुह के केन्द्र मे एक इलीप्स के आकार की आकाशगंगा (जो कुछ आकाशगंगाओ के मिलन से बनी है) है। इस आकाशगगां समुह की कक्षा की गति श्याम उर्जा निरिक्षणो के अनुरूप है।

श्याम उर्जा के निरिक्षण के लिये दूसरा साधन गुरुत्विय वक्रता (gravitational lensing)() है। यह प्रक्रिया सापेक्षतावाद के सिद्धांत के द्रव्यमान गणना पर आधारित है जो गतिज उर्जा पर निर्भर नही करती है। यह पूरी तरह श्याम उर्जा के द्रव्यमान की गणना के लिये स्वतण्त्र सिद्धांत है। एबेल १६८९ के आसपास प्रबल गुरुत्विय वक्रता पायी गयी है। इस वक्रता को माप कर उस आकासगंगा समुह का द्रव्यमान ज्ञात किया जा सकता है। द्रव्यमान और प्रकाश के अनुपात से स्याम पदार्थ की उपस्थिती जांची जा सकती है।

श्याम पदार्थ की संरचना

अगस्त २००६ मे श्याम पदार्थ को प्रकाशीय पद्धती से जांच लिया गया है लेकिन अभी भी यह अटकलो के घेरे मे है। आकाशगंगा घुर्णन वक्र कक्षा, गुरुत्विय वक्रता, ब्रम्हांडीय पदार्थ का विभीन्न आकार बनाना(Structure Formation), आकाश गंगा समुह मे बायरान की अल्प उपस्थिती जैसे सबुत यह बताते है कि ८५-९०% पदार्थ विद्युत चुंबकिय बल से प्रतिक्रिया नही करता है। यह श्याम पदार्थ अपने गुरुत्विय बल से अपनी मौजुदगी दर्शाता है। इस श्याम पदार्थ की निम्नलिखित श्रेणीया हो सकती है।

बायरानीक श्याम पदार्थ

अबायरानीक श्याम पदार्थ (यह तिन तरह का हो सकता है)

.अत्याधिक गर्म श्याम पदार्थ

.गर्म श्याम पदार्थ

.शितल श्याम पदार्थ

अत्याधिक गर्म श्याम पदार्थ मे कण सापेक्ष गति(relativistic velocities)(१०) से गतिमान रहते है। न्युट्रीनो इस तरह का कण है। इस कण का द्रव्यमान कम होता है और इस पर विद्युत चुम्बकिय बल और प्रबल आणवीक बल का प्रभाव नही पड्ता है। इनकी जांच एक दूष्कर कार्य है। यह भी श्याम उर्जा के जैसा है। लेकिन प्रयोग यह बताते है कि न्युट्रीनो श्याम पदार्थ का एक बहुत ही छोटा हिस्सा है। गर्म श्याम पदार्थ महाविस्फोट के सिद्धांत पर खरे नही उतरते है लेकिन इनका आस्तित्व है।

शितल श्याम पदार्थ जिसके कण सापेक्ष गति नही करते है। बडे द्रव्यमान वाले पिंड जैसे आकाशगंगा के आकार के श्याम विवरो को गुरूतविय वक्रता के आधार पर अलग कर सकते है। संभव उम्मीदवारो मे सामान्य बायरोनिक पदार्थ वाले पिड जैसे भूरे ड्वार्फ या माचो (MACHO भारी तत्वो के अत्यंत घन्तव वाले पिंड) भी है। लेकिन महाविस्फोट के आणविक संयुग्मन (big bang nucleosynthesis ) प्रक्रिया ने विज्ञानीयो को यह विश्वास दिला दिया है कि MACHO जैसे बायरानिक पदार्थ कुल श्याम पदार्थ के द्रव्यमान का एक बहुत ही छोटा हिस्सा हो सकते है।

आज की स्थिती मे श्याम पदार्थ की संरचना अबायरानिक कणो, इलेक्ट्रान, प्रोटान, न्युट्रान, न्युट्रीनो जैसे कणो के अलावा, एक्सीआन, WIMP(Weakly Interacting Massive Particles कमजोर प्रतिक्रिया वाले भारी कण जिसमे न्युट्रलिनो भी शामील है), अचर न्युट्रीनो (sterile neutrinos)(१०) से बनी हुयी मानी जाती है। इनमे से कोई भी कण साधारण भौतिकी की आधारभूत संरचना का कण नही है।

श्याम पदार्थ की संरचना के उम्मीदवार कणो की खोज के लिये प्रयोग जारी है।

अगले अंक मे श्याम विवर

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()आकार ग्रहण प्रक्रिया(Structure Formation)- यह ब्रम्हांड निर्माण भौतिकि का एक मुलभूत अनसुलझा रहस्य है। ब्रम्हाण्ड जैसा की हम ब्रम्हांडीय विकीरण(Cosmic Microvave Background Radiation) के अध्यन से जानते है, एक अत्यंत घने , अत्यंत गर्म बिन्दू के महाविस्फोट से बना है। लेकिन आज की स्थिती मे हर आकार के आकाशिय पिंड मौजूद है, ग्रह से लेकर आकाशगंगाओ से आकार से गैसो के बादल (Cluster) के दानवाकार तक के है। एक शुरूवाती दौर के समांगी ब्रम्हांड से आज का ब्रम्हांड कैसे बना ?

() महाविस्फोट केन्द्रीय संश्लेषण(Big Bang Ncleosynthesis) : हायड्रोजन(H1) को छोडकर अन्य तत्वो के परमाणू केन्द्रक निर्माण की प्रक्रिया।

() साधारण पदार्थ(Byaronic Matter) मुख्यतः इलेक्ट्रान, न्युट्रान और प्रोटान से बना होता है। इलेक्ट्रान, न्युट्रान और प्रोटान को बायरान भी कहते है।

() विम्प(WIMP:weakly interacting massive particles): अभी तक ये कालप्नीक कण है। ये कण कमजोर आणविक बल और गुरूत्वाकर्षण बल से ही प्रतिक्रिया करते है। इनका द्रव्यमान साधारण कणो(बायरान) की तुलना मे काफी अधिक होता है। ये साधारण पदार्थ से प्रतिक्रिया नही करते जिससे इन्हे देखा और महसूस नही किया जा सकता।

()एक्सीआन(Axions): यह भी एक कालप्नीक मूलभूत कण है, इन पर कोई विद्युतिय आवेश नही होता है और इनका द्रव्यमान काफी कम १०-६ से १०- eV/c2 के बीच होना चाहिये। मजबूत चुम्बकिय बलो की उपस्थिती मे इन्हे फोटान मे बदल जाना चाहिये।

() माचो(अत्यंत विशाल सघन प्रकाशित पिंड)(MACHO: Massive compact halo object): ये उन पिण्डो के लिये दिया गया नाम है जो श्याम पदार्थ की उपस्थिती को समझने मे मदद कर सकते है। ये श्याम वीवर (Black Hole) , न्युट्रान तारे, सफेद ड्वार्फ या लाल ड्वार्फ भी हो सकते है।

()वाइरियल प्रमेय अदिक जानकारे के लिये देखें : http://en.wikipedia.org/wiki/Virial_theorem

() देखें http://en.wikipedia.org/wiki/Galactic_rotation_curve

()गुरुत्विय वक्र (gravitational lensing) :प्रकाश किरणो के मे उस समय आई वक्रता होती है जब ये किसी गुरुत्विय लेंस से गुजरती है। ये गुरुत्विय लेंस श्याम विवर भी हो सकता है।

