Archive for ‘अनसुलझे रहस्य’

मई 28, 2012

समय : क्या है समय ?

विश्व की समस्त सेनाओं से शक्तिशाली एक ऐसा विचार होता है जिसका "समय" आ गया हो। - विक्टर ह्युगो

विश्व की समस्त सेनाओं से शक्तिशाली एक ऐसा विचार होता है जिसका “समय” आ गया हो। – विक्टर ह्युगो

समय क्या है ? समय का निर्माण कैसे होता है?

भौतिक वैज्ञानिक तथा लेखक पाल डेवीस के अनुसार “समय” आइंस्टाइन की अधूरी क्रांति है। समय की प्रकृति से जुड़े अनेक अनसुलझे प्रश्न है।

  • समय क्या है ?
  • समय का निर्माण कैसे होता है ?
  • गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से समय धीमा कैसे हो जाता है ?
  • गति मे समय धीमा क्यों हो जाता है ?
  • क्या समय एक आयाम है ?

अरस्तु ने अनुमान लगाया था कि समय गति का प्रभाव हो सकता है लेकिन उन्होने यह भी कहा था कि गति धीमी या तेज हो सकती है लेकिन समय नहीं! अरस्तु के पास आइंस्टाइन के सापेक्षतावाद के सिद्धांत को जानने का कोई माध्यम नही था जिसके अनुसार समय की गति मे परिवर्तन संभव है। इसी तरह जब आइंस्टाइन साधारण सापेक्षतावाद के सिद्धांत के विकास पर कार्य कर रहे थे और उन्होने क्रांतिकारी प्रस्ताव रखा था कि द्रव्यमान के प्रभाव से अंतराल मे वक्रता आती है। लेकिन उस समय आइंस्टाइन  नही जानते थे कि ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है। ब्रह्माण्ड के विस्तार करने की खोज एडवीन हब्बल ने आइंस्टाइन द्वारा “साधारण सापेक्षतावाद” के सिद्धांत के प्रकाशित करने के 13 वर्षो बाद की थी। यदि आइंस्टाइन को विस्तार करते ब्रह्माण्ड का ज्ञान होता तो वे इसे अपने साधारण सापेक्षतावाद के सिद्धांत मे शामील करते। अवधारणात्मक रूप से विस्तार करते हुये ब्रह्माण्ड मे गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव के फलस्वरूप धीमी गति से विस्तार करते हुये क्षेत्र के रूप मे अंतराल की वक्रता दर्शाना ज्यादा आसान है। हमारे ब्रह्माण्ड के सबसे नाटकीय पहलुंओ मे एक यह है कि उसका विस्तार हो रहा है और विस्तार करते अंतराल मे गति, बल तथा वक्र काल-अंतराल की उपस्थिति है।

अगले कुछ अनुच्छेदों मे हम देखेंगे कि समय एक आकस्मिक अवधारणा है। ( time is an emergent concept.) गति तथा बलों की प्रक्रियाओं के फलस्वरूप समय की उत्पत्ति होती है, लेकिन जिसे हम समय मानते है, वह एक मरिचिका या भ्रम मात्र है। हमारी स्मृति भूतकाल का भ्रम उत्पन्न करती है। हमारी चेतना हमारे आसपास हो रही घटनाओं के फलस्वरूप वर्तमान का आभास उत्पन्न करती है। भविष्य हमारी भूतकाल की स्मृति आधारित मानसीक संरचना मात्र है। समय की अवधारणा हमारे मन द्वारा हमारे आसपास के सतत परिवर्तनशील विश्व मे को क्रमिक रूप से देखने से उत्पन्न होती है।

जान एलीस मैकटैगार्ट तथा अन्य दार्शनिको के अनुसार समय व्यतित होना एक भ्रम मात्र है, केवल वर्तमान ही सत्य है। मैकटैगार्ट समय के विश्लेषण की A,B तथा C श्रृंखलांओ के लिये प्रसिद्ध है। इस समय विश्लेषण का साराशं नीचे प्रस्तुत है:

