मई 20, 2011
वर्षो से हमारी आकाशगंगा ’मंदाकिनी’ के केन्द्र के निरिक्षण मे लगे खगोलविज्ञानियो ने एक नयी खोज की है। इसके अनुसार हमारी आकाशगंगा मे अरबो बृहस्पति के आकार के ’आवारा ग्रह’ हो सकते है जो किसी तारे के गुरुत्वाकर्षण से बंधे हुये नही है। एक तथ्य यह भी है कि ऐसे आवारा ग्रहो की संख्या आकाशगंगा के तारों की संख्या से दूगनी हो सकती है, तथा इन आवारा ग्रहों की संख्या तारों की परिक्रमा करते सामान्य ग्रहों से भी ज्यादा है।
विज्ञान पत्रिका ’नेचर(Nature)’ मे ’खगोलभौतिकी मे माइक्रोलेंसींग निरीक्षण (Microlensing Observations in Astrophysics- MOA)’ प्रोजेक्ट द्वारा इस खोज के परिणाम प्रकाशित हुये है। इस प्रोजेक्ट मे किसी तारे के प्रकाश मे उसकी परिक्रमा करते ग्रह से आयी प्रकाश के निरीक्षण वाली तकनीक का प्रयोग नही हुआ है। माइक्रोलेंसींग पृष्ठभूमी मे स्थित तारे पर किसी दूरस्थ ग्रह(१) के प्रभाव का अध्यन करती है।
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फ़रवरी 23, 2011
खगोलीय पिंडो का आकार और उनके मध्य की दूरी इतनी विशाल होती है कि वह मनुष्य की कल्पना से बाहर हो जाती है। इस लेख के चित्र पृथ्वी से शुरुवात कर बढ़ते क्रम मे पिंडो के आकार को दर्शा रहे है।
सबसे पहले सौर मंडल के आंतरिक ग्रह। यह सभी ग्रह ठोस है। बुध सबसे छोटा है और बढते क्रम मे मंगल, शुक्र और पृथ्वी है। शुक्र और पृथ्वी लगभग समान है।

बुध, मंगल, शुक्र और पृथ्वी
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फ़रवरी 3, 2011

केप्लर ११ तारा अपने ग्रहो के साथ(कल्पना)
नासा की अंतरिक्ष वेधशाला केप्लर का प्रयोग करते हुये खगोलशास्त्रीयो ने एक छः ग्रहो वाला सौर मंडल खोज निकाला है। लेकिन यह सौर मंडल विचित्र है क्योंकि इसके छः मे से पांच ग्रह अपने मातृ तारे के काफी समीप की कक्षा मे है। यह कक्षा बुध ग्रह की कक्षा से भी छोटी है।
इनमे से किसी भी ग्रह को पृथ्वी जैसा नही कह सकते क्योंकि वे सभी पृथ्वी से ज्यादा द्रव्यमान और अत्याधिक गर्म है। लेकिन यह खोज इसलिये महत्वपूर्ण है कि केप्लर अभियान उत्साहजनक परिणाम देने लगा है।
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जनवरी 11, 2011

केप्लर १०बी(चित्रकार की कल्पना)
खगोल विज्ञानीयो ने सौर मंडल के बाहर पहला ग्रह खोज निकाला है जो गैस महाकाय(Gas Giant) नही है। अभी तक सौर मंडल के बाहर खोजे गये सभी ग्रह बृहस्पति या शनि के जैसे गैसो के महाकाय पिंड थे। यह नया खोजा गया ग्रह अत्याधिक घनत्व का, चट्टान और धातु का पृथ्वी से थोड़ा ही बड़ा ग्रह है।
इस ग्रह को केप्लर १० बी नाम दिया गया है और यह केप्लर १० तारे की परिक्रमा कर रहा है। इसे पृथ्वी की परिक्रमा करती हुयी ‘केप्लर दूरबीन’ द्वारा खोजा गया है। केप्लर १० तारे का द्रव्यमान और तापमान सूर्य के जैसा है और हमसे ५०० प्रकाशवर्ष दूर है।
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दिसम्बर 3, 2010
आप से एक मासूम सा प्रश्न है। कितने दिनों पहले आपने रात्रि में आसमान में सितारों को देखा है ? कुछ दिन, कुछ माह या कुछ वर्ष पहले ? कब आप अपने घर की छत पर या आंगन में आसमानी सितारों के तले सोये है ? बच्चों को तारों को दिखाकर बताया है कि वह जो तारा दिख रहा है वह ध्रुव तारा है, उसके उपर सप्तऋषि है ? वो देखो आकाश के मध्य में व्याघ्र है ?
आज इन तारों के बारे में बात की जाये ।
आसमान में जो टिमटिमाते बिन्दु जैसे तारे दिखायी दे रहे है, वह हमारे सूर्य जैसे विशाल है। इनमें से कुछ तो सूर्य से हज़ारों गुणा बड़े और विशालकाय है। ये तारे हमारी पृथ्वी से हज़ारों अरबों किमी दूर है, इसलिये इतने छोटे दिखायी दे रहे है।
एक तारा एक विशालकाय चमकता हुआ गैस का पिण्ड होता है जो गुरुत्वाकर्षण के कारण बंधा हुआ होता है। पृथ्वी के सबसे पास का तारा सूर्य है, यही सूर्य पृथ्वी की अधिकतर ऊर्जा का श्रोत है। अन्य तारे भी पृथ्वी से दिखायी देते है लेकिन रात में क्योंकि दिन में वे सूर्य की रोशनी से दब जाते है। एक कारण हमारा वायुमंडल में होनेवाला प्रकाश किरणो का विकिरण है जो धूल के कणों से सूर्य की किरणों के टकराने से उत्पन्न होता है। यह विकिरण वायु मण्डल को ढंक सा लेता है जिससे हम दिन में तारे नहीं देख पाते है।
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जनवरी 23, 2007
ब्रह्मांडीय नर्सरी जहाँ तारों का जन्म होता है एक धूल और गैसों का बादल होता है जिसे हम निहारीका (Nebula) कहते है। सभी तारों का जन्म निहारिका से होता है सिर्फ कुछ दुर्लभ अवसरो को छोड़कर जिसमे दो न्यूट्रॉन तारे एक श्याम विवर बनाते है। वैसे भी न्यूट्रॉन तारे और श्याम विवर को मृत तारे माना जाता है।
निहारिका दो अलग अलग कारणों से बनती है। एक तो ब्रह्माण्ड की उत्पत्ती है। ब्रह्माण्ड के जन्म के बाद ब्रह्माण्ड मे परमाणुओं का निर्माण हुआ और इन परमाणुओं से धूल और गैस के बादलों का निर्माण हुआ। इसका मतलब यह है कि गैस और धूल जो इस तरह से बनी है उसका निर्माण तारे से नही हुआ है बल्कि यह ब्रह्माण्ड के निर्माण के साथ निर्मित मूल पदार्थ है।
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