(१०)अचर न्युट्रीनो (sterile neutrinos): जिन न्युट्रीनो पर कीसी भी मूलभूत बलो का प्रभाव नही होता है।


श्याम उर्जा (Dark Energy)

November 2, 2006

यह विषय एक विज्ञान फैटंसी फिल्म की कहानी के जैसा है। श्याम उर्जा(Dark Energy), एक रहस्यमय बल जिसे कोई समझ नही पाया है, लेकिन इस बल के प्रभाव से ब्रम्हाण्ड के पिंड एक दूसरे से दूर और दूर होते जा रहे है।

यह वह काल्पनिक बल है जिसका दबाव ऋणात्मक है और सारे ब्रम्हाण्ड मे फैला हुआ है। सापेक्षतावाद के सिद्धांत के अनुसार , इस ऋणात्मक दबाव का प्रभाव गुरुत्वाकर्षण के विपरीत प्रभाव के समान है।

श्याम उर्जा १९९८ मे उस वक्त प्रकाश मे आयी , जब अंतरिक्ष विज्ञानीयो के २ समुहो ने विभीन्न आकाशगंगाओ मे विस्फोट की प्रक्रिया से गुजर रहे सितारो(सुपरनोवा)() पर एक सर्वे किया। उन्होने पाया की ये सुपरनोवा की प्रकाश दिप्ती अपेक्षित प्रकाश दिप्ती से कम है, इसका मतलब यह कि उन्हे जितने पास होना चाहिये थी , वे उससे ज्यादा दूर है। इसका एक ही मतलब हो सकता था कि ब्रम्हांड के विस्तार की गति कुछ काल पहले की तुलना मे बढ गयी है!(लाल विचलन भी देंखे)

इसके पहले तक यह माना जाता था कि ब्रम्हांड के विस्तार की गति धीरे धीरे गुरूत्वाकर्षण बल के कारण कम होते जा रही है। लेकिन सुपरनोवा के विश्लेषण से ज्ञात हुआ कि कोई रहस्यमय बल गुरूत्वाकर्षण बल ले विपरीत कार्य कर ब्रम्हाण्ड के विस्तार को गति दे रहा है। यह एक आश्चर्यजनक , विस्यमयकारी खोज थी।

पहले तो वैज्ञानिको को इस प्रयोग के परिणामो की विश्वनियता पर ही शक हुआ। उन्हे लगा की सुपरनोवा की प्रकाशदिप्ती किसी गैस या धूल के बादल के कारण कम हो सकती है या यह भी हो सकता है कि सुपरनोवा की प्रकाश दिप्ती के बारे मे वैज्ञानिको का अनुमान ही गलत हो। लेकिन उपलब्ध आंकडो को सावधानी पुर्वक जांचने के बाद पता चला कि कोई रहस्यमय बल का आस्तित्व जरूर है जिसे आज हम श्याम उर्जा (Dark Energy) कहते है।

वैसे यह विचार एकदम नया नही है। आईंस्टाईन ने अपने सापेक्षतावाद के सिद्धांत(Theory of Relativity) मे एक प्रति गुरुत्वाकर्षण प्रभाव को दर्शाने वाला बल ब्रम्हांडिय स्थिरांक (Cosmological Constant) का समावेश किया है। लेकिन आईन्स्टाईन खुद और बाद मे अन्य विज्ञानी भी मानते थे कि यह ब्रम्हांडिय स्थिरांक (Cosmological Constant) एक गणितिय सरलता के लिये ही है जिसका वास्तविकता से काफी कम रिश्ता है। १९९० तक किसी ने भी नही सोचा था कि यह ब्रम्हांडिय स्थिरांक एक सच्चाई भी हो सकता है।

दक्षिण केलीफोर्निया विश्वविद्यालय की वर्जीनिया ट्रीम्बल कहती हैश्याम उर्जा को प्रति गुरुत्वाकर्षण कहना सही नही है। यह बल गुरुत्वाकर्षण के विपरीत कार्य नही करता है। यह ठिक वैसे ही व्यव्हार करता है जैसे सापेक्षकतावाद के सिद्धांत के उसे अनुसार उसे करना चाहिये। सापेक्षतवाद के सिद्धांत के अनुसार इस बल का दबाव ऋणात्मक है।

उनके अनुसारमान लिजिये ब्रम्हाण्ड एक बडा सा गुब्बारा है। जब यह गुब्बारा फैलता है, तब विस्तार से इस श्याम उर्जा का घनत्व कम होता है और गुब्बारा थोडा और फैलता है। ऐसा इसलिये कि श्याम उर्जा से ऋणात्मक दबाव() उत्पन्न होता है। जबकि गुब्बारे के अंदर यह गुब्बारे को खिंचने की कोशीश कर रहा है, घनत्व जितना कम होगा यह गुब्बारे को अंदर की ओर कम खिंच पायेगा जिससे विस्तार और ज्यादा होगा। यही प्रक्रिया ब्रम्हाण्ड के विस्तार मे हो रही है।”

सुपरनोवा का उदाहरण यह बताता है कि ब्रम्हांड के विस्तार का त्वरण(acceleration) ५ खरब वर्ष पहले शूरू हुआ था। उस समय आकाशगंगाये इतनी दूरी पर जा चुकी थी कि गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव से श्याम उर्जा का प्रभाव ज्यादा हो चुका था।(ध्यान रहे गुरुत्वाकर्षण बल विभिन्न पिण्डो अपनी तरफ खिंचता है, श्याम उर्जा वही उन्हे एक दूसरे से दूर ले जाती है।) उस समय के पश्चात श्याम उर्जा के प्रभाव से ब्रम्हांड के विस्तार की गति बढते जा रही है। अब ऐसा प्रतित हो रहा है कि यह गति अनिश्चित काल के लिये बढते जायेगी। इसका मतलब यह है कि आज की तुलना मे खरबो वर्षो बाद हर आकाशिय पिंड एक दूसरे तेज और तेज दूर होते जायेगा और हम अकेले रह जायेंगे।

श्याम उर्जा के इस नये सिद्धांत ने वैज्ञानिको को थोडा निराश किया है, उन्हे एक अप्रत्याशीत और एकदम नये ब्रम्हांड की अवधारणा को स्विकारना पडा है। वे पहले ही एक श्याम पदार्थ(Dark Matter) की अवधारणा को मान चुके है। आज की गणना के अनुसार यह श्याम पदार्थ , वास्तविक पदार्थ से कहीं ज्यादा है। यह एक ऐसा पदार्थ है जिसे आज तक किसी प्रयोगशाला मे महसूस नही किया गया है लेकिन इसके होने के सबुत पाये गये है। अब श्याम उर्जा का आगमन जख्मो पर नमक छिडकने के समान है।

अंतरिक्ष विज्ञानीयो के अनुसार ब्रम्हांड तिन चिजो से बना है साधारण पदार्थ , श्याम पदार्थ और श्याम उर्जा। हम सिर्फ साधारण पदार्थ के बारे मे जानते है। ब्रम्हाडं का ९०-९५% भाग ऐसे दो पदार्थो से बना है जिसके बारे मे कोई नही जानता , यह सुनकर आप कैसा महसूस करते है ?