  • समय के पूर्व और पश्चात के पहलू मूल रूप से समय के तीर(arrow of time) के रूप में ही है। किसी व्यक्ति का जन्म उसकी मृत्य से पूर्व ही होगा, भले ही दोनो घटनाये सुदूर अतीत का भाग हो। यह एक निश्चित संबध है; इस कारण मैकटैगार्ट कहते है कि कहीं कुछ समय से भी ज्यादा मौलिक होना चाहीये।
  • समय के भूत, वर्तमान और भविष्य के पहलू सतत परिवर्तनशील है, भविष्य की घटनायें वर्तमान मे आती है तथा तपश्चात भूतकाल मे चली जाती है। यह पहलू समय की एक धारा का एहसास उत्पन्न कराता है। यह सतत परिवर्तनशील संबध समय की व्याख्या के लिए आवश्यक है। मैकटैगार्ट ने महसूस किया कि समय वास्तविक नही है क्योंकि भूत, वर्तमान और भविष्य के मध्य का अंतर(एक सतत परिवर्तनशील संबंध) समय के लिये पूर्व और पश्चात के स्थायी संबध की तुलना मे ज्यादा आवश्यक है।

स्मृति के रूप मे समय

मैकटैगार्ट का सबसे महत्वपूर्ण निरीक्षण यह था कि ऐतिहासिक घटनाओं तथा मानवरचित कहानीयों मे समय के गुण एक जैसे होते है। उदाहरण के लिये मानवरचित कहानीयों तथा भूतकाल की ऐतिहासीक घटनाओं की तुलना करने पर, दोनो मे पूर्व और पश्चात के साथ भूत, वर्तमान और भविष्य होता है, यह दर्शाता है कि भूतकाल घटनाओं की स्मृति मात्र है तथा लेखक की कल्पना के अतिरिक्त उसका अस्तित्व नही है। यदि हम कंप्युटर की स्मृति उपकरण जैसे सीडी या हार्डडीस्क मे संचित भूत, वर्तमान और भविष्य के बारे मे सोचें तो यह और स्पष्ट हो जाता है।

वर्तमान : एक अत्यंत लघु क्षण ?

वर्तमान अत्यंत लघु क्षण होता है।

वर्तमान अत्यंत लघु क्षण होता है।

वर्तमान” यह समय की सबसे ज्यादा वास्तविक धारणा है, लेकिन हम जिसे वर्तमान के रूप मे देखते है वह पहले ही भूतकाल हो चुका होता है। वर्तमान क्षणभंगुर है, जो भी कुछ वर्तमान मे घटित हो रहा है वह समय रेखा पर एक अत्यंत लघु बिंदु पर सीमित है और उस पर सतत रूप से हमारे भूत और भविष्य का अतिक्रमण हो रहा है।

वर्तमान किसी रिकार्डींग उपकरण का तीक्ष्ण लेज़र बिंदु या सुई है। जबकि भूत रिकॉर्डिंग माध्यम जैसे टेप या सीडी का उपयोग किया भाग है तथा भविष्य उसका रिक्त भाग।

वर्तमान हमारे मस्तिष्क मे संचित स्मृति की मानसीक जागरुकता हो सकती है। कोई व्यक्ति किसी कार्यक्रम मे जाकर भी यदि सो जाये तो वह उस घटना को पूरी तरह से भूल सकता है। अब उस घटना का उसके भूतकाल मे अस्तित्व ही नही है। यदि हम किसी घटना के प्रति चेतन न हो तो वह हमारे भूतकाल की स्मृति का भाग नही बनती है।

भूत और भविष्य समय के अंतराल है।

भूत और भविष्य समय के अंतराल है।

भूत और भविष्य समय के अंतराल है।

वर्तमान के विपरीत हम भूत और भविष्य को घंटो, दिनो, महीनो और वर्षो मे मापे जा सकने वाले के अंतराल के रूप मे देखते है।
भूतकाल की ऐतिहासिक घटनायें, भविष्य मे होने वाली शादी या कोई अन्य घटना सभी मापे जा सकने वाले अंतराल मे है, किसी रीकार्डींग वस्तु जैसे टेप, वीडीयो या किसी सीडी/डीवीडी के ट्रेक के जैसे।
यह समानता दर्शाती है कि भूतकाल संचित स्मृति के जैसे है, जबकि भविष्य रिक्त स्मृति के जैसे। भविष्य हमारी स्मृति मे संचित भूतकाल के अनुभवो से निर्मित छवि मात्र है।

