स्ट्रींग सिद्धांत: विज्ञान या दर्शन ?


स्ट्रींग सिद्धांत ब्रह्माण्ड के अध्ययन और व्याख्या की एक क्रांतिकारी विधि है। यह हमारे ब्रह्माण्ड के हर पहलू की व्याख्या करती है, पदार्थ का निर्माण करने वाले कण तथा पदार्थ पर प्रतिक्रिया करने बलों की वह ऊर्जा की अत्यंत सुक्ष्म तंतुओ के रूप मे सफल व्याख्या करती है। स्ट्रींग सिद्धांत के अनुसार ऊर्जा के अत्यंत सुक्ष्म तंतु या तंतुवलय इस ब्रह्माण्ड के छोटे परमाण्विक कणो से लेकर विशालकाय आकाशगंगा के व्यवहार तथा संरचना को समझने की मुख्य कुंजी है।

स्ट्रींग सिद्धांत के आलोचको का मानना है कि यह सिद्धांत “थ्योरी आफ एवरीथींग” के रूप मे असफल रहा है। इसके आलोचको मे  पीटर वोइट(Peter Woit) ली स्मोलीन(Lee Smolin)फिलीप वारेन एन्डरसन(Philip Warren Anderson)शेल्डन ग्लाशो (Sheldon Glashow)लारेंस क्राउस (Lawrence Krauss), तथा कार्लो रोवेल्ली(Carlo Rovelli) जैसे बड़े नाम है।

स्ट्रींग सिद्धांत की आलोचना के मुख्य बिंदु है :

  • अत्यधिक मात्रा मे ऊर्जा की आवश्यकता से क्वांटम  गुरुत्वाकर्षण के प्रायोगिक परीक्षण मे असमर्थता।
  • अत्यधिक रूप से संभव परिणामों के कारण पूर्वानुमान  मे असमर्थता।
  • पृष्ठभूमि स्वतंत्रता (background independence) का अभाव।

अत्यधिक मात्रा मे ऊर्जा की आवश्यकता

यह माना जाता है कि क्वांटम गुरुत्वाकर्षण के किसी भी सिद्धांत के प्रायोगिक परीक्षण के लिये अत्याधिक ऊर्जा की आवश्यकता होगी, जो कि लार्ज हेड्रान कोलाईडर जैसे कण त्वरकों की क्षमता के बाहर है। इसके पीछे कारण यह है कि स्ट्रींग सिद्धांत की स्ट्रींग या तंतु प्लैंक दूरी से थोड़े ही बड़े होते है, जो कि प्रोटान की त्रिज्या से भी कम होती है। इतनी लघु दूरी पर के किसी भी प्रयोग के मापन हेतु अत्याधिक ऊर्जा चाहीये होती है। साधारण शब्दो मे क्वांटम गुरुत्वाकर्षण का प्रायोगिक परीक्षण कठिन है क्योंकि गुरुत्वाकर्षण बल अन्य बलो की तुलना मे अत्यंत कमजोर है तथा क्वांटम प्रभाव प्लैंक स्थिरांक (h) द्वारा नियंत्रित होते है और वह भी एक सुक्ष्म राशी है जिसके फलस्वरूप क्वांटम गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव अत्यंत कमजोर होता है।

कितने ब्रह्माण्ड ?

स्ट्रींग सिद्धांत के समीकरणों का एक हल(Solution) नही है, इसके बड़ी संख्या मे हल  होते है। इन हलों को जिन्हे स्ट्रींग निर्वात(String Vaccua) कहते है। ये स्ट्रींग-निर्वात एक दूसरे से इतने भिन्न होते है कि ये कम ऊर्जा पर दृश्यमान हर संभव स्वरूप का समावेश कर सकते है।

अभी तक इस सिद्धांत की निर्वात-संरचना(Vaccua Structure) को अच्छी तरह से समझा नही जा सका है।

