डाप्लर प्रभाव तथा लाल विचलन

August 29, 2006

डाप्लर प्रभाव

डापलर प्रभाव यह किसी तरंग(Wave) की तरंगदैधर्य(wavelength) और आवृत्ती(frequency) मे आया वह परिवर्तन है जिसे उस तरंग के श्रोत के पास आते या दूर जाते हुये निरीक्षक द्वारा महसूस किया जाता है। यह प्रभाव आप किसी आप अपने निकट पहुंचते वाहन की ध्वनी और दूर जाते वाहन की ध्वनी मे आ रहे परिवर्तनो से महसूस कर सकते है।

इसे वैज्ञानिक रूप से देंखे तो होता यह है कि आप से दूर जाते वाहन की ध्वनी तरंगो(Sound waves) का तरंगदैधर्य(wavelength)बढ जाती है, और पास आते वाहन की ध्वनी तरंगो(Sound waves) का तरंगदैधर्य कम हो जाती है। दूसरे शब्दो मे जब तरंगदैधर्य(wavelength) बढ जाती है तब आवृत्ती कम हो जाती है और जब तरंगदैधर्य(wavelength) कम हो जाती है आवृत्ती बढ जाती है।

एक आसान उदाहरण लेते है, मान लिजीये एक खिलाडी दूसरे खिलाडी की ओर हर सेकंड एक गेंद फेंक रहा है। दूसरा खिलाडी यदि अपनी जगह पर ही खडा हो तो वह हर सेकंड एक गेंद प्राप्त करेगा। यदि गेंद झेलने वाला खिलाडी फेंकने वाले खिलाडी से दूर जाये तो उसे प्राप्त होने वाली गेंदो के अंतराल मे बढोत्तरी होगी यानी उसे हर सेकंड प्राप्त होने वाली गेंदो मे कमी आयेगी। विज्ञान की भाषा मे गेंद प्राप्त करने की आवृत्ती (frequency) मे कमी आयेगी। यदि गेंद झेलने वाला खिलाडी फेंकने वाले खिलाडी के पास आये तो गेंद प्राप्त करने की आवृत्ती मे बढोत्तरी होगी। ध्यान दिजिये श्रोत की गेंद फेंकने की आवृत्ती मे कोई बदलाव नही आ रहा है

यही प्रभाव कीसी भी तरंग (ध्वनी/प्रकाश/क्ष किरण/गामा किरण) पर होता है। तरंग श्रोत से दूर जाने पर उसकी आवृत्ती मे कमी आती है अर्थात तरंगदैधर्य मे बढोत्तरी होते है। तरंग श्रोत के पास आने पर उसकी आवृत्ती मे बढोत्तरी होती है अर्थात तरंगदैधर्य मे कमी आती है।

लाल विचलन (Red Shift)

लाल विचलन

लाल विचलन यह वह प्रक्रिया जिसमे किसी पिंड से उत्सर्जीत प्रकाश वर्णक्रम मे लाल रंग की ओर विचलीत होता है। वैज्ञानिक तौर से यह उत्सर्जीत प्रकाश किरण की तुलना मे निरिक्षित प्रकाश किरण के तरंग दैधर्य मे हुयी बढोत्तरी या उसकी आवृती मे कमी है। दूसरे शब्दो मे प्रकाश श्रोत से प्रकाश के पहुंचने तक प्रकाश किरणो के तरंग दैधर्य मे हुयी बढोत्तरी या उसकी आवृती मे कमी होती है।

प्रकाश किरणो मे लाल रंग की प्रकाश किरणो का तरंग दैधर्य सबसे ज्यादा होता है, इसलिये किसी भी रंग की किरण का वर्णक्रम मे लाल रंग की ओर विचलनलाल विचलनकहलाता है। यह प्रक्रिया अप्रकाशिय किरणो (गामा किरणे, क्ष किरणे, पराबैगनी किरणे) के लिये भी लागु होती है और इसी नाम से जानी जाती है। किरणे जिनका तरंग दैधर्य लाल रंग की किरणो से भी ज्यादा होता है(अवरक्त किरणे(infra red), सुक्षम तरंग तरंगे(Microwave), रेडीयो तरंगे) यह विचलन लाल रंग से दूर होता है।


सामान्यतः
लाल विचलन उस समय होता है जब प्रकाश श्रोत प्रकाश निरिक्षक से दूर जाता है, बिलकुल ध्वनी किरणो के डाप्लर सिद्धांत की तरह ! यह सिद्धांत खगोल शास्त्र मे आकाशिय पिंडो की गति और दूरी को मापने के लिये उपयोग मे लाया जाता है।