समय का मापन

किसी भी भौतिक राशी जैसे पैसा, द्रव्यमान, जमीन का टूकड़ा, गति, दूरी या प्रतिरोध का मापन हमारे द्वारा परिभाषित कुछ मानको द्वारा किया जाता है। द्रव्यमान के मापन के लिये हम किलोग्राम या पौंड जैसे मानको का उपयोग करते है। दूरी के मापन के लिये हम दूरी के मानक मीटर, यार्ड या फीट का प्रयोग करते है। इन्हे ध्यान मे रखते हुये ध्यान दिजीये कि हम गति का मापन कैसे करते है! हम गति के मापन के लिये समय का प्रयोग करते है अर्थात मीटर प्रति सेकंड या किलोमीटर प्रति घंटा। इससे एक संकेत मिलता है कि जब हम समय से व्यवहार करते है, वास्तविकता मे हम किसी गति के किसी मानक से व्यवहार कर रहे होते है।

शायद हमने समय की संकल्पना वास्तविकता से ज्यादा जटिल बना दी है। समय का मापन मानव विकास की प्रारंभिक अवस्था से प्रारंभ हुआ है। इसके संकेत लगभग हर भाषा मे अभिवादन के शब्दो मे मिलते हैं। दिन मे समय सूर्य के आकाश मे स्थिती या अनुपस्थिति से संबधित था। इसमे प्रभात, सूर्योदय, सुबह,दोपहर, शाम, सूर्यास्त, रात, अर्धरात्री शामील है। इसके पश्चात वर्ष, माह, सप्ताह पृथ्वी की सूर्य की कक्षा मे वार्षिक परिक्रमा तथा मौसम मे परिवर्तन पर आधारित है। सेकंड और मिनिट जैसी इकाईयों का प्रयोग ज्यामिती मे कोणीय मापन पर आधारित है, जोकि वास्तविकता मे आकाश मे खगोलीय पिंडो की गति के कोणीय मापन से संबधित विधि है। जब से हमने घड़ीयों का प्रयोग प्रारंभ किया है हम समय मापन की इन प्राकृतिक विधियों से दूर हो गये है और समय की अवधारणा विकृत हो गयी है।

समय का मापन

समय का मापन

समय को समझने की समस्या का सरल हल सूर्य के आकाश मे भ्रमण द्वारा समय के मापन विधि की ओर वापिस लौटने मे है। जब हम कार की गति का मापन करते है तब हम उसकी गति की तुलना घड़ी के कांटो की गति से करते है, अप्रत्यक्ष रूप से हम यह तुलना सूर्य की आकाशीय गति से करते है। हम गति का मापन समय के जैसे किसी अमूर्त राशी से नही कर रहे है, हम अज्ञात गति (कार) की तुलना ज्ञात गति (सूर्य की आकाशीय गति) से कर रहे होते है।

गति की इकाई के रूप मे समय

समय विभिन्न तरह की गतियों की तुलना के लिये इकाई के रूप मे प्रयुक्त होता है, जैसे प्रकाशगति, हृदयगति, पृथ्वी की अपने अक्ष पर घूर्णन गति। लेकिन इन प्रक्रियाओं की तुलना समय के संदर्भ के बीना भी की जा सकती है। समय गति के मापन के लिए एक सामान्य इकाई हो सकता है, जिससे सारे विश्व मे एक इकाई से गति के मापन मे आसानी होगी। यह एक ऐसी इकाई होगी जिसका स्वतंत्र अस्तित्व नही है। गतिक प्रक्रिया का समय के रूप मे मापन की तुलना व्यापार मे करेंसी(मुद्रा) के प्रयोग से की जा सकती है। ध्यान दें कि यहाँ भी समय की उपस्थिति अर्थात गति की उपस्थिति की अवधारणा की पुष्टि हो रही है।

वास्तविक रूप से समय क्या है ?

