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	<title>विज्ञान विश्व</title>
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	<description>विज्ञान की नित नयी जानकारी इन्द्रजाल मे उपलब्ध कराने का एक प्रयास !</description>
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		<title>सापेक्षतावाद सिद्धांत : विशेष सापेक्षतावाद</title>
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		<pubDate>Mon, 13 May 2013 01:00:56 +0000</pubDate>
		<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[ब्रह्मांड]]></category>
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		<category><![CDATA[प्रकाश गति]]></category>
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		<description><![CDATA[अब आप ब्रह्माण्ड के सभी बड़े खिलाड़ियों अर्थात अंतराल/अंतरिक्ष, समय, पदार्थ, गति, द्रव्यमान, गुरुत्वाकर्षण, ऊर्जा और प्रकाश से परिचित हो चुके है। विशेष सापेक्षतावाद के संदर्भ में यह स्पष्ट है कि इन ब्रह्माण्ड के यह सभी सरल से लगने वाले मुख्य गुण-धर्म कुछ विशिष्ट &#8220;सापेक्षिक&#8221; स्थितियों में बहुत अप्रत्याशित तरीके से व्यवहार करते हैं। विशेष [&#8230;]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=vigyan.wordpress.com&#038;blog=370709&#038;post=2577&#038;subd=vigyan&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>अब आप ब्रह्माण्ड के सभी बड़े खिलाड़ियों अर्थात अंतराल/अंतरिक्ष, समय, पदार्थ, गति, द्रव्यमान, गुरुत्वाकर्षण, ऊर्जा और प्रकाश से परिचित हो चुके है। विशेष सापेक्षतावाद के संदर्भ में यह स्पष्ट है कि इन ब्रह्माण्ड के यह सभी सरल से लगने वाले मुख्य गुण-धर्म कुछ विशिष्ट &#8220;<strong>सापेक्षिक</strong>&#8221; स्थितियों में बहुत अप्रत्याशित तरीके से व्यवहार करते हैं। विशेष सापेक्षतावाद को समझने की कुंजी इन ब्रह्माण्ड के इन गुणधर्मो पर सापेक्षतावाद के प्रभाव में छीपी हुयी है।</p>
<h2>संदर्भ बिंदु (Frames of Reference)</h2>
<p><a href="http://vigyan.files.wordpress.com/2013/05/relativity21.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-2585" alt="relativity2" src="http://vigyan.files.wordpress.com/2013/05/relativity21.jpg?w=204&#038;h=300" width="204" height="300" /></a>आइंस्टाइन का विशेष सापेक्षतावाद का सिद्धांत &#8220;<strong>संदर्भ बिंदु</strong>&#8221; की धारणा पर आधारित है। संदर्भ बिंदु का अर्थ है एक ऐसी जगह जहां पर <strong>&#8220;व्यक्ति/निरीक्षक खड़ा&#8221;</strong> है। आप इस समय संभवतः अपने कंप्यूटर के सामने बैठे है। यह आपका वर्तमान संदर्भ बिंदु है। आपको महसूस हो रहा है कि आप स्थिर है, लेकिन आप जिस पृथ्वी पर है वह अपने अक्ष पर घूम रही है और सूर्य कि परिक्रमा कर रही है। संदर्भ बिंदु के संबंध मे सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि &#8220;<em><strong>हमारे ब्रह्मांड में अपने आप में संपूर्ण संदर्भ बिंदु के रूप में ऐसी कोई चीज नहीं है।