स्ट्रींग सिद्धांत के अनुसार भिन्न मितस्थायी(meta-stable) स्ट्रींग निर्वात की संख्या असंख्य  हो सकती है। हर  एक निर्वात मे एक ब्रह्माण्ड संभव है और इन असंख्य निर्वातो मे  से 10520* निर्वात “हमारे ब्रह्माण्ड के जैसे” है। हमारे ब्रह्माण्ड के जैसे का अर्थ है कि इनमे भी 4 आयाम(4 dimension), विशाल प्लैंक पैमाना(large Plank Scale), गाज समूह(Gauge group) तथा चीराल(chiral) फर्मीयान है।  इनमे से प्रत्येक स्ट्रींग-निर्वात एक संभव ब्रह्माण्ड से संबधित है लेकिन वह दूसरे संभव ब्रह्माण्ड से भिन्न है अर्थात दूसरे संभव ब्रह्माण्ड से भिन्न तरह के कण तथा बल से बना है। हमारे ब्रह्मांड के लिये किस स्ट्रींग-निर्वात को चुना जाये एक अनसुलझा प्रश्न है। इस सिद्धांत मे कोई भी सतत कारक (continuous parameters ) नही है, इसमे संभव ब्रह्मांडो का एक बड़ा सा समूह है जो एक दूसरे से एकदम भिन्न है।

लेकिन कुछ वैज्ञानिक इसे अच्छा मानते है क्योंकि यह हमारे ब्रह्माण्ड के विभिन्न भौतिक स्थिरांको के लिए एक प्राकृतिक और सरल स्पष्टीकरण देता है, विशेष रूप से ब्रह्मांडीय स्थिरांक की लघु मूल्य का। इसके पिछे तर्क यह है कि अधिकतर अन्य ब्रह्माण्डो मे इन भौतिक स्थिरांको का मूल्य इस तरह है कि उसमे जीवन संभव नही है, हम सबसे ज्यादा मित्रवत ब्रह्माण्ड मे रहते है। यह तर्क पृथ्वी पर जीवन पर भी लागु किया जाता है कि क्यों पृथ्वी एक मध्यम आकार के तारे सूर्य की असंख्य संभव कक्षाओ मे से केवल गोल्डीलाक क्षेत्र वाले कक्षा मे है। इस तर्क को आगे बढ़ाते हुये आकाशगंगा के अपेक्षाकृत शांत और स्थिर क्षेत्र मे सौरमंडल पर भी लागु किया जाता है।

स्ट्रींग सिद्धांत विज्ञान या दर्शन ?

कुछ भौतिक विज्ञानी जिसमे कुछ स्ट्रींग सिद्धांत के समर्थकों का  भी समावेश है मानते है कि स्ट्रींग सिद्धांत के क्रांतिकारी विचार का सामान्य विज्ञान की तरह मान्यता प्राप्त करना एक नाज़ुक धागे के द्वारा लटका हुआ है। इस सिद्धांत का मूल ’स्ट्रींग अर्थात तंतु’ किसी भी परमाण्विक कण से छोटा है और इसे देखा जाना या इसका परीक्षण कर पाना असंभव है। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या स्ट्रींग सिद्धांत की प्रायोगिक परीक्षण संभव है ?

शेल्डन ग्लाशो

शेल्डन ग्लाशो

वैज्ञानिक तौर पर किसी भी सिद्धांत के उपयोगी तथा मान्य होने के लिये, उस सिद्धांत द्वारा ऐसे पूर्वानुमान संभव होना चाहीये जिसका परीक्षण किया जा सके। इन पूर्वानुमानो को परीक्षण द्वारा प्रमाणित करना उस सिद्धांत को सहारा देता है जबकि परीक्षण मे असफलता दर्शाती है कि सिद्धांत गलत हो सकता है। जब तक इस तरह के परीक्षण संभव नही होते है, तब तक कोई भी सिद्धांत दार्शनिक (philosophical) ही होता है ,वैज्ञानिक (scientific)  नही ! स्ट्रींग सिद्धांत आधारित गणितीय सिद्धांत भले ही कुछ अनसुलझे धारणाओं की व्याख्या करने मे सक्षम हो लेकिन परीक्षणो की अनुपस्थिति मे इसे शायद ही कभी वैज्ञानिक सिद्धांत के तौर पर मान्यता मिले।

भौतिक विज्ञानी शेल्डन ग्लासो  ने एक साक्षात्कार मे कहा था :

स्ट्रींग सिद्धांत के वैज्ञानिको के पास एक दृढ़ तथा खूबसूरत लगने वाला जटिल सिद्धांत है लेकिन वह मेरी समझ से बाहर है। इस सिद्धांत द्वारा गुरुत्वाकर्षण की व्याख्या करने वाला क्वांटम सिद्धांत प्राप्त होता है लेकिन उससे कोई भी पूर्वानुमान प्राप्त नही किया जा सकता। यह कहा जा सकता है कि इस सिद्धांत से ना कोई प्रयोग किया जा सकता है नाही कोई निरीक्षण किया जा सकता है, जिससे यह कह सके कि “आप गलत है।” यह एक सुरक्षित सिद्धांत है, हमेशा के लिये। मै आपसे पूछता हूं कि यह भौतिकशास्त्र का सिद्धांत है या दर्शनशास्त्र का ?