महाविस्फोट का सिद्धांत (The Big Bang Theory)

August 29, 2006

किसी बादलो और चांद रहित रात मे यदि आसमान को देखा जाये तब हम पायेंगे कि आसमान मे सबसे ज्यादा चमकीले पिंड शुक्र, मंगल, गुरू, और शनि जैसे ग्रह हैं। इसके अलावा आसमान मे असंख्य तारे भी दिखाई देते है जो कि हमारे सुर्य जैसे ही है लेकिन हमसे काफी दूर हैं। हमारे सबसे नजदिक का सितारा प्राक्सीमा सेंटारी हमसे चार प्रकाश वर्ष(१०) दूर है। हमारी आंखो से दिखाई देने वाले अधिकतर तारे कुछ सौ प्रकाश वर्ष की दूरी पर हैं। तुलना के लिये बता दें कि सुर्य हमसे केवल आठ प्रकाश मिनट और चांद १४ प्रकाश सेकंड की दूरी पर है। हमे दिखाई देने वाले अधिकतर तारे एक लंबे पट्टे के रूप मे दिखाई देते है, जिसे हम आकाशगंगा कहते है। जो कि वास्तविकता मे चित्र मे दिखाये अनुसार पेंचदार (Spiral) है। इस से पता चलता है कि ब्रम्हांड कितना विराट है ! यह ब्रम्हाम्ड आस्तित्व मे कैसे आया ?

महाविस्फोट का सिद्धांत ब्रम्हांड की उत्पत्ती के संदर्भ मे सबसे ज्यादा मान्य है। यह सिद्धांत व्याख्या करता है कि कैसे आज से लगभग १३.७ खरब वर्ष पुर्व एक अत्यंत गर्म और घनी अवस्था से ब्रम्हांड का जन्म हुआ। १९१९ मे ह्ब्बल ने पाया था लाल विचलन() (Red Shift) के सिद्धांत के आधार पर पाया था कि ब्रम्हांड फैल रहा है, ब्रम्हाडं की आकाशगंगाये एक दूसरे से तेजी से दूर जा रही है। यही हब्बल के द्वारा किया गया निरिक्षण और ब्रम्हांडीय सिद्धांत () (Cosmological Principle)इस महाविस्फोट के सिद्धांत का मूल है। इस सिद्धांत को भूतकाल मे ले जाने पर , निरिक्षणो से यह निष्कर्ष निकलता है कि ब्रम्हांड ने एक ऐसी स्थिती से जन्म लिया है जिसमे ब्रम्हांड का सारा पदार्थ और उर्जा अत्यंत गर्म तापमान और घनत्व पर एक ही स्थान पर था। इस स्थिती को गुरुत्विय सिन्गुलरीटी‘( Gravitational Singularity) कहते है। महाविस्फोट यह शब्द उस समय की ओर संकेत करता है जब निरिक्षित ब्रम्हांड का विस्तार प्रारंभ हुआ जो कि गणना करने पर आज से १३.७ खरब वर्ष पूर्व(.३७ x १०१०) पाया गया है। इस सिद्धांत की सहायता से जार्ज गैमो ने १९४८ मे ब्रम्हाडीय सुक्ष्म तरंग विकिरण(cosmic microwave background radiation-CMB)() की भविष्यवाणी की थी , इसे १९६० मे खोज ली गयी थी। इस खोज ने इस सिद्धांत को एक ठोस आधार प्रदान किया।


महाविस्फोट का सिद्धांत अनुमान और निरिक्षण के आधार पर रचा गया है। खगोलशास्त्रीयो ने यह निरिक्षण किया था कि अधिकतर निहारिकायें(nebulae)() पृथ्वी से दूर जा रही है।उन्हे इसके खगोल शास्त्र पर प्रभाव और इसके कारण के बारे मे ज्ञात नही था। उन्हे यह भी ज्ञात नही था की ये निहारिकायें हमारी अपनी आकाशगंगा के बाहर है। यह क्यों हो रहा है,कैसे हो रहा है एक रहस्य था।

१९२७ मे जार्जस लेमिट्र ने आईन्साटाइन के सापेक्षता के सिद्धांत(Theory of General Relativity) से आगे जाते हुये फ़्रीडमैन-लेमिट्र-राबर्टसन-वाकर समीकरण (Friedmann-Lemaître-Robertson-Walker equations) बनाये। उसने यह प्रतिपादन किया की ब्रम्हांड की उत्पत्ती एक प्राथमिक परमाणु से हुयी है, इस प्रतिपादन को आज हम महाविस्फोट का सिद्धांत कहते हैं। इस विचार को किसी ने गंभीरता से नही लिया।