</strong></em>&#8221; जब हम अपने आप में संपूर्ण संदर्भ बिंदु कहते है; तब हमारा तात्पर्य होता है पूरी तरह से स्थिर जगह और संपूर्ण ब्रह्माण्ड में ऐसी कोई जगह नहीं है। इस कथन का अर्थ है कि सभी वस्तुये गतिमान है अर्थात सभी गतियां सापेक्ष है। ध्यान दिजिये कि  आप एक जगह स्थिर है लेकिन  पृथ्वी गतिमान है इसलिए आप भी गतिमान हैं। आप अंतरिक्ष और समय मे हमेशा गतिमान रहते हैं। संपूर्ण ब्रह्माण्ड मे कोई भी जगह/पिंड स्थिर नहीं है इसलिए गति के मापन/निरीक्षण के मानकीकरण के लिये कोई मूल संदर्भ बिंदु नहीं है। यदि राम श्याम कि दिशा मे दौडता है, इसे दो तरह से देखा जा सकता है। श्याम के परिप्रेक्ष्य में राम उसके समीप आ रहा है जबकि राम के परिप्रेक्ष्य श्याम उसके समीप आ रहा है। राम और श्याम दोनो को अपने संदर्भ बिंदु के परिप्रेक्ष्य मे निरीक्षण करने का अधिकार है। हर गति आपके संदर्भ बिंदु के सापेक्ष होती है। एक दूसरा उदाहरण, यदि आप एक गेंद को फेंकते है , तब गेंद को अधिकार है कि वह अपने संदर्भ बिंदु से अपने आप को स्थिर और आपको गतिमान समझे। गेंद मान सकती है कि आप उससे दूर जा रहे है जबकि आप देख रहे है कि गेंद आपसे दूर जा रही है। ध्यान मे रखिये कि आप पृथ्वी के धरातल के सापेक्ष गति नही कर रहे हैं लेकिन आप पृथ्वी के साथ गतिमान हैं।</p>
<h2>विशेष सापेक्षतावाद का प्रथम नियम</h2>
<p>विशेष सापेक्षतावाद का प्रथम नियम सरल है और इसे समझने मे कोई कठिनाई नहीं है।</p>
<blockquote><p>भौतिकी के नियम सभी संदर्भ बिंदुओं के लिये सत्य होते है।</p></blockquote>
<p>सापेक्षतावाद की अवधारणाओं मे यह सबसे सरल और आसान है। यह नियम हमें समझाता है कि क्यों और कैसे प्रकृति हमसे हमेशा एक जैसे ही व्यवहार करती है। यह हमें भौतिकी घटनाओं का पूर्वानुमान लगाने और उनके परिणामों को जानने मे मदद करता है। यदि आप एक ईंट और एक इंचीटेप को लेकर ईंट की लंबाई का मापन करे करें तो आपको हमेशा एक ही परिणाम मिलेगा चाहे आप यह मापन जमीन पर स्थिर होकर करें या बस पर सवार होकर करें। अब आप एक पेंडुलम के १० दोलन में लगने वाले समय को एक स्थिर जगह पर मापें, उसके बाद यही मापन आप बस पर सवार होकर करें आपको समान परिणाम मिलेंगे। ध्यान दें कि हम यह मान कर चल रहे हैं कि बस एक सपाट सड़क पर समान गति से चल रही है, उसकी गति मे कोई परिवर्तन(त्वरण) नहीं आ रहा है। अब हम एक जगह पर स्थिर रह कर इन प्रयोगों को दोहराते है, इस बार ईंट/पेंडुलम बस पर सवार है और हम जमीन पर स्थिर हैं। हमे पिछले परिणामों से भिन्न परिणाम मिलेंगे। इन दोनो प्रयोगों के परिणामों मे अंतर इसलिए है क्योंकि भौतिकी के नियम सभी संदर्भ बिंदुओं के लिये समान है। जब हम विशेष सापेक्षतावाद के दूसरे नियम की चर्चा करेंगे यह और स्पष्ट हो जायेगा। यह महत्वपूर्ण है कि भौतिकी के नियम स्थिर है इसका अर्थ यह नही है कि हमे भिन्न संदर्भ बिंदुओं पर एक ही प्रायोगिक परिणाम मिलेगा। परिणाम हमारे प्रयोग के प्रकार पर निर्भर है। यदि हम दो कारो को टकरायें तब इस टकराव की कुल ऊर्जा का संरक्षण होगा, हम कार मे हों या कार से बाहर फुटपाथ पर इसका टकराव के कुल ऊर्जा की मात्रा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। ऊर्जा के संरक्षण का नियम भौतिकी का नियम है और यह सभी संदर्भ बिंदुओ के लिये समान रहेगा।</p>
<h2>विशेष सापेक्षतावाद का द्वितीय नियम</h2>
<p>विशेष सापेक्षतावाद का दूसरा नियम काफी विचित्र और अनपेक्षित है। यह सामान्य बुद्धि और तर्क के विपरीत है! यह नियम है -</p>
<blockquote><p>सभी संदर्भ बिंदुओं के लिये प्रकाश गति स्थिरांक है।</p></blockquote>
<p>वास्तविकता में यह सापेक्षतावाद का पहला नियम ही है , केवल शब्दों का हेर-फेर है। यदि भौतिकी के नियम सभी संदर्भ बिंदुओं के लिये समान है, तब प्रकाश गति सभी संदर्भ बिंदुओं के लिये समान ही होना चाहीये।</p>
<p><strong>इसमें विचित्र क्या है ?</strong><br />