निर्वात ऊर्जा की व्याख्या मे असफलता

स्टीवन वेनबर्ग

स्टीवन वेनबर्ग

भौतिकशास्त्र के सामने सबसे बड़ा अनसुलझा प्रश्न है, ब्रह्मांडीय स्थीरांक(cosmological constant) अर्थात निर्वात की ऊर्जा है, इसे प्रकृति मे देखा जा चुका है लेकिन इसकी कोई व्याख्या नही है। स्ट्रींग सिद्धांत अपने क्रांतिकारी अवधारणाओ के बाद भी इसपर कोई रोशनी डालने मे असमर्थ है। यदि आप रिक्त अंतरिक्ष की समस्त ऊर्जा की गणना करे और हमारी भौतिकी द्वारा ज्ञात हर संभव तरंग का समावेश करें, एक अविश्वशीय रूप से विशालकाय ऊर्जा प्राप्त होती है, जो इतनी विशाल होती है कि उससे ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति मे विस्तार की व्याख्या संभव है। लेकिन प्रायोगिक परीक्षणो द्वारा प्राप्त निर्वात ऊर्जा का मूल्य अत्यंत कम है। कहीं कुछ ऐसी जटिल गणनाये होना चाहीये जिससे यह ऊर्जा निर्वात अंतरिक्ष मे लघु हो जाती है।

स्ट्रींग सिद्धांत से यह नही समझा जा सकता है कि निर्वात की ऊर्जा का प्रायोगिक परीक्षणो द्वारा प्राप्त मूल्य इतना कम क्यों है। स्ट्रींग सिद्धांत से इस जटिल प्रश्न के हल की आशा थी लेकिन वह भी इसे हल नही कर पा रहा है। स्टीवन वेनबर्ग के अनुसार यह स्ट्रींग सिद्धांत की सबसे बड़ी असफलता है।

स्ट्रींग सिद्धांत का भविष्य

इस सिद्धांत का भविष्य इस सिद्धांत के जैसे ही अस्पष्ट है। यह एक बेहतरीन गणितीय माडेल है जिसने अनेक प्रश्नो का उत्तर दिया है लेकिन कई नये प्रश्न भी खड़े किये है। इस सिद्धांत द्वारा परीक्षण के योग्य पूर्वानुमान न लगा पाने की असमर्थता इस पर कई प्रश्न चिह्न खड़े  करती है लेकिन यह सिद्धांत अभी तक पूरी तरह से विकसित नही हुआ है। भविष्य मे शायद यह सिद्धांत इन प्रश्न चिह्नो का उत्तर देने मे समर्थ हो।

(समाप्त) : यह श्रृंखला इस लेख के साथ समाप्त होती है। इस श्रृंखला के कुछ लेख जटिल हो गये है, उन लेखों को दोबारा सरल भाषा मे प्रस्तुत करने का मेरा प्रयास रहेगा।

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*10520  : 10 के पश्चात 520 शून्य

6s टिप्पणियाँ to “स्ट्रींग सिद्धांत: विज्ञान या दर्शन ?”

  1. “प्रायोगिक परीक्षणों” के अपने मानक हैं। तार्किक सोच जहां अन्य बातों में निर्बाध बहती है, इन मानकों पर प्रश्न नहीं करती।

    आप कह सकते हैं कि यह टिप्पणी क्वासी-दार्शनिक/पोयटिक हुई, वैज्ञानिक नहीं। :lol:

  2. Stering siddhant ki vastavikta jo bhi ho, per bhauti ka Antim siddhant yani Grand unified theory ka poora vikas jab bhi hoga, wo siddh nahi kiya ja sakega! Antim siddhant darshnik bindu se hi sonchne per niklega.

  3. stephen hawking ki ek book hai, theory of everything!
    To usme kya hoga? Apko pata hai uske bare me kuchh?

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