क्वांटम भौतिकी को समझने के लिये दो पिढीया लग गयी। यह समय उस विज्ञान के बारे मे था जिसे हम प्रयोगशाला मे प्रयोग कर के सिद्ध कर सकते थे। एक ऐसे पदार्थ और उर्जा को समझना जिसे देखा नही जा सकता, प्रयोगशाला मे बनाया नही जा सकता कितना कठीन है ?

लेकिन श्याम उर्जा ने एक ऐसे रहस्य को सुलझा दिया है जो ब्रम्हांडिय विकीरण ने उत्पन्न किया था। ब्रम्हाण्डीय विकीरण की तिव्रता के विचलन पर हाल ही के प्रयोगो से प्राप्त आंकडे ब्रम्हांड के अनंत विस्तार के सिद्धांत का प्रतिपादन करते हैं। लेकिन वैज्ञानिको के लिये इस विस्तार के पिछे कारणीभूत बल एक पहेली था, श्याम उर्जा शायद इसी का हल है।

श्याम उर्जा का आस्तित्व चाहे किसी भी रूप मे गणना की गयी ब्रम्हांड की ज्यामिती और ब्रम्हांड के कुल पदार्थ की मात्रा के संतुलन के लिये जरूरी है। ब्रम्हांडीय विकीरण (cosmic microwave background (CMB)), की गणना यह संकेत देती है की ब्रम्हांड लगभग सपाट(Flat) है। ब्रम्हाण्ड के इस आकार के लिये , द्रव्यमान और उर्जा का अनुपात एक निश्चित क्रान्तिक घनत्व(Critical Density) के बराबर होना चाहिये। ब्रम्हाण्ड के कुल पदार्थ की मात्रा (बायरान और श्याम पदार्थ को मिला कर), ब्रम्हांडीय विकीरण की गणना के अनुसार क्रान्तिक घनत्व का सिर्फ ३०% ही है। इसका मतलब यह है कि श्याम उर्जा ब्रम्हांड के कुल द्रव्यमान का ७०% होना चाहीये।

हाल के अध्यन से ज्ञात हुआ है कि ब्रम्हांड का निर्माण ७४% प्रतिशत श्याम उर्जा से, २२% श्याम पदार्थ से और सिर्फ ४% साधारण पदार्थ से हुआ है। और हम इसी ४% साधारण पदार्थ के बारे मे जानते है।

श्याम उर्जा की प्रकृती एक सोच का विषय है। यह समांगी, कम घन्तव का बल है जो गुरुत्वाकर्षण के अलावा किसी और मूलभूत बलो() से कोई प्रतिक्रिया नही करता है। इसका घन्तव काफी कम है लगभग १०-२९ g/cm3 इसकी प्रयोगशाला मे जांच लगभग असंभव ही है।

श्याम उर्जा को समझाने के लिये सबसे ज्यादा मान्य सिद्धांत है ब्रम्हाण्डिय स्थिरांक सिद्धांत:

यह आईन्स्टाईन द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत है। यह एक दम सरल है, इसके अनुसार अंतराल मे (Volume of Space) मे एक अंतस्थ मूलभूत उर्जा होती है। यह एक ब्रम्हाण्डिय स्थिरांक है जिसे लैम्डा कहते है। द्रव्यमान और उर्जा का ये आईन्सटाईन के समीकरण e=mc2 के द्वारा संबधीत है, इससे यह साबीत होता है कि ब्रम्हाण्डिय स्थिरांक पर गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव होना चाहिये। इसे कभी कभी निर्वात उर्जा (Vacuum Energy) भी कहते है क्योंकि यह निर्वात की उर्जा का घनत्व है। वैज्ञानिको की गणना के अनुसार ब्रम्हाण्डिय स्थिरांक का मूल्य १०-२९ g/cm3 है।

ब्रम्हाण्डिय स्थिरांक एक ऋणात्मक दबाव वाला बल है जो अपने उर्जा घन्तव के बराबर होता है, इसी वजह से यह ब्रम्हांड के विस्तार को त्वरण देता है।

श्याम उर्जा का ब्रम्हांड के भविष्य पर प्रभाव

जैसा कि हम पहले देख चुके है सुपरनोवा का उदाहरण यह बताता है कि ब्रम्हांड के विस्तार का त्वरण(acceleration) ५ खरब वर्ष पहले शूरू हुआ था। इसके पहले यह सोचा जाता था कि ब्रम्हांड के विस्तार की गति बायरानीक और श्याम पदार्थ के गुरुत्वाकर्षण के फलस्वरूप कम हो रही है। विस्तारीत होते ब्रम्हांड मे श्याम पदार्थ का घन्तव का श्याम उर्जा की तुलना मे ज्यादा तिव्रता से ह्रास होता है। जिससे श्याम उर्जा का पलडा भारी रहता है। जब ब्रम्हाण्ड का आकार दूगुणा हो जाता है श्याम पदार्थ का घन्तव आधा हो जाता है जबकी श्याम उर्जा का घनत्व ज्यों का त्यों रहता है। सापेक्षतावाद के सिद्धांत के अनुसार तो यह ब्रम्हांडिय स्थिरांक (Cosmological Constant) है।

यदि विस्तार की गति इस तरह से बढती रही तो आकाशगंगाये ब्रम्हांडीय क्षितीज के पार चली जायेंगी और दिखायी देना बंद हो जायेंगी। ऐसा इसलिये होगा कि उनकी गति प्रकाश की गति से ज्यादा हो जायेगी। यह सापेक्षतावाद के नियम का उलंघन नही है। पृथ्वी, अपनी आकाशगंगा मंदाकिनी को कोई असर नही पडेगा लेकिन बाकि का सारा ब्रम्हांड दूर चला जायेगा।

ब्रम्हांड के अंत के बारे कुछ कल्पनाये है जिसमे से एक है कि श्याम उर्जा का प्रभाव बढते जायेगा, और एक समय यह केन्द्रीय बलो और अन्य मूलभूत बलो से भी ज्यादा हो जायेगा। इस स्थिती मे श्याम उर्जा सौर मंडल, आकाशगंगा, कोई भी पिंड से लेकर अणु परमाणु सभी को विखंडीत कर देगी। यह स्थिती महाविच्छेद (Big Rip) की होगी।

दूसरी कल्पना महासंकुचन(Big Crunch)की है, इसमे श्याम उर्जा का प्रभाव एक सीमा के बाद खत्म हो जायेगा और गुरुत्वाकर्षण उस पर हावी हो जायेगा। यह एक संकुचन की प्रक्रिया को जन्म देगा। अंत मे एक महासंकुचन से सारा ब्रम्हाण्ड एक बिंदू मे तब्दिल हो जायेगा| यह बिंदू एक महाविस्फोट से एक नये ब्रम्हांड को जन्म देगा।

अगले अंक मे श्याम पदार्थ

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()सुपरनोवा- कुछ तारो के जिवन काल के अंत मे जब उनके पास का सारा इण्धन (हायड्रोजन) जला चुका होता है,उनमे एक विस्फोट होता है। यह विस्फोट उन्हे एक बेहद चमकदार तारे मे बदल देता है जिसे सुपरनोवा या नोवा कहते है।

()ऋणात्मक दबावयह वह दबाव को कहते जो आसपास के द्रव (जैसे वायु) के दबाव कम होता है।