<a href="http://vigyan.files.wordpress.com/2013/05/relativity3.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-2587" alt="relativity3" src="http://vigyan.files.wordpress.com/2013/05/relativity3.jpg?w=300&#038;h=286" width="300" height="286" /></a> एक उदाहरण लेते है। श्याम एक स्थान पर खडा है और राम श्याम से दूर 6 किमी/घंटा की रफ्तार से दौड़ रहा है। श्याम के संदर्भ मे राम की गति 6 किमी/घंटा होगी। जबकि राम के संदर्भ मे उसकी स्वयं की गति शून्य होगी। स्वयं के संदर्भ मे स्वयं की गति हमेशा शून्य होती है। अब राम दौड़ते हुये एक गेंद 10 किमी प्रति/घंटा की गति से फेंकता है। राम ने गेंद फेंकी है, इसलिए उसके संदर्भ में गेंद की गति 10 किमी/घंटा होगी। लेकिन श्याम एक जगह स्थिर है, इसलिए उसके संदर्भ मे गेंद की गति मे राम की गति भी जुड जायेगी।</p>
<p>श्याम के अनुसार गेंद की गति = 10 किमी/घंटा + 6 किमी/घंटा = <strong>16 किमी/घंटा</strong></p>
<p>है ना सामान्य तर्क बुद्धी वाली बात!</p>
<p><a href="http://vigyan.files.wordpress.com/2013/05/relativity4.jpg"><img class="size-medium wp-image-2588 alignleft" alt="relativity4" src="http://vigyan.files.wordpress.com/2013/05/relativity4.jpg?w=221&#038;h=300" width="221" height="300" /></a>लेकिन प्रकाश की गति मे यह सामान्य तर्क बुद्धी लागू नहीं होती है। इसी उदाहरण में अब हम राम के हाथ में जलती हुयी टार्च दे देते है। वह गेंद की बजाय प्रकाश फेंक रहा है। राम के संदर्भ में प्रकाश की गति C अर्थात 299,792,458 मीटर/सेकंड होगी। लेकिन श्याम के संदर्भ मे प्रकाश की गति क्या होगी ?</p>
<p>सामान्य तर्क के अनुसार श्याम के संदर्भ में प्रकाश गति = <strong>C + 6 किमी/घंटा</strong> होना चाहीये! (<em>C=299,792,458 मीटर/सेकंड</em>)<br />
लेकिन विशेष सापेक्षतावाद के दूसरे नियम के अनुसार श्याम के संदर्भ में भी प्रकाश गति C अर्थात 299,792,458 मीटर/सेकंड ही होगी, उसमें राम की गति नहीं जुडेगी।</p>
<p><strong>अब इस पर थोडा दिमाग पर जोर डालीये। विशेष सापेक्षतावाद के दूसरे नियम के बारे में और चर्चा अगले लेख में&#8230;.</strong></p>
<br />Filed under: <a href='http://vigyan.wordpress.com/category/%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a1/'>ब्रह्मांड</a>, <a href='http://vigyan.wordpress.com/category/%e0%a4%ad%e0%a5%8c%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%80/'>भौतिकी</a>, <a href='http://vigyan.wordpress.com/category/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6/'>सापेक्षतावाद</a> Tagged: <a href='http://vigyan.wordpress.com/tag/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b6-%e0%a4%97%e0%a4%a4%e0%a4%bf/'>प्रकाश गति</a>, <a href='http://vigyan.wordpress.com/tag/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%b7-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%8d/'>विशेष सापेक्षतावाद का द्वितीय नियम</a>, <a href='http://vigyan.wordpress.com/tag/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%b7-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a5%8d/'>विशेष सापेक्षतावाद का प्रथम नियम</a>, <a href='http://vigyan.wordpress.com/tag/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ad-%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%81/'>संदर्भ बिंदु</a>, <a href='http://vigyan.wordpress.com/tag/frames-of-reference/'>Frames of Reference</a>, <a href='http://vigyan.wordpress.com/tag/speed-of-light/'>Speed of Light</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/vigyan.wordpress.com/2577/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/vigyan.wordpress.com/2577/