समय एक आकस्मिक अवधारणा है। वह हमारे जीवन मे सतत परिवर्तित होने वाली वास्तविक घटना है। समय को समझने के लिये हमे इस सतत परिवर्तन को निर्मित करने वाली प्रक्रिया को समझना होगा जिससे समय के प्रवाह का भ्रम उत्पन्न होता है।

समय गति से दृष्टिगोचर होता है और उसका मापन अन्य गति से तुलना के द्वारा होता है।, सूर्योदय, सूर्यास्त, रात और दिन, बदलते मौसम, खगोलीय पिंडो की गति यह सभी सतत परिवर्तन के प्रमाण हैं। उम्र बढ़ने की प्रक्रिया भी हमारी आण्विक गति तथा प्रक्रिया भी गति का प्रभाव है और समय का ही भाग है। इसके अतिरिक्त समय कि उपस्थिति का एक महत्वपूर्ण पहलू फोटान और परमाण्विक स्तर पर कणो की गति भी है।

एक मानसीक प्रयोग

दो खगोलीय पिंडो की कल्पना किजीये, जिसमे एक पिंड दूसरे की परिक्रमा कर रहा है। अब मान लीजीये कि एक दूरस्थ निरीक्षण बिंदु से एक निश्चित समय पर हम पाते हैं कि उन दोनो पिंडो वाले क्षेत्र मे समय धीमा हो गया है। समय के धीमे होने से पिंडो की गति भी धीमी होना चाहीये। इस निरीक्षण मे गुरुत्वाकर्षण बल भी अनुपातीक रूप से कमजोर होना चाहीये अन्यथा दो पिंड एक दूसरे की ओर खिंचे जायेंगे। यदि हम समय की गति मे वृद्धि देखते है, तब गति मे भी वृद्धी होगी, साथ ही गुरुत्वाकर्षण मे भी वृद्धी होगी जो उन पिंडो को एक दूसरे से दूर जाने से रोकेगा। वहीं शून्य समय गति पर सब कुछ शून्य हो जायेगा अर्थात पिंडो की गति और गुरुत्वाकर्षण शून्य हो जायेगा।

गुरुत्वाकर्षण बल की क्षमता मे वृद्धी या कमी केवल हमारे निरीक्षण बिंदु के निश्चित समय से संबधित है। परिक्रमा करते पिंडो के समय के परिपेक्ष मे ना तो उनकी गति मे परिवर्तन हुआ है ना उनके गुरुत्वाकर्षण मे। इस मानसीक प्रयोग को विद्युत-चुंबकीय बल द्वारा बांधे गये कणो पर भी कीया जा सकता है, तब हम कह सकते है कि समय बल और गति दोनो का समावेश करता है।

समय की संभावित परिभाषा

ठहरा हुआ समय

ठहरा हुआ समय

समय को एकाधिक परिपेक्ष्य मे परिभाषित किया जा सकता है।
ज्ञान के परिपेक्ष्य से समय हमारे मस्तिष्क  द्वारा निर्मित एक आकस्मिक अवधारणा है। वर्तमान हमारी चेतना या हमारी स्मृति मे घटनाओ के लेखन की जानकारी है। भूतकाल स्मृति है जबकि भविष्य का अस्तित्व नही है।
भौतिकशास्त्र के परिपेक्ष्य मे, समय ब्रह्मांड मे गति और बलो की उपस्थिती है।

समय हर तरह की गति का समावेश करता है। कणो की स्पिन तथा फोटान की गति भी समय पर निर्भर है। गुरुत्वाकर्षण बल, विद्युत-चुंबकिय बल भी समय का भाग है, उसी तरह से खगोलीय पिंडो की गति, परमाणुओं की गति भी। हमने इस लेख मे समय की अवधारणा को आंशिक रूप से समझा है। अगले लेख मे हम गति और बलो के श्रोत को समझेंगे!

