मार्च 28, 2011
यह श्रंखला ‘पदार्थ और उसकी संरचना‘ पर आधारित है। इस विषय पर हिन्दी में लेखो का अभाव है ,इन विषय को हिन्दी में उपलब्ध कराना ही इस श्रंखला को लिखे जाने का उद्देश्य है। इन श्रंखला के विषय होंगे:
- १. मूलभूत कण(Elementary particles)
- २.मूलभूत बल(Elementary Forces)
- ३.मानक प्रतिकृति(Standard Model)
- ४.प्रति पदार्थ(Antimatter)
- ५. ऋणात्मक पदार्थ(Negative Matter)
- ६. ग्रह, तारे, आकाशगंगा और निहारिका
- ७. श्याम वीवर(Black Hole)
- ८.श्याम पदार्थ तथा श्याम ऊर्जा (Dark Matter and Dark Energy)
- ९. ब्रह्मांड का अंत (Death of Universe)
पदार्थ पृथक सूक्ष्म कणो से बना होता है और उसे मनमाने ढंग से सूक्ष्म से सूक्ष्मतम रूप मे तोड़ा नही जा सकता है, यह सिद्धांत पिछले सहस्त्र वर्षो से सर्वमान्य है। लेकिन यह सिद्धांत दार्शनिक आधार पर ही था, इसके पिछे प्रयोग और निरिक्षण का सहारा नही था। दर्शनशास्त्र मे इस पृथक सूक्ष्म कण अर्थात परमाणु की प्रकृती विभिन्न संस्कृती और सभ्यताओ मे अलग अलग तरह से परिभाषित की गयी थी। एक परमाणु का मूलभूत सिद्धांत वैज्ञानिको द्वारा रसायन शास्त्र मे नये आविष्कार के पश्चात पिछली कुछ शताब्दी मे मान्य हुआ है।
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मार्च 22, 2011

नाभिकिय विकिरण(बड़ा करके देखने के लिए चित्र पर क्लीक करें !)
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मार्च 21, 2011
११ मार्च २०११ को जापान मे आये रिक्टर स्केल पर ९.० के भूकंप और भूकंप से उत्पन्न सुनामी से हुयी जान माल की हानी से सम्पूर्ण मानव जाति दुखी है। मानवता को हुयी इस क्षति के लिये ये दो कारक भूकंप और सूनामी काफी नही थे कि एक तीसरा संकट आ खड़ा हुआ। जापान के फुकुशीमा के नाभिकिय संयंत्र से नाभिकिय विकिरण का संकट पैदा हो गया है।

नाभिकिय संयंत्र की कार्यप्रणाली
४० वर्ष पूराने फुकुशीमा के दायची नाभिकिय संयंत्र मे आयी इस गड़बड़ी का कारण वैकल्पिक सुरक्षा जनरेटर का काम ना करना है। यह वैकल्पिक सुरक्षा जनरेटर नाभिकिय संयंत्र को उसके काम ना करने की स्थिति मे ठंडा रखते है। ठंडा रखने का यह कार्य किसी शीतक को संयंत्र मे पंप कर किया जाता है, यह शीतक पानी भी हो सकता है। सामान्य स्थिति मे नाभिकिय संयत्र से उत्पन्न विद्युत ही उसे ठंडा करने के कार्य मे उपयोग की जाती है लेकिन रखरखाव के समय जब नाभिकिय संयत्र को बंद किया जाता है तब यह वैकल्पिक जनरेटर से उत्पन्न विद्युत ही संयत्र को ठंडा करने के कार्य मे उपयोग की जाती है। इन्ही वैकल्पिक सुरक्षा जनरेटरो को रखरखाव के अतिरिक्त आपातकालीन स्थिति मे प्रयोग किया जाता है।
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मार्च 14, 2011

१९५२ मे न्युजर्सी स रा अमरीका मे दिखायी दी कथित उड़नतश्तरी का चित्र
कुछ लोगो का विश्वास है कि परग्रही प्राणी उड़नतश्तरीयो से पृथ्वी की यात्रा कर चूके है। वैज्ञानिक सामान्यतः उड़नतश्तरी के समाचारो पर विश्वास नही करते है और तारो के मध्य की विशाल दूरी के कारण इसकी संभावना को रद्द कर देते है। वैज्ञानिको इस ठंडी प्रतिक्रिया के बावजूद उड़नतश्तरी दिखने के समाचार कम नही हुये है।
उड़नतश्तरीयो के देखे जाने के दावे लिखित इतिहास की शुरुवात तक जाते है। बाईबल मे ईश्वर के दूत इजेकील ने रहस्यमय ढंग से आकाश मे ’चक्र के अंदर चक्र’ का उल्लेख किया है जिसे कुछ लोग उड़नतश्तरी मानते है। १४५० ईसा पूर्व मिश्र के फराओ टूटमोस तृतिय के काल मे मिश्री(इजिप्त) इतिहासकारो ने आकाश मे ५ मीटर आकार के ’आग के वृत’ का उल्लेख किया है जो सूर्य से ज्यादा चमकदार थे और काफी दिनो तक आकाश मे दिखायी देते रहे तथा अंत मे आकाश मे चले गये। ईसापूर्व ९१ मे रोमन लेखक जूलियस आब्सक्युन्स ने एक ग्लोब के जैसे गोलाकार पिंड के बारे मे लिखा है आकाशमार्ग से गया था। १२३४ मे जनरल योरीतसुमे और उसकी सेना ने क्योटो जापान के आकाश मे रोशनी के गोलो को आकाश मे देखा था। १५५६ मे नुरेमबर्ग जर्मनी मे आकाश मे किसी युद्ध के जैसे बहुत सारे विचित्र पिंडो को देखा था।
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मार्च 7, 2011
यदि हम मानव इतिहास के पिछले १००,००० वर्षो मे विज्ञान के विकास पर दृष्टिपात करे तो हम पायेंगे कि यह अफ्रिका मे मानव के जन्म से लेकर अब तक यह उर्जा की खपत मे बढो़त्तरी का इतिहास है। रशियन खगोल विज्ञानी निकोलाइ कार्दाशेव के अनुसार सभ्यता के विकास के विभिन्न चरणो को ऊर्जा की खपत के अनुसार श्रेणीबद्ध लिया जा सकता है। इन चरणो के आधार पर परग्रही सभ्यताओं का वर्गीकरण किया जा सकता है। भौतिकी के नियमो के अनुसार उन्होने संभव सभ्यताओं को तीन प्रकार मे बांटा। 1
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Posted in अनसुलझे रहस्य, एक्स्ट्राटेरेस्ट्रीयल जीवन, ब्रह्मांड, युएफ़ओ |
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