() मूलभूत बल : गुरुत्वाकर्षण, विद्युत चुंबकिय बल, कमजोर केन्द्रीय बल, मजबूत केन्द्रीय बल


डाप्लर प्रभाव तथा लाल विचलन

August 29, 2006

डाप्लर प्रभाव

डापलर प्रभाव यह किसी तरंग(Wave) की तरंगदैधर्य(wavelength) और आवृत्ती(frequency) मे आया वह परिवर्तन है जिसे उस तरंग के श्रोत के पास आते या दूर जाते हुये निरीक्षक द्वारा महसूस किया जाता है। यह प्रभाव आप किसी आप अपने निकट पहुंचते वाहन की ध्वनी और दूर जाते वाहन की ध्वनी मे आ रहे परिवर्तनो से महसूस कर सकते है।

इसे वैज्ञानिक रूप से देंखे तो होता यह है कि आप से दूर जाते वाहन की ध्वनी तरंगो(Sound waves) का तरंगदैधर्य(wavelength)बढ जाती है, और पास आते वाहन की ध्वनी तरंगो(Sound waves) का तरंगदैधर्य कम हो जाती है। दूसरे शब्दो मे जब तरंगदैधर्य(wavelength) बढ जाती है तब आवृत्ती कम हो जाती है और जब तरंगदैधर्य(wavelength) कम हो जाती है आवृत्ती बढ जाती है।

एक आसान उदाहरण लेते है, मान लिजीये एक खिलाडी दूसरे खिलाडी की ओर हर सेकंड एक गेंद फेंक रहा है। दूसरा खिलाडी यदि अपनी जगह पर ही खडा हो तो वह हर सेकंड एक गेंद प्राप्त करेगा। यदि गेंद झेलने वाला खिलाडी फेंकने वाले खिलाडी से दूर जाये तो उसे प्राप्त होने वाली गेंदो के अंतराल मे बढोत्तरी होगी यानी उसे हर सेकंड प्राप्त होने वाली गेंदो मे कमी आयेगी। विज्ञान की भाषा मे गेंद प्राप्त करने की आवृत्ती (frequency) मे कमी आयेगी। यदि गेंद झेलने वाला खिलाडी फेंकने वाले खिलाडी के पास आये तो गेंद प्राप्त करने की आवृत्ती मे बढोत्तरी होगी। ध्यान दिजिये श्रोत की गेंद फेंकने की आवृत्ती मे कोई बदलाव नही आ रहा है

यही प्रभाव कीसी भी तरंग (ध्वनी/प्रकाश/क्ष किरण/गामा किरण) पर होता है। तरंग श्रोत से दूर जाने पर उसकी आवृत्ती मे कमी आती है अर्थात तरंगदैधर्य मे बढोत्तरी होते है। तरंग श्रोत के पास आने पर उसकी आवृत्ती मे बढोत्तरी होती है अर्थात तरंगदैधर्य मे कमी आती है।

लाल विचलन (Red Shift)

लाल विचलन

लाल विचलन यह वह प्रक्रिया जिसमे किसी पिंड से उत्सर्जीत प्रकाश वर्णक्रम मे लाल रंग की ओर विचलीत होता है। वैज्ञानिक तौर से यह उत्सर्जीत प्रकाश किरण की तुलना मे निरिक्षित प्रकाश किरण के तरंग दैधर्य मे हुयी बढोत्तरी या उसकी आवृती मे कमी है। दूसरे शब्दो मे प्रकाश श्रोत से प्रकाश के पहुंचने तक प्रकाश किरणो के तरंग दैधर्य मे हुयी बढोत्तरी या उसकी आवृती मे कमी होती है।

प्रकाश किरणो मे लाल रंग की प्रकाश किरणो का तरंग दैधर्य सबसे ज्यादा होता है, इसलिये किसी भी रंग की किरण का वर्णक्रम मे लाल रंग की ओर विचलनलाल विचलनकहलाता है। यह प्रक्रिया अप्रकाशिय किरणो (गामा किरणे, क्ष किरणे, पराबैगनी किरणे) के लिये भी लागु होती है और इसी नाम से जानी जाती है। किरणे जिनका तरंग दैधर्य लाल रंग की किरणो से भी ज्यादा होता है(अवरक्त किरणे(infra red), सुक्षम तरंग तरंगे(Microwave), रेडीयो तरंगे) यह विचलन लाल रंग से दूर होता है।


सामान्यतः
लाल विचलन उस समय होता है जब प्रकाश श्रोत प्रकाश निरिक्षक से दूर जाता है, बिलकुल ध्वनी किरणो के डाप्लर सिद्धांत की तरह ! यह सिद्धांत खगोल शास्त्र मे आकाशिय पिंडो की गति और दूरी को मापने के लिये उपयोग मे लाया जाता है।


महाविस्फोट का सिद्धांत (The Big Bang Theory)

August 29, 2006

किसी बादलो और चांद रहित रात मे यदि आसमान को देखा जाये तब हम पायेंगे कि आसमान मे सबसे ज्यादा चमकीले पिंड शुक्र, मंगल, गुरू, और शनि जैसे ग्रह हैं। इसके अलावा आसमान मे असंख्य तारे भी दिखाई देते है जो कि हमारे सुर्य जैसे ही है लेकिन हमसे काफी दूर हैं। हमारे सबसे नजदिक का सितारा प्राक्सीमा सेंटारी हमसे चार प्रकाश वर्ष(१०) दूर है। हमारी आंखो से दिखाई देने वाले अधिकतर तारे कुछ सौ प्रकाश वर्ष की दूरी पर हैं। तुलना के लिये बता दें कि सुर्य हमसे केवल आठ प्रकाश मिनट और चांद १४ प्रकाश सेकंड की दूरी पर है। हमे दिखाई देने वाले अधिकतर तारे एक लंबे पट्टे के रूप मे दिखाई देते है, जिसे हम आकाशगंगा कहते है। जो कि वास्तविकता मे चित्र मे दिखाये अनुसार पेंचदार (Spiral) है। इस से पता चलता है कि ब्रम्हांड कितना विराट है ! यह ब्रम्हाम्ड आस्तित्व मे कैसे आया ?

महाविस्फोट का सिद्धांत ब्रम्हांड की उत्पत्ती के संदर्भ मे सबसे ज्यादा मान्य है। यह सिद्धांत व्याख्या करता है कि कैसे आज से लगभग १३.७ खरब वर्ष पुर्व एक अत्यंत गर्म और घनी अवस्था से ब्रम्हांड का जन्म हुआ। १९१९ मे ह्ब्बल ने पाया था लाल विचलन() (Red Shift) के सिद्धांत के आधार पर पाया था कि ब्रम्हांड फैल रहा है, ब्रम्हाडं की आकाशगंगाये एक दूसरे से तेजी से दूर जा रही है। यही हब्बल के द्वारा किया गया निरिक्षण और ब्रम्हांडीय सिद्धांत () (Cosmological Principle)इस महाविस्फोट के सिद्धांत का मूल है। इस सिद्धांत को भूतकाल मे ले जाने पर , निरिक्षणो से यह निष्कर्ष निकलता है कि ब्रम्हांड ने एक ऐसी स्थिती से जन्म लिया है जिसमे ब्रम्हांड का सारा पदार्थ और उर्जा अत्यंत गर्म तापमान और घनत्व पर एक ही स्थान पर था। इस स्थिती को गुरुत्विय सिन्गुलरीटी‘( Gravitational Singularity) कहते है। महाविस्फोट यह शब्द उस समय की ओर संकेत करता है जब निरिक्षित ब्रम्हांड का विस्तार प्रारंभ हुआ जो कि गणना करने पर आज से १३.७ खरब वर्ष पूर्व(.३७ x १०१०) पाया गया है। इस सिद्धांत की सहायता से जार्ज गैमो ने १९४८ मे ब्रम्हाडीय सुक्ष्म तरंग विकिरण(cosmic microwave background radiation-CMB)() की भविष्यवाणी की थी , इसे १९६० मे खोज ली गयी थी। इस खोज ने इस सिद्धांत को एक ठोस आधार प्रदान किया।