समय का निर्माण कैसे होता है?

अप्रैल 16, 2012

सरल क्वांटम भौतिकी: भौतिकी के अनसुलझे रहस्य

अब तक हमने सभी मूलभूत कणो और मूलभूत बलों की जानकारी प्राप्त की है। क्या इसका अर्थ है कि इसके आगे जानने के लिये कुछ भी शेष नही है ?

नही! हमारी वर्तमान भौतिकी अधूरी है, हमारे पास ऐसे बहुत से प्रश्न है, जिसका कोई उत्तर नही है। हमारा सबसे सफल सिद्धांत ’स्टैंडर्ड माडेल’ अपूर्ण है, इसके विस्तार की आवश्यकता है।

स्टैन्डर्ड माडेल से आगे

स्टैन्डर्ड माडेल “पदार्थ की संरचना और उसके स्थायित्व” के अधिकतर प्रश्नो का उत्तर छः तरह के क्वार्क , छः तरह के लेप्टान और चार मूलभूत बलो से दे देता है। लेकिन स्टैडर्ड माडेल सम्पूर्ण नही है, इसके विस्तार की संभावनायें है। वर्तमान मे स्टैण्डर्ड माडेल के पास सभी प्रश्नो का उत्तर नही है, इसके समक्ष बहुत से अनसुलझे प्रश्न है।

  • जब हम ब्रह्माण्ड का निरीक्षण करते है तब हम पदार्थ ही दिखायी देता है, प्रतिपदार्थ नही। क्या पदार्थ और प्रतिपदार्थ की मात्रा समान नही है, क्यों ? क्या इन दोनो  के मध्य सममीती नही है? क्यों ?

    प्रति-पदार्थ ?

    प्रति-पदार्थ ?

  • श्याम पदार्थ(dark matter) क्या है? उसे हम देख नही सकते है लेकिन उसके गुरुत्वाकर्षण प्रभाव को देख सकते है,  ऐसा क्यों  ?
  • स्टैन्डर्ड माडेल किसी कण के द्रव्यमान की गणना करने मे असमर्थ क्यों है?
  • क्या क्वार्क और लेप्टान मूलभूत कण है ? या वे भी और छोटे घटक कणो से बने है ?
  • क्वार्क और लेप्टान की ठीक ठीक तीन पीढ़ी क्यों है ? चार या दो क्यों नही ?
  • इन सब के मध्य गुरुत्वाकर्षण की क्या भूमिका है ?

जनवरी 30, 2012

स्ट्रींग सिद्धांत: विज्ञान या दर्शन ?

स्ट्रींग सिद्धांत ब्रह्माण्ड के अध्ययन और व्याख्या की एक क्रांतिकारी विधि है। यह हमारे ब्रह्माण्ड के हर पहलू की व्याख्या करती है, पदार्थ का निर्माण करने वाले कण तथा पदार्थ पर प्रतिक्रिया करने बलों की वह ऊर्जा की अत्यंत सुक्ष्म तंतुओ के रूप मे सफल व्याख्या करती है। स्ट्रींग सिद्धांत के अनुसार ऊर्जा के अत्यंत सुक्ष्म तंतु या तंतुवलय इस ब्रह्माण्ड के छोटे परमाण्विक कणो से लेकर विशालकाय आकाशगंगा के व्यवहार तथा संरचना को समझने की मुख्य कुंजी है।

स्ट्रींग सिद्धांत के आलोचको का मानना है कि यह सिद्धांत “थ्योरी आफ एवरीथींग” के रूप मे असफल रहा है। इसके आलोचको मे  पीटर वोइट(Peter Woit) ली स्मोलीन(Lee Smolin)फिलीप वारेन एन्डरसन(Philip Warren Anderson)शेल्डन ग्लाशो (Sheldon Glashow)लारेंस क्राउस (Lawrence Krauss), तथा कार्लो रोवेल्ली(Carlo Rovelli) जैसे बड़े नाम है।