१९२५ मे हब्बल ने पाया था कि ब्रम्हांड मे हमारी आकाशगंगा अकेली नही है, ऐसी अनेको आकाशगंगाये है। जिनके बीच मे विशालकाय अंतराल है। इसे प्रमाणित करने के लिये उसे इन आकाशगंगाओ के पृथ्वी से दूरी गणना करनी थी। लेकिन ये आकाशगंगाये हमे दिखायी देने वाले तारो की तुलना मे काफी दूर थी। इस दूरी की गणना के लिये हब्बल ने अप्रत्यक्ष तरिका प्रयोग मे लाया। किसी भी तारे की चमक(brightness) दो कारको पर निर्भर करती है, वह कितना दिप्ती(luminosity) का प्रकाश उत्सर्जित करता है और कितनी दूरी पर स्थित है। हम पास के तारो की चमक और दूरी की ज्ञात हो तब उनकी दिप्ती की गणना की जा सकती है| उसी तरह तारे की दिप्ती ज्ञात होने पर उसकी चमक का निरिक्षण से प्राप्त मान का प्रयोग कर दूरी ज्ञात की जा सकती है।इस तरह से हब्ब्ल ने नौ विभीन्न आकाशगंगाओ की दूरी का गणना की थी।(११)

१९२९ मे हब्बल जब इन्ही आकाशगंगाओ का निरिक्षण कर दूरीयो की गणना कर रहा था। वह हर तारे से उत्सर्जीत प्रकास का वर्णक्रम और दूरी का एक सुचीपत्र बना रहा था। उस समय तक यह माना जाता था कि ब्रम्हांड मे आकाशगंगाये किसी विशिष्ट क्रम के ऐसे ही विचरण कर रही है। उसका अनुमान था कि इस सुची पत्र मे उसे समान मात्रा मे लाल विचलन(१) और बैगनी विचलन मिलेगा। लेकिन नतिजे विपरित थे। उसे लगभग सभी आकाशगंगाओ से लाल विचलन ही मिला। इसका अर्थ यह था कि सभी आकाशगंगाये हमसे दूर जा रही है। सबसे ज्यादा आश्चर्य जनक खोज यह थी कि यह लाल विचलन क्रम रहित नही था ,उल्टे उस आकाशगंगा की गति के समानुपाती था। इसका अर्थ यह था कि ब्रम्हांड स्थिर नही है, आकाशगंगाओ के बिच की दूरी बढते जा रही है।इस प्रयोग ने लेमिट्र के सिद्धांत को निरिक्षण से प्रायोगिक आधार दिया था। यह निरिक्षण आज हब्बल के नियम के रूप मे जाना जाता है।

हब्बल का नियम और ब्रम्हांडीय सिद्धांत (२)ने यह बताया कि ब्रम्हांड का विस्तार हो रहा है। यह सिद्धांत आईन्स्टाईन के अनंत और स्थैतिक ब्रम्हांड के विपरित था।

इस सिद्धांत ने दो विरोधाभाषी संभावनाओ को हवा दी थी। पहली संभावना थी, लेमिट्र का महाविस्फोट सिद्धांत जिसे जार्ज गैमो ने समर्थन और विस्तार दिया था। दूसरी संभावना थी, फ़्रेड होयेल का स्थायी स्थिती माडल (Fred Hoyle’s steady state model), जिसमे दूर होती हुयी आकाशगंगाओ के बिच मे हमेशा नये पदार्थ की उत्पती का प्रतिपादन था। दूसरे शब्दो मे आकाशगंगाये एक दूसरे से दूर जाने पर जो खाली स्थान बनता है वहां पर नये पदार्थ का निर्माण होता है। इस संभावना के अनुसार मोटे तौर पर ब्रम्हांड हर समय एक जैसा ही रहा है और रहेगा। होयेल ही वह व्यक्ति थे जिन्होने लेमिट्र का महाविस्फोट सिद्धांत का मजाक उडाते हुयेबिग बैंग आईडीयाका नाम दिया था।

काफी समय तक इन दोनो माड्लो के बिच मे वैज्ञानिक विभाजित रहे। लेकिन धीरे धीरे वैज्ञानिक प्रयोगो और निरिक्षणो से महाविस्फोट के सिद्धांत को समर्थन बढता गया। १९६५ के बाद ब्रम्हांडिय सुक्षम तरंग विकिरण (Cosmic Microwave Radiation) की खोज के बाद इस सिद्धांत को सबसे ज्यादा मान्य सिद्धांत का दर्जा मिल गया। आज की स्थिती मे खगोल विज्ञान का हर सिध्दांत इसी सिद्धांत पर आधारित है और इसी सिद्धांत का विस्तार है।