महाविस्फोट का सिद्धांत अनुमान और निरिक्षण के आधार पर रचा गया है। खगोलशास्त्रीयो ने यह निरिक्षण किया था कि अधिकतर निहारिकायें(nebulae)() पृथ्वी से दूर जा रही है।उन्हे इसके खगोल शास्त्र पर प्रभाव और इसके कारण के बारे मे ज्ञात नही था। उन्हे यह भी ज्ञात नही था की ये निहारिकायें हमारी अपनी आकाशगंगा के बाहर है। यह क्यों हो रहा है,कैसे हो रहा है एक रहस्य था।

१९२७ मे जार्जस लेमिट्र ने आईन्साटाइन के सापेक्षता के सिद्धांत(Theory of General Relativity) से आगे जाते हुये फ़्रीडमैन-लेमिट्र-राबर्टसन-वाकर समीकरण (Friedmann-Lemaître-Robertson-Walker equations) बनाये। उसने यह प्रतिपादन किया की ब्रम्हांड की उत्पत्ती एक प्राथमिक परमाणु से हुयी है, इस प्रतिपादन को आज हम महाविस्फोट का सिद्धांत कहते हैं। इस विचार को किसी ने गंभीरता से नही लिया।

१९२५ मे हब्बल ने पाया था कि ब्रम्हांड मे हमारी आकाशगंगा अकेली नही है, ऐसी अनेको आकाशगंगाये है। जिनके बीच मे विशालकाय अंतराल है। इसे प्रमाणित करने के लिये उसे इन आकाशगंगाओ के पृथ्वी से दूरी गणना करनी थी। लेकिन ये आकाशगंगाये हमे दिखायी देने वाले तारो की तुलना मे काफी दूर थी। इस दूरी की गणना के लिये हब्बल ने अप्रत्यक्ष तरिका प्रयोग मे लाया। किसी भी तारे की चमक(brightness) दो कारको पर निर्भर करती है, वह कितना दिप्ती(luminosity) का प्रकाश उत्सर्जित करता है और कितनी दूरी पर स्थित है। हम पास के तारो की चमक और दूरी की ज्ञात हो तब उनकी दिप्ती की गणना की जा सकती है| उसी तरह तारे की दिप्ती ज्ञात होने पर उसकी चमक का निरिक्षण से प्राप्त मान का प्रयोग कर दूरी ज्ञात की जा सकती है।इस तरह से हब्ब्ल ने नौ विभीन्न आकाशगंगाओ की दूरी का गणना की थी।(११)

१९२९ मे हब्बल जब इन्ही आकाशगंगाओ का निरिक्षण कर दूरीयो की गणना कर रहा था। वह हर तारे से उत्सर्जीत प्रकास का वर्णक्रम और दूरी का एक सुचीपत्र बना रहा था। उस समय तक यह माना जाता था कि ब्रम्हांड मे आकाशगंगाये किसी विशिष्ट क्रम के ऐसे ही विचरण कर रही है। उसका अनुमान था कि इस सुची पत्र मे उसे समान मात्रा मे लाल विचलन(१) और बैगनी विचलन मिलेगा। लेकिन नतिजे विपरित थे। उसे लगभग सभी आकाशगंगाओ से लाल विचलन ही मिला। इसका अर्थ यह था कि सभी आकाशगंगाये हमसे दूर जा रही है। सबसे ज्यादा आश्चर्य जनक खोज यह थी कि यह लाल विचलन क्रम रहित नही था ,उल्टे उस आकाशगंगा की गति के समानुपाती था। इसका अर्थ यह था कि ब्रम्हांड स्थिर नही है, आकाशगंगाओ के बिच की दूरी बढते जा रही है।इस प्रयोग ने लेमिट्र के सिद्धांत को निरिक्षण से प्रायोगिक आधार दिया था। यह निरिक्षण आज हब्बल के नियम के रूप मे जाना जाता है।

हब्बल का नियम और ब्रम्हांडीय सिद्धांत (२)ने यह बताया कि ब्रम्हांड का विस्तार हो रहा है। यह सिद्धांत आईन्स्टाईन के अनंत और स्थैतिक ब्रम्हांड के विपरित था।

इस सिद्धांत ने दो विरोधाभाषी संभावनाओ को हवा दी थी। पहली संभावना थी, लेमिट्र का महाविस्फोट सिद्धांत जिसे जार्ज गैमो ने समर्थन और विस्तार दिया था। दूसरी संभावना थी, फ़्रेड होयेल का स्थायी स्थिती माडल (Fred Hoyle’s steady state model), जिसमे दूर होती हुयी आकाशगंगाओ के बिच मे हमेशा नये पदार्थ की उत्पती का प्रतिपादन था। दूसरे शब्दो मे आकाशगंगाये एक दूसरे से दूर जाने पर जो खाली स्थान बनता है वहां पर नये पदार्थ का निर्माण होता है। इस संभावना के अनुसार मोटे तौर पर ब्रम्हांड हर समय एक जैसा ही रहा है और रहेगा। होयेल ही वह व्यक्ति थे जिन्होने लेमिट्र का महाविस्फोट सिद्धांत का मजाक उडाते हुयेबिग बैंग आईडीयाका नाम दिया था।

काफी समय तक इन दोनो माड्लो के बिच मे वैज्ञानिक विभाजित रहे। लेकिन धीरे धीरे वैज्ञानिक प्रयोगो और निरिक्षणो से महाविस्फोट के सिद्धांत को समर्थन बढता गया। १९६५ के बाद ब्रम्हांडिय सुक्षम तरंग विकिरण (Cosmic Microwave Radiation) की खोज के बाद इस सिद्धांत को सबसे ज्यादा मान्य सिद्धांत का दर्जा मिल गया। आज की स्थिती मे खगोल विज्ञान का हर सिध्दांत इसी सिद्धांत पर आधारित है और इसी सिद्धांत का विस्तार है।

महाविस्फोट के बाद शुरुवाती ब्रम्हांड समांगी और सावर्तिक रूप से अत्याधिक घन्तव का और उर्जा से भरा हुआ था. उस समय दबाव और तापमान भी अत्याधिक था। यह धीर धीरे फैलता गया और ठंडा होता गया, यह प्रक्रिया कुछ वैसी थी जैसे भाप का धीरे धीरे ठंडा हो कर बर्फ मे बदलना, अंतर इतना ही है कि यह प्रक्रिया मूलभूत कणो(इलेक्ट्रान, प्रोटान, फोटान इत्यादि) से संबधीत है।