जनवरी 16, 2012

स्ट्रींग सिद्धांत: M सिद्धांत

पांच तरह के सुपरस्ट्रींग सिद्धांत एक दूसरे से भिन्न लगते है लेकिन भिन्न स्ट्रींग द्वैतवाद के प्रकाश मे मे वे एक ही सिद्धांत के भिन्न पहलू के रूप मे आते है। दो सिद्धांत जब एक जैसी भौतिक प्रक्रिया की व्याख्या करते है तब उन्हे द्वैत(dual) सिद्धांत कहते है।

प्रथम प्रकार का द्वैतवाद T-द्वैतवाद(T -Duality) है। यह द्वैतवाद एक R त्रिज्या वाले वृत्त पर संकुचित सिद्धांत(compatified) को 1/R त्रिज्या वाले वृत्त पर संकुचित सिद्धांत से जोड़ता है। अर्थात एक सिद्धांत मे आयाम एक छोटे वृत्त पर लिपटा हुआ है लेकिन दूसरे सिद्धांत मे आयाम एक विशाल वृत्त पर लिपटा हुआ है(संकुचन नाम मात्र का हुआ है) लेकिन दोनो सिद्धांत एक जैसी भौतिक प्रक्रियाओं की व्याख्या कर रहे हैं। प्रकार IIA तथा IIB सुपरस्ट्रींग सिद्धांत T-द्वैतवाद द्वारा एक दूसरे से संबधित है, वहीं पर SO(32) हेटेरोटीक तथा E(8) x E(8) हेटेरोटीक सिद्धांत भी T-द्वैतवाद द्वारा एक दूसरे से संबधित हैं।

दूसरे तरह के द्वैतवाद S-द्वैतवाद(S- Duality) मे एक सिद्धांत की मजबूत युग्मन सीमा(Strong Coupling Limit) को दूसरे सिद्धांत की कमजोर युग्मन सीमा(Weak Coupling Limit) से जोड़ा जाता है। उदाहरण के लिये SO(32) हेटेरोटीक तथा प्रकार I के स्ट्रींग सिद्धांत 10 आयामो मे स्ट्रींग S-द्वैतवाद से जुड़े है। इसका अर्थ है कि SO(32) हेटेरोटीक स्ट्रींग की मजबूत युग्मन सीमा प्रकार 1 की कमजोर युग्मन सीमा के तुल्य है, इसके अतिरिक्त इसका विपरीत भी सत्य है। मजबूत और कमजोर युग्मन सीमा के मध्य द्वैतवाद की खोज का प्रमाण पाने का एक उपाय हर चित्र मे प्रकाश वर्णक्रम अवस्थाओं की तुलना करना है और देखना है कि वे एक जैसी है या नही। उदाहरण के लिये प्रकार I स्ट्रींग सिद्धांत की D-स्ट्रींग अवस्था कमजोर युग्मन मे भारी होती है लेकिन मजबूत युग्मन मे हल्की होती है। यह D-स्ट्रींग SO(32) हेटेरोटीक सिद्धांत के विश्वप्रतल(worldsheet) पर समान प्रकाश अवस्था रखेंगी, इसलिये प्रकार I के सिद्धांत मे यह D स्ट्रींग मजबूत युग्मन मे अत्यंत हल्की होगी, इस तरह से कमजोर युग्मित हेटेरोटीक स्ट्रींग(weakly coupled heterotic string) व्याख्या सामने आती है। 10 आयामो मे S-द्वैतवाद मे स्वयं से संबधित सिद्धांत IIB है जोकि एक IIB स्ट्रींग की मजबूत युग्मन सीमा को S-द्वैतवाद से दूसरी IIB स्ट्रींग की कमजोर युग्मन सीमा से जोड़ता है। IIB सिद्धांत मे एक D-स्ट्रींग भी है जो मजबूत युग्मन पर हल्की होती है लेकिन यह D स्ट्रींग किसी अन्य मूलभूत IIB प्रकार की स्ट्रींग जैसे लगती है।