महाविस्फोट के बाद शुरुवाती ब्रम्हांड समांगी और सावर्तिक रूप से अत्याधिक घन्तव का और उर्जा से भरा हुआ था. उस समय दबाव और तापमान भी अत्याधिक था। यह धीर धीरे फैलता गया और ठंडा होता गया, यह प्रक्रिया कुछ वैसी थी जैसे भाप का धीरे धीरे ठंडा हो कर बर्फ मे बदलना, अंतर इतना ही है कि यह प्रक्रिया मूलभूत कणो(इलेक्ट्रान, प्रोटान, फोटान इत्यादि) से संबधीत है।

प्लैंक काल() के १० -३५ सेकंड के बाद एक संक्रमण के द्वारा ब्रम्हांड की काफी तिव्र गति से वृद्धी(exponential growth) हुयी। इस काल को अंतरिक्षिय स्फिती(cosmic inflation) काल कहा जाता है। इस स्फिती के समाप्त होने के पश्चात, ब्रम्हांड का पदार्थ एक क्वार्क-ग्लूवान प्लाज्मा की अवस्था मे था, जिसमे सारे कण गति करते रहते हैं। जैसे जैसे ब्रम्हांड का आकार बढने लगा, तापमान कम होने लगा। एक निश्चित तापमान पर जिसे हम बायरोजिनेसीस संक्रमण कहते है, ग्लुकान और क्वार्क ने मिलकर बायरान (प्रोटान और न्युट्रान) बनाये। इस संक्रमण के दौरान किसी अज्ञात कारण से कण और प्रति कण(पदार्थ और प्रति पदार्थ) की संख्या मे अंतर आ गया। तापमान के और कम होने पर भौतिकी के नियम और मूलभूत कण आज के रूप मे आस्तिव मे आये। बाद मे प्रोटान और न्युट्रान ने मिलकर ड्युटेरीयम और हिलीयम के केंद्रक बनाये, इस प्रक्रिया को महाविस्फोट आणविक संश्लेषण(Big Bang nucleosynthesis.) कहते है। जैसे जैसे ब्रम्हांड ठंडा होता गया, पदार्थ की गति कम होती गयी, और पदार्थ की उर्जा गुरुत्वाकर्षण मे तब्दिल होकर विकिरण की उर्जा से अधिक हो गयी। इसके ३००,००० वर्ष पश्चात इलेक्ट्रान और केण्द्रक ने मिलकर परमाणू (अधिकतर हायड्रोजन) बनाये; इस प्रक्रिया मे विकिरण पदार्थ से अलग हो गया । यह विकिरण ब्रम्हाण्ड मे अभी तक ब्रम्हाण्डीय सुक्ष्म तरंग विकिरण (cosmic microwave radiation)के रूप मे बिखरा पडा है।

कालांतर मे थोडे अधिक घनत्व वाले क्षेत्र गुरुत्वाकर्षण के द्वारा और ज्यादा घनत्व वाले क्षेत्र मे बदल गये। महाविस्फोट से पदार्थ एक दूसरे से दूर जा रहा था वंही गुरुत्वाकर्षण इन्हे पास खिंच रहा था। जहांपर पदार्थ का घनत्व ज्यादा था वहां पर गुरुत्वाकर्षण बल ब्रम्हांड के प्रसार के लिये कारणीभूत बल से ज्यादा हो गया। गुरुत्वाकर्षण बल की अधिकता से पदार्थ एक जगह इकठ्ठा होकर विभिन्न खगोलिय पिण्डो का निर्माण करने लगा। इस तरह गैसो के बादल, तारो, आकाशगंगाओ और अन्य खगोलिय पिंडो का जन्म हुआ,जिन्हे आज हम देख सकते है।

आकाशिय पिण्डो के जन्म की इस प्रक्रिया की और विस्तृत जानकारी पदार्थ की मात्रा और प्रकार पर निर्भर करती है। पदार्थ के तिन संभव प्रकार है शीतल श्याम पदार्थ (cold dark matter)(), तप्त श्याम पदार्थ(hot dark matter) तथा बायरोनिक पदार्थ। खगोलिय गणना के अनुसार शीतल श्याम पदार्थ की मात्रा सबसे ज्यादा(लगभग ८०%) है। मानव द्वारा निरिक्षित लगभग सभी आकाशीय पिण्ड बायरोनिक पदार्थ () से बने है।