प्लैंक काल() के १० -३५ सेकंड के बाद एक संक्रमण के द्वारा ब्रम्हांड की काफी तिव्र गति से वृद्धी(exponential growth) हुयी। इस काल को अंतरिक्षिय स्फिती(cosmic inflation) काल कहा जाता है। इस स्फिती के समाप्त होने के पश्चात, ब्रम्हांड का पदार्थ एक क्वार्क-ग्लूवान प्लाज्मा की अवस्था मे था, जिसमे सारे कण गति करते रहते हैं। जैसे जैसे ब्रम्हांड का आकार बढने लगा, तापमान कम होने लगा। एक निश्चित तापमान पर जिसे हम बायरोजिनेसीस संक्रमण कहते है, ग्लुकान और क्वार्क ने मिलकर बायरान (प्रोटान और न्युट्रान) बनाये। इस संक्रमण के दौरान किसी अज्ञात कारण से कण और प्रति कण(पदार्थ और प्रति पदार्थ) की संख्या मे अंतर आ गया। तापमान के और कम होने पर भौतिकी के नियम और मूलभूत कण आज के रूप मे आस्तिव मे आये। बाद मे प्रोटान और न्युट्रान ने मिलकर ड्युटेरीयम और हिलीयम के केंद्रक बनाये, इस प्रक्रिया को महाविस्फोट आणविक संश्लेषण(Big Bang nucleosynthesis.) कहते है। जैसे जैसे ब्रम्हांड ठंडा होता गया, पदार्थ की गति कम होती गयी, और पदार्थ की उर्जा गुरुत्वाकर्षण मे तब्दिल होकर विकिरण की उर्जा से अधिक हो गयी। इसके ३००,००० वर्ष पश्चात इलेक्ट्रान और केण्द्रक ने मिलकर परमाणू (अधिकतर हायड्रोजन) बनाये; इस प्रक्रिया मे विकिरण पदार्थ से अलग हो गया । यह विकिरण ब्रम्हाण्ड मे अभी तक ब्रम्हाण्डीय सुक्ष्म तरंग विकिरण (cosmic microwave radiation)के रूप मे बिखरा पडा है।

कालांतर मे थोडे अधिक घनत्व वाले क्षेत्र गुरुत्वाकर्षण के द्वारा और ज्यादा घनत्व वाले क्षेत्र मे बदल गये। महाविस्फोट से पदार्थ एक दूसरे से दूर जा रहा था वंही गुरुत्वाकर्षण इन्हे पास खिंच रहा था। जहांपर पदार्थ का घनत्व ज्यादा था वहां पर गुरुत्वाकर्षण बल ब्रम्हांड के प्रसार के लिये कारणीभूत बल से ज्यादा हो गया। गुरुत्वाकर्षण बल की अधिकता से पदार्थ एक जगह इकठ्ठा होकर विभिन्न खगोलिय पिण्डो का निर्माण करने लगा। इस तरह गैसो के बादल, तारो, आकाशगंगाओ और अन्य खगोलिय पिंडो का जन्म हुआ,जिन्हे आज हम देख सकते है।

आकाशिय पिण्डो के जन्म की इस प्रक्रिया की और विस्तृत जानकारी पदार्थ की मात्रा और प्रकार पर निर्भर करती है। पदार्थ के तिन संभव प्रकार है शीतल श्याम पदार्थ (cold dark matter)(), तप्त श्याम पदार्थ(hot dark matter) तथा बायरोनिक पदार्थ। खगोलिय गणना के अनुसार शीतल श्याम पदार्थ की मात्रा सबसे ज्यादा(लगभग ८०%) है। मानव द्वारा निरिक्षित लगभग सभी आकाशीय पिण्ड बायरोनिक पदार्थ () से बने है।

श्याम पदार्थ की तरह आज का ब्रम्हाड एक रहस्यमय प्रकार की उर्जा,श्याम उर्जा (dark energy)() के वर्चश्व मे है। लगभग ब्रम्हांड की कुल उर्जा का ७०% भाग इसी उर्जा का है। यही उर्जा ब्रम्हांड के विस्तार की गति को एक सरल रैखीक गति-अंतर समीकरण से विचलीत कर रही है, यह गति अपेक्षित गति से कहीं ज्यादा है। श्याम उर्जा अपने सरल रूप मे आईन्स्टाईन के समीकरणो मे एक ब्रम्हांडिय स्थिरांक(cosmological constant) है । लेकिन इसके बारे मे हम जितना जानते है उससे कहीं ज्यादा नही जानते है। दूसरे शब्दो मे भौतिकी मे मानव को जितने बल() ज्ञात है वे सारे बल और भौतिकी के नियम ब्रम्हांड के विस्तार की गति की व्याख्या नही कर पा रहे है। इसे व्याख्या करने क एक काल्पनिक बल का सहारा लिया गया है जिसे श्याम उर्जा कहा जाता है।

यह सभी निरीक्षण लैम्डा सी डी एम माडेल के अंतर्गत आते है, जो महाविस्फोट के सिद्धांत की गणीतिय रूप से छह पैमानो पर व्याख्या करता है। रहस्य उस समय गहरा जाता है जब हम शुरूवात की अवस्था की ओर देखते है, इस समय पदार्थ के कण अत्याधिक उर्जा के साथ थे, इस अवस्था को किसी भी प्रयोगशाला मे प्राप्त नही किया जा सकता है। ब्रम्हांड के पहले १० -३३ सेकंड की व्याख्या करने के लिये हमारे पास कोइ भी गणितिय या भौतिकिय माडेल नही है, जिस अवस्था का अनुमान ब्रहृत एकीकृत सिद्धांत(Grand Unification Theory)() करता है। पहली नजर से आईन्स्टाईन का गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत एक गुरुत्विय बिन्दू (gravitational singularity) का अनुमान करता है जिसका घन्तव अपरिमित (infinite) है।. इस रहस्य को सुलझाने के लिये क्वांटम गुरुत्व के सिद्धांत की आवश्यकता है। इस काल (ब्रम्हांड के पहले १० -३३ सेकंड) को समझ पाना विश्व के सबसे महान अनसुलझे भौतिकिय रहस्यो मे से एक है।

मुझे लग रहा है इस लेख ने महाविस्फोट के सिद्धांत की गुत्थी को कुछ और उलझा दिया है, इस गुत्थी को हम धीरे धीरे आगे के लेखो मे विस्तार से चर्चा कर सुलझाने का प्रयास करेंगे। अगला लेख श्याम पदार्थ (Dark Matter) और श्याम उर्जा(dark energy) पर होगा।

सागर जी क्या ख्याल है, आपके प्रश्नो की सुची कम हुयी या और बढ गयी?

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(१) लाल विचलन (Red Shift) के बारे मे यहां देखे.