जनवरी 9, 2012

स्ट्रींग सिद्धांत: सुपरस्ट्रींग सिद्धांत से M सिद्धांत की ओर

स्ट्रींग सिद्धांत के अंतर्गत पांच तरह के अलग अलग सिद्धांत का विकास हो गया था। समस्या यह थी कि ये सभी सिद्धांत विरोधाभाषी होते हुये भी, तार्किक रूप से सही थे। ये पांच सिद्धांत थे प्रकार I, प्रकार IIA, प्रकार IIB तथा दो तरह के हेटेरोटीक स्ट्रींग सिद्धांत। पांच अलग अलग सिद्धांत सभी बलो और कणो को एकीकृत करने वाले “थ्योरी आफ एवरीथींग” के मुख्य उम्मीदवार का दावा कैसे कर सकते थे। यह माना जाता था कि इनमे से कोई एक ही सिद्धांत सही है, जो अपनी निम्न ऊर्जा सीमा तथा दस आयामो को चार आयामो मे संकुचन के पश्चात वास्तविक विश्व की सही व्याख्या करेगा। अन्य सिद्धांतो को स्ट्रींग सिद्धांत के प्रकृती द्वारा अमान्य गणितीय हल के रूप मे मान कर रद्द कर दिया जायेगा।

लेकिन कुछ नयी खोजो और सैद्धांतिक विकास के पश्चात पता चला कि उपरोक्त तस्वीर सही नही है, यह पांचो स्ट्रींग सिद्धांत एक दूसरे से जुड़े हुये है तथा एक ही मूल सिद्धांत के भिन्न भिन्न पहलुओं को दर्शाते है। यह सभी सिद्धांत एक रूपांतरण द्वारा जुड़े हुये है जिसे द्वैतवाद(dualities) कहते है। यदि दो सिद्धांत किसी द्वैतवाद रूपांतरण(Duality Transformation) द्वारा जुड़े हों तो इसका अर्थ यह होता है कि एक सिद्धांत का रूपांतरण इस तरह से हो सकता है कि वह दूसरे सिद्धांत की तरह दिखायी दे। यह दोनो सिद्धांत इस रूपांतरण के अंतर्गत एक दूसरे के द्विक(Dual) कहलायेंगे।

दिसम्बर 5, 2011

स्ट्रींग सिद्धांत : इतिहास और विकास

स्ट्रींग सिद्धांत जो कि भौतिकी के सभी बलों और कणो के व्यवहार को एकीकृत करने का दावा करता है, संयोगवश खोजा गया था। 1970 मे कुछ वैज्ञानिक एक ऐसे मूलभूत क्वांटम स्ट्रींग की संकल्पना पर कार्य कर रहे थे जिसका त्रिआयामी विस्तार सीमीत हो और उसकी ज्यादा छोटे घटको द्वारा व्याख्या संभव ना हो। यह अध्ययन मूलभूत बलों के एकीकरण से संबधित नही था, यह भौतिकीय संदर्भो मे नयी गणितीय चुनौती मात्र था।

स्ट्रींग सिद्धांत के अनुसार मूलभूत कण

स्ट्रींग सिद्धांत के अनुसार मूलभूत कण

पारंपरिक रूप से ऐसी स्ट्रींग की व्याख्या एक रेखा (सरल या वक्र)  द्वारा अंतराल(Space) मे किसी समय पर उसकी स्थिति से की जा सकती है। यह स्ट्रींग किसी वलय के जैसे बंद या दो अंत बिन्दुओं के साथ खूली हो सकती है।

जैसे किसी कण के अंतर्भूत द्रव्यमान(mass) होता है, उसी तरह से स्ट्रींग के अंतर्भूत तनाव(Tension) होगा। जिस तरह से एक कण विशेष सापेक्षतावाद(Special Relativity) के नियमो से बंधा होता है उसी तरह से यह स्ट्रींग भी विशेष सापेक्षतावाद के नियमो से बंधी होगी। अंतत: हमे कणो की क्वांटम यांत्रिकी के तुल्य स्ट्रींग के लिये क्वांटम यांत्रिकी के नियम बनाने होंगे।