श्याम पदार्थ की तरह आज का ब्रम्हाड एक रहस्यमय प्रकार की उर्जा,श्याम उर्जा (dark energy)() के वर्चश्व मे है। लगभग ब्रम्हांड की कुल उर्जा का ७०% भाग इसी उर्जा का है। यही उर्जा ब्रम्हांड के विस्तार की गति को एक सरल रैखीक गति-अंतर समीकरण से विचलीत कर रही है, यह गति अपेक्षित गति से कहीं ज्यादा है। श्याम उर्जा अपने सरल रूप मे आईन्स्टाईन के समीकरणो मे एक ब्रम्हांडिय स्थिरांक(cosmological constant) है । लेकिन इसके बारे मे हम जितना जानते है उससे कहीं ज्यादा नही जानते है। दूसरे शब्दो मे भौतिकी मे मानव को जितने बल() ज्ञात है वे सारे बल और भौतिकी के नियम ब्रम्हांड के विस्तार की गति की व्याख्या नही कर पा रहे है। इसे व्याख्या करने क एक काल्पनिक बल का सहारा लिया गया है जिसे श्याम उर्जा कहा जाता है।

यह सभी निरीक्षण लैम्डा सी डी एम माडेल के अंतर्गत आते है, जो महाविस्फोट के सिद्धांत की गणीतिय रूप से छह पैमानो पर व्याख्या करता है। रहस्य उस समय गहरा जाता है जब हम शुरूवात की अवस्था की ओर देखते है, इस समय पदार्थ के कण अत्याधिक उर्जा के साथ थे, इस अवस्था को किसी भी प्रयोगशाला मे प्राप्त नही किया जा सकता है। ब्रम्हांड के पहले १० -३३ सेकंड की व्याख्या करने के लिये हमारे पास कोइ भी गणितिय या भौतिकिय माडेल नही है, जिस अवस्था का अनुमान ब्रहृत एकीकृत सिद्धांत(Grand Unification Theory)() करता है। पहली नजर से आईन्स्टाईन का गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत एक गुरुत्विय बिन्दू (gravitational singularity) का अनुमान करता है जिसका घन्तव अपरिमित (infinite) है।. इस रहस्य को सुलझाने के लिये क्वांटम गुरुत्व के सिद्धांत की आवश्यकता है। इस काल (ब्रम्हांड के पहले १० -३३ सेकंड) को समझ पाना विश्व के सबसे महान अनसुलझे भौतिकिय रहस्यो मे से एक है।

मुझे लग रहा है इस लेख ने महाविस्फोट के सिद्धांत की गुत्थी को कुछ और उलझा दिया है, इस गुत्थी को हम धीरे धीरे आगे के लेखो मे विस्तार से चर्चा कर सुलझाने का प्रयास करेंगे। अगला लेख श्याम पदार्थ (Dark Matter) और श्याम उर्जा(dark energy) पर होगा।

सागर जी क्या ख्याल है, आपके प्रश्नो की सुची कम हुयी या और बढ गयी?

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(१) लाल विचलन (Red Shift) के बारे मे यहां देखे.

()ब्रम्हांडीय सिद्धांत (Cosmological Principle) :यह एक सिद्धांत नही एक मान्यता है। इसके अनुसार ब्रम्हांड समांगी(homogeneous) और सावर्तिक(isotrpic) है| एक बडे पैमाने पर किसी भी जगह से निरिक्षण करने पर ब्रम्हांड हर दिशा मे एक ही जैसा प्रतित होता है।

()ब्रम्हाडीय सुक्ष्म तरंग विकिरण(cosmic microwave background radiation-CMB): यह ब्रम्हांड के उत्पत्ती के समय से लेकर आज तक सम्पूर्ण ब्रम्हांड मे फैला हुआ है। इस विकिरण को आज भी महसूस किया जा सकता है।

()निहारिका (Nebula) : ब्रम्हांड मे स्थित धुल और गैस के बादल।

() प्लैंक काल:मैक्स प्लैंक के नाम पर पर, ब्रम्हांड के इतिहास मे ० से लेकर १० -४३ (एक प्लैंक ईकाइ समय), जब सभी चारो मूलभूत बल(गुरूत्व बल, विद्युत चुंबकिय बल, कमजोर आणविक आकर्षण बल और मजबूत आणविक आकर्षण बल) एक संयुक्त थे और मूलभूत कणो का आस्तित्व नही था।

() श्याम पदार्थ (Dark Matter) और श्याम उर्जा(dark energy) इस पर पूरा एक लेख लिखना है।

()ब्रहृत एकीकृत सिद्धांत(Grand Unification Theory) : यह सिद्धांत अभी अपूर्ण है, इस सिद्धांत से अपेक्षा है कि यह सभी रहस्य को सुलझा कर ब्रम्हाम्ड उत्पत्ती और उसके नियमो की एक सर्वमान्य गणितिय और भौतिकिय व्याख्या देगा।

(८) बायरान : प्रोटान और न्युट्रान को बायरान भी कहा जाता है। विस्तृत जानकारी पदार्थ के मूलभूत कण लेख मे।

(९) भौतिकि के मूलभूत बल :गुरूत्व बल, विद्युत चुंबकिय बल, कमजोर आणविक आकर्षण बल और मजबूत आणविक आकर्षण बल

(१०) : एक प्रकाश वर्ष : प्रकाश द्वारा एक वर्ष मे तय की गयी दूरी। लगभग ९,५००,०००,०००,००० कीलो मिटर। अतंरिक्ष मे दूरी मापने के लिये इस ईकाई का प्रयोग किया जाता है।

(११)आज हम जानते है कि अत्याधुनिक दूरबीन से खरबो आकाशगंगाये देखी जा सकती है, जिसमे से हमारी आकाशगंगा एक है और एक आकाशगंगा मे भी खरबो तारे होते है। हमारी आकासगंगा एक पेंचदार आकाशगंगा है जिसकी चौडाई लगभग हजार प्रकाशवर्ष है और यह धीमे धीमे घुम रही है। इसकी पेंचदारो बाहों के तारे १,०००,००० वर्ष मे केण्द्र की एक परिक्रमा करते है। हमारा सुर्य एक साधारण औसत आकार का पिला तारा है, जो कि एक पेण्च्दार भूजा के अंदर के किनारे पर स्थित है।


ब्रम्हांड की उत्पत्ती

August 24, 2006

सृष्टि से पहले सत नहीं था, असत भी नहीं
अंतरिक्ष भी नहीं, आकाश भी नहीं था
छिपा था क्या कहाँ, किसने देखा था
उस पल तो अगम, अटल जल भी कहाँ था
ऋग्वेद(१०:१२९) से सृष्टि सृजन की यह श्रुती

लगभग पांच हजार वर्ष पुरानी यह श्रुती आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी इसे रचित करते समय थी। सृष्टि की उत्पत्ती आज भी एक रहस्य है। सृष्टि के पहले क्या था ? इसकी रचना किसने, कब और क्यों की ? ऐसा क्या हुआ जिससे इस सृष्टि का निर्माण हुआ ?

अनेको अनसुलझे प्रश्न है जिनका एक निश्चित उत्तर किसी के पास नही है। कुछ सिध्दांत है जो कुछ प्रश्नो का उत्तर देते है और कुछ नये प्रश्न खडे करते है। सभी प्रश्नो के उत्तर देने वाला सिध्दांत अभी तक सामने नही आया है।
सबसे ज्यादा मान्यता प्राप्त सिद्धांत है महाविस्फोट सिध्दांत (The Bing Bang Theory)|

महाविस्फोट सिध्दांत (The Bing Bang Theory)

१९२९ मे एडवीन हब्बल ने एक आश्चर्य जनक खोज की, उन्होने पाया की अंतरिक्ष मे आप कीसी भी दिशा मे देंखे आकाशगंगाये और अन्य आकाशिय पिंड तेजी से एक दूसरे से दूर हो रहे है। दूसरे शब्दो मे ब्रम्हांड का विस्तार हो रहा है। इसका मतलब यह है कि इतिहास मे ब्रम्हांड के सभी पदार्थ आज की तुलना मे एक दूसरे से और भी पास रहे होंगे। और एक समय ऐसा रहा होगा जब सभी आकाशीय पिंड एक ही स्थान पर रहे होंगे, लेकिन क्या आप इस पर विश्वास करेंगे ?
तब से लेकर अब तक खगोलशास्त्रीयों ने उन परिस्थितियो का विश्लेषन करने का प्रयास किया है कि कैसे ब्रम्हांडिय पदार्थ एक दूसरे से एकदम पास होने की स्थिती से एकदम दूर होते जा रहे है।
इतिहास मे किसी समय , शायद १० से २० खरब साल पुर्व , ब्रम्हांड के सभी कण एक दूसरे से एकदम पास पास थे। वे इतने पास पास थे कि वे सभी एक ही जगह थे, एक ही बिंदू पर। सारा ब्रम्हांड एक ही बिन्दू की शक्ल मे था। यह बिन्दू अत्याधिक घनत्व(infinite density) का, अत्यंत छोटा बिन्दू(infinitesimally small ) था। ब्रम्हांड का यह बिन्दू रूप अपने अत्याधिक घनत्व के कारण अत्यंत गर्म(infinitely hot) रहा होगा। इस स्थिती मे भौतिकी, गणित या विज्ञान का कोई भी नियम काम नही करता है। यह वह स्थिती है जब मनुष्य कीसी भी प्रकार अनुमान या विश्लेषन करने मे असमर्थ है। काल या समय भी इस स्थिती मे रूक जाता है, दूसरे शब्दो मे काल और समय के कोई मायने नही रहते है। *