()ब्रम्हांडीय सिद्धांत (Cosmological Principle) :यह एक सिद्धांत नही एक मान्यता है। इसके अनुसार ब्रम्हांड समांगी(homogeneous) और सावर्तिक(isotrpic) है| एक बडे पैमाने पर किसी भी जगह से निरिक्षण करने पर ब्रम्हांड हर दिशा मे एक ही जैसा प्रतित होता है।

()ब्रम्हाडीय सुक्ष्म तरंग विकिरण(cosmic microwave background radiation-CMB): यह ब्रम्हांड के उत्पत्ती के समय से लेकर आज तक सम्पूर्ण ब्रम्हांड मे फैला हुआ है। इस विकिरण को आज भी महसूस किया जा सकता है।

()निहारिका (Nebula) : ब्रम्हांड मे स्थित धुल और गैस के बादल।

() प्लैंक काल:मैक्स प्लैंक के नाम पर पर, ब्रम्हांड के इतिहास मे ० से लेकर १० -४३ (एक प्लैंक ईकाइ समय), जब सभी चारो मूलभूत बल(गुरूत्व बल, विद्युत चुंबकिय बल, कमजोर आणविक आकर्षण बल और मजबूत आणविक आकर्षण बल) एक संयुक्त थे और मूलभूत कणो का आस्तित्व नही था।

() श्याम पदार्थ (Dark Matter) और श्याम उर्जा(dark energy) इस पर पूरा एक लेख लिखना है।

()ब्रहृत एकीकृत सिद्धांत(Grand Unification Theory) : यह सिद्धांत अभी अपूर्ण है, इस सिद्धांत से अपेक्षा है कि यह सभी रहस्य को सुलझा कर ब्रम्हाम्ड उत्पत्ती और उसके नियमो की एक सर्वमान्य गणितिय और भौतिकिय व्याख्या देगा।

(८) बायरान : प्रोटान और न्युट्रान को बायरान भी कहा जाता है। विस्तृत जानकारी पदार्थ के मूलभूत कण लेख मे।

(९) भौतिकि के मूलभूत बल :गुरूत्व बल, विद्युत चुंबकिय बल, कमजोर आणविक आकर्षण बल और मजबूत आणविक आकर्षण बल

(१०) : एक प्रकाश वर्ष : प्रकाश द्वारा एक वर्ष मे तय की गयी दूरी। लगभग ९,५००,०००,०००,००० कीलो मिटर। अतंरिक्ष मे दूरी मापने के लिये इस ईकाई का प्रयोग किया जाता है।

(११)आज हम जानते है कि अत्याधुनिक दूरबीन से खरबो आकाशगंगाये देखी जा सकती है, जिसमे से हमारी आकाशगंगा एक है और एक आकाशगंगा मे भी खरबो तारे होते है। हमारी आकासगंगा एक पेंचदार आकाशगंगा है जिसकी चौडाई लगभग हजार प्रकाशवर्ष है और यह धीमे धीमे घुम रही है। इसकी पेंचदारो बाहों के तारे १,०००,००० वर्ष मे केण्द्र की एक परिक्रमा करते है। हमारा सुर्य एक साधारण औसत आकार का पिला तारा है, जो कि एक पेण्च्दार भूजा के अंदर के किनारे पर स्थित है।


ब्रम्हांड की उत्पत्ती

August 24, 2006

सृष्टि से पहले सत नहीं था, असत भी नहीं
अंतरिक्ष भी नहीं, आकाश भी नहीं था
छिपा था क्या कहाँ, किसने देखा था
उस पल तो अगम, अटल जल भी कहाँ था
ऋग्वेद(१०:१२९) से सृष्टि सृजन की यह श्रुती

लगभग पांच हजार वर्ष पुरानी यह श्रुती आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी इसे रचित करते समय थी। सृष्टि की उत्पत्ती आज भी एक रहस्य है। सृष्टि के पहले क्या था ? इसकी रचना किसने, कब और क्यों की ? ऐसा क्या हुआ जिससे इस सृष्टि का निर्माण हुआ ?

अनेको अनसुलझे प्रश्न है जिनका एक निश्चित उत्तर किसी के पास नही है। कुछ सिध्दांत है जो कुछ प्रश्नो का उत्तर देते है और कुछ नये प्रश्न खडे करते है। सभी प्रश्नो के उत्तर देने वाला सिध्दांत अभी तक सामने नही आया है।
सबसे ज्यादा मान्यता प्राप्त सिद्धांत है महाविस्फोट सिध्दांत (The Bing Bang Theory)|

महाविस्फोट सिध्दांत (The Bing Bang Theory)

१९२९ मे एडवीन हब्बल ने एक आश्चर्य जनक खोज की, उन्होने पाया की अंतरिक्ष मे आप कीसी भी दिशा मे देंखे आकाशगंगाये और अन्य आकाशिय पिंड तेजी से एक दूसरे से दूर हो रहे है। दूसरे शब्दो मे ब्रम्हांड का विस्तार हो रहा है। इसका मतलब यह है कि इतिहास मे ब्रम्हांड के सभी पदार्थ आज की तुलना मे एक दूसरे से और भी पास रहे होंगे। और एक समय ऐसा रहा होगा जब सभी आकाशीय पिंड एक ही स्थान पर रहे होंगे, लेकिन क्या आप इस पर विश्वास करेंगे ?
तब से लेकर अब तक खगोलशास्त्रीयों ने उन परिस्थितियो का विश्लेषन करने का प्रयास किया है कि कैसे ब्रम्हांडिय पदार्थ एक दूसरे से एकदम पास होने की स्थिती से एकदम दूर होते जा रहे है।
इतिहास मे किसी समय , शायद १० से २० खरब साल पुर्व , ब्रम्हांड के सभी कण एक दूसरे से एकदम पास पास थे। वे इतने पास पास थे कि वे सभी एक ही जगह थे, एक ही बिंदू पर। सारा ब्रम्हांड एक ही बिन्दू की शक्ल मे था। यह बिन्दू अत्याधिक घनत्व(infinite density) का, अत्यंत छोटा बिन्दू(infinitesimally small ) था। ब्रम्हांड का यह बिन्दू रूप अपने अत्याधिक घनत्व के कारण अत्यंत गर्म(infinitely hot) रहा होगा। इस स्थिती मे भौतिकी, गणित या विज्ञान का कोई भी नियम काम नही करता है। यह वह स्थिती है जब मनुष्य कीसी भी प्रकार अनुमान या विश्लेषन करने मे असमर्थ है। काल या समय भी इस स्थिती मे रूक जाता है, दूसरे शब्दो मे काल और समय के कोई मायने नही रहते है। *


इस स्थिती मे किसी अज्ञात कारण से अचानक ब्रम्हांड का विस्तार होना शुरू हुआ। एक महाविस्फोट के साथ ब्रम्हांड का जन्म हुआ और ब्रम्हांड मे पदार्थ ने एक दूसरे से दूर जाना शुरू कर दिया।
 

महाविस्फोट के १० -४३ सेकंड के बाद, अत्याधिक उर्जा(फोटान कणो के रूप मे) का ही आस्तित्व था। इसी समय क्वार्क , इलेक्ट्रान, एन्टी इलेक्ट्रान जैसे मूलभूत कणो का निर्माण हुआ। इन कणो के बारे हम अगले अंको मे जानेंगे।
 

१० -३४ सेकंड के बाद , क्वार्क और एन्टी क्वार्क जैसे कणो का मूलभूत कणो के अत्याधिक उर्जा के मध्य टकराव के कारण ज्यादा मात्रा मे निर्माण हुआ। इस समय कण और उनके प्रतिकण (१) दोनो का निर्माण हो रहा था , इसमे से कुछ एक कण और उनके प्रतिकण(2) दूसरे से टकरा कर खत्म भी हो रहे थे। इस समय ब्रम्हांड का आकार एक संतरे के आकार का था।
 

१० -१० सेकंड के बाद एन्टी क्वार्क क्वार्क से टकरा कर पुर्ण रूप से खत्म हो चुके थे, इस टकराव से फोटान का निर्माण हो रहा था। साथ मे इसी समय प्रोटान और न्युट्रान का भी निर्माण हुआ।
१ सेकंड के बाद जब तापमान १० खरब डीग्री सेल्सीयस था, ब्रम्हांड ने आकार लेना शुरू किया। उस समय ब्रम्हांड मे ज्यादातर फोटान, इलेक्ट्रान , न्युट्रीनो (३) और उनके प्रती कणो के साथ मे कुछ मात्रा मे प्रोटान तथा न्युट्रान थे।

प्रोटान और न्युट्रान ने एक दूसरे के साथ मिल कर तत्वो(elements) का केन्द्र (nuclei) बनाना शूरू किया जीसे आज हम हाइड्रोजन, हीलीयम, लिथियम और ड्युटेरीयम के नाम से जानते है।
जब महाविस्फोट के बाद तिन मिनिट बीत चुके थे, तापमान गिरकर १ खरब डीग्री सेल्सीयस हो चुका था, तत्व और ब्रम्हान्डीय विकिरण(cosmic radiation) का निर्माण हो चुका था। यह विकिरण आज भी मौजुद है और इसे महसूस किया जा सकता है।
 

आगे बढने पर ३००,००० वर्ष के पश्चात विस्तार करता हुआ ब्रम्हांड अभी भी आज के ब्रम्हांड से मेल नही खाता था। तत्व और विकीरण एक दूसरे से अलग होना शूरू हो चुके थे। इसी समय इलेक्ट्रान , केन्द्रक के साथ मे मिल कर परमाणु का निर्माण कर रहे थे। परमाणु मिलकर अणु बना रहे थे।
 

इस के १ खरब वर्ष पश्चात ब्रम्हांड का एक निश्चित सा आकार बनना शुरू हुआ था। इसी समय क्वासर, प्रोटोगैलेक्सी(आकाशगंगा का प्रारंभीक रूप), तारो का जन्म होने लगा था। तारे हायोड्राजन जलाकर भारी तत्वो का निर्माण कर रहे थे।
आज महाविस्फोट के लगभग १५ खरब साल पश्चात की स्थीती देखे ! तारो के साथ उनका सौर मंडल बन चुका है। परमाणु मिलकर कठीन अणु बना चुके है। जिसमे कुछ कठीन अणु जिवन( उदा: Amino Acid) के मुलभूत कण है। यही नही काफी सारे तारे मरकर श्याम वीवर(black hole) बन चुके है।
ब्रम्हांड का अभी भी विस्तार हो रहा है, और विस्तार की गति बढती जा रही है। विस्तार होते हुये ब्रम्हाण्ड की तुलना आप एक गुब्बारे से कर सकते है, जिस तरह गुब्बारे को फुलाने पर उसकी सतह पर स्थित बिन्दू एक दूसरे से दूर होते जाते है उसी तरह आकाशगंगाये एक दूसरे से दूर जा रही है। यह विस्तार कुछ इस तरह से हो रहा है जिसका कोई केन्द्र नही है, हर आकाश गंगा दूसरी आकाशगंगा से दूर जा रही है।
 

वैकल्पिक सिध्दांत (The Alternative Theory)

इस सिध्दांत के अनुसार काल और अंतरिक्ष एक साथ महाविस्फोट के साथ प्रारंभ नही हुये थे। इसकी मान्यता है कि काल अनादि है, इसका ना तो आदि है ना अंत। आइये इस सिद्धांत को जाने।
आकाशगंगाओ(Galaxy) और आकाशीय पिंडो का समुह अंतरिक्ष मे एक मे एक दूसरे से दूर जाते रहता है।महाविस्फोट के सिद्धांत के अनुसार आकाशिय पिण्डो की एक दूसरे से दूर जाने की गति महाविस्फोट के बाद के समय और आज के समय की तुलना मे कम है। इसे आगे बढाते हुये यह सिध्दांत कहता है कि भविष्य मे आकाशिय पिंडो का गुरूत्वाकर्षण इस विस्तार की गति पर रोक लगाने मे सक्षम हो जायेगा। इसी समय विपरित प्रक्रिया का प्रारंभ होगा अर्थात संकुचन का। सभी आकाशिय पिंड एक दूसरे के नजदिक और नजदिक आते जायेंगे और अंत मे एक बिन्दू के रुप मे संकुचित हो जायेंगे। इसी पल एक और महाविस्फोट होगा और एक नया ब्रम्हांड बनेगा, विस्तार की प्रक्रिया एक बार और प्रारंभ होगी।
यह प्रक्रिया अनादि काल से चल रही है, हमारा विश्व इस विस्तार और संकुचन की प्रक्रिया मे बने अनेको विश्व मे से एक है। इसके पहले भी अनेको विश्व बने है और भविष्य मे भी बनते रहेंगे। ब्रम्हांड के संकुचित होकर एक बिन्दू मे बन जाने की प्रक्रिया को महासंकुचन(The Big Crunch) के नाम से जाना जाता है। हमारा विश्व भी एक ऐसे ही महासंकुचन मे नष्ट हो जायेगा, जो एक महाविस्फोट के द्वारा नये ब्रम्हांड को जन्म देगा। यदि यह सिध्दांत सही है तब यह संकुचन की प्रक्रिया आज से १ खरब ५० अरब वर्ष पश्चात प्रारंभ होगी।
 

यथास्थिती सिध्दांत(The Quite State Theory)

महाविस्फोट का सिद्धांत सबसे ज्यादा मान्य सिद्धांत है लेकिन सभी वैज्ञानिक इससे सहमत नही हैं । वे मानते है कि ब्रम्हांड अनादि है, इसका ना तो आदि है ना अंत। उनके अनुसार ब्रम्हांड का महाविस्फोट से प्रारंभ नही हुआ था ना इसका अंत महासंकुचन से होगा।
यह सिद्धांत मानता है कि ब्रम्हाड का आज जैसा है वैसा ये हमेशा से था और हमेशा ऐसा ही रहेगा। लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है।

इस अंक मे ब्रम्हांड की उतपत्ती के बारे मे हमने चर्चा की,अगले अंक मे हम महाविस्फोट और भौतिकी मे मूलभूत सिद्धांतो की विस्तार से चर्चा करेंगे।

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(*) इस विषय पर पूरा एक लेख लिखना है।

(१)कण और प्रतिकण: पदार्थ के हर मूलभूत कण का प्रतिकण भी होता है। जैसे इलेक्ट्रान के लिये एन्टी इलेक्ट्रान(पाजीट्रान), प्रोटान-एन्टी प्रोटान , न्युट्रान -एन्टीन्युट्रान इत्यादि. जब एक कण और उसका प्रतिकण टकराते है दोनो उर्जा(फोटान) मे बदल जाते है। यदि आपको कभी आपका एन्टी मनुष्य मिले तब आप उससे हाथ मिलाने की गल्ती ना करें। आप दोनो एक धमाके के रूप मे उर्जा मे बदल जायेंगे।

(२)ये भी एक रहस्य है कि ब्रम्हांड के निर्माण के समय कण और प्रतिकण दोनो बने, लेकिन कणो की मात्रा इतनी ज्यादा क्यो है ? क्या प्रतिब्रम्हांड (Anti Universe) का भी आस्तित्व है ?
(३) न्युट्रीनो का मतलब न्युट्रान नही है, ये इलेक्ट्रान के समान द्रव्यमान रखते है लेकिन इन पर आवेश(+/-) नही होता है।