इस स्थिती मे किसी अज्ञात कारण से अचानक ब्रम्हांड का विस्तार होना शुरू हुआ। एक महाविस्फोट के साथ ब्रम्हांड का जन्म हुआ और ब्रम्हांड मे पदार्थ ने एक दूसरे से दूर जाना शुरू कर दिया।
 

महाविस्फोट के १० -४३ सेकंड के बाद, अत्याधिक उर्जा(फोटान कणो के रूप मे) का ही आस्तित्व था। इसी समय क्वार्क , इलेक्ट्रान, एन्टी इलेक्ट्रान जैसे मूलभूत कणो का निर्माण हुआ। इन कणो के बारे हम अगले अंको मे जानेंगे।
 

१० -३४ सेकंड के बाद , क्वार्क और एन्टी क्वार्क जैसे कणो का मूलभूत कणो के अत्याधिक उर्जा के मध्य टकराव के कारण ज्यादा मात्रा मे निर्माण हुआ। इस समय कण और उनके प्रतिकण (१) दोनो का निर्माण हो रहा था , इसमे से कुछ एक कण और उनके प्रतिकण(2) दूसरे से टकरा कर खत्म भी हो रहे थे। इस समय ब्रम्हांड का आकार एक संतरे के आकार का था।
 

१० -१० सेकंड के बाद एन्टी क्वार्क क्वार्क से टकरा कर पुर्ण रूप से खत्म हो चुके थे, इस टकराव से फोटान का निर्माण हो रहा था। साथ मे इसी समय प्रोटान और न्युट्रान का भी निर्माण हुआ।
१ सेकंड के बाद जब तापमान १० खरब डीग्री सेल्सीयस था, ब्रम्हांड ने आकार लेना शुरू किया। उस समय ब्रम्हांड मे ज्यादातर फोटान, इलेक्ट्रान , न्युट्रीनो (३) और उनके प्रती कणो के साथ मे कुछ मात्रा मे प्रोटान तथा न्युट्रान थे।

प्रोटान और न्युट्रान ने एक दूसरे के साथ मिल कर तत्वो(elements) का केन्द्र (nuclei) बनाना शूरू किया जीसे आज हम हाइड्रोजन, हीलीयम, लिथियम और ड्युटेरीयम के नाम से जानते है।
जब महाविस्फोट के बाद तिन मिनिट बीत चुके थे, तापमान गिरकर १ खरब डीग्री सेल्सीयस हो चुका था, तत्व और ब्रम्हान्डीय विकिरण(cosmic radiation) का निर्माण हो चुका था। यह विकिरण आज भी मौजुद है और इसे महसूस किया जा सकता है।
 

आगे बढने पर ३००,००० वर्ष के पश्चात विस्तार करता हुआ ब्रम्हांड अभी भी आज के ब्रम्हांड से मेल नही खाता था। तत्व और विकीरण एक दूसरे से अलग होना शूरू हो चुके थे। इसी समय इलेक्ट्रान , केन्द्रक के साथ मे मिल कर परमाणु का निर्माण कर रहे थे। परमाणु मिलकर अणु बना रहे थे।
 

इस के १ खरब वर्ष पश्चात ब्रम्हांड का एक निश्चित सा आकार बनना शुरू हुआ था। इसी समय क्वासर, प्रोटोगैलेक्सी(आकाशगंगा का प्रारंभीक रूप), तारो का जन्म होने लगा था। तारे हायोड्राजन जलाकर भारी तत्वो का निर्माण कर रहे थे।
आज महाविस्फोट के लगभग १५ खरब साल पश्चात की स्थीती देखे ! तारो के साथ उनका सौर मंडल बन चुका है। परमाणु मिलकर कठीन अणु बना चुके है। जिसमे कुछ कठीन अणु जिवन( उदा: Amino Acid) के मुलभूत कण है। यही नही काफी सारे तारे मरकर श्याम वीवर(black hole) बन चुके है।
ब्रम्हांड का अभी भी विस्तार हो रहा है, और विस्तार की गति बढती जा रही है। विस्तार होते हुये ब्रम्हाण्ड की तुलना आप एक गुब्बारे से कर सकते है, जिस तरह गुब्बारे को फुलाने पर उसकी सतह पर स्थित बिन्दू एक दूसरे से दूर होते जाते है उसी तरह आकाशगंगाये एक दूसरे से दूर जा रही है। यह विस्तार कुछ इस तरह से हो रहा है जिसका कोई केन्द्र नही है, हर आकाश गंगा दूसरी आकाशगंगा से दूर जा रही है।
 

वैकल्पिक सिध्दांत (The Alternative Theory)

इस सिध्दांत के अनुसार काल और अंतरिक्ष एक साथ महाविस्फोट के साथ प्रारंभ नही हुये थे। इसकी मान्यता है कि काल अनादि है, इसका ना तो आदि है ना अंत। आइये इस सिद्धांत को जाने।
आकाशगंगाओ(Galaxy) और आकाशीय पिंडो का समुह अंतरिक्ष मे एक मे एक दूसरे से दूर जाते रहता है।महाविस्फोट के सिद्धांत के अनुसार आकाशिय पिण्डो की एक दूसरे से दूर जाने की गति महाविस्फोट के बाद के समय और आज के समय की तुलना मे कम है। इसे आगे बढाते हुये यह सिध्दांत कहता है कि भविष्य मे आकाशिय पिंडो का गुरूत्वाकर्षण इस विस्तार की गति पर रोक लगाने मे सक्षम हो जायेगा। इसी समय विपरित प्रक्रिया का प्रारंभ होगा अर्थात संकुचन का। सभी आकाशिय पिंड एक दूसरे के नजदिक और नजदिक आते जायेंगे और अंत मे एक बिन्दू के रुप मे संकुचित हो जायेंगे। इसी पल एक और महाविस्फोट होगा और एक नया ब्रम्हांड बनेगा, विस्तार की प्रक्रिया एक बार और प्रारंभ होगी।
यह प्रक्रिया अनादि काल से चल रही है, हमारा विश्व इस विस्तार और संकुचन की प्रक्रिया मे बने अनेको विश्व मे से एक है। इसके पहले भी अनेको विश्व बने है और भविष्य मे भी बनते रहेंगे। ब्रम्हांड के संकुचित होकर एक बिन्दू मे बन जाने की प्रक्रिया को महासंकुचन(The Big Crunch) के नाम से जाना जाता है। हमारा विश्व भी एक ऐसे ही महासंकुचन मे नष्ट हो जायेगा, जो एक महाविस्फोट के द्वारा नये ब्रम्हांड को जन्म देगा। यदि यह सिध्दांत सही है तब यह संकुचन की प्रक्रिया आज से १ खरब ५० अरब वर्ष पश्चात प्रारंभ होगी।
 

यथास्थिती सिध्दांत(The Quite State Theory)

महाविस्फोट का सिद्धांत सबसे ज्यादा मान्य सिद्धांत है लेकिन सभी वैज्ञानिक इससे सहमत नही हैं । वे मानते है कि ब्रम्हांड अनादि है, इसका ना तो आदि है ना अंत। उनके अनुसार ब्रम्हांड का महाविस्फोट से प्रारंभ नही हुआ था ना इसका अंत महासंकुचन से होगा।
यह सिद्धांत मानता है कि ब्रम्हाड का आज जैसा है वैसा ये हमेशा से था और हमेशा ऐसा ही रहेगा। लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है।

इस अंक मे ब्रम्हांड की उतपत्ती के बारे मे हमने चर्चा की,अगले अंक मे हम महाविस्फोट और भौतिकी मे मूलभूत सिद्धांतो की विस्तार से चर्चा करेंगे।

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(*) इस विषय पर पूरा एक लेख लिखना है।

(१)कण और प्रतिकण: पदार्थ के हर मूलभूत कण का प्रतिकण भी होता है। जैसे इलेक्ट्रान के लिये एन्टी इलेक्ट्रान(पाजीट्रान), प्रोटान-एन्टी प्रोटान , न्युट्रान -एन्टीन्युट्रान इत्यादि. जब एक कण और उसका प्रतिकण टकराते है दोनो उर्जा(फोटान) मे बदल जाते है। यदि आपको कभी आपका एन्टी मनुष्य मिले तब आप उससे हाथ मिलाने की गल्ती ना करें। आप दोनो एक धमाके के रूप मे उर्जा मे बदल जायेंगे।

(२)ये भी एक रहस्य है कि ब्रम्हांड के निर्माण के समय कण और प्रतिकण दोनो बने, लेकिन कणो की मात्रा इतनी ज्यादा क्यो है ? क्या प्रतिब्रम्हांड (Anti Universe) का भी आस्तित्व है ?
(३) न्युट्रीनो का मतलब न्युट्रान नही है, ये इलेक्ट्रान के समान द्रव्यमान रखते है लेकिन इन पर आवेश(+/-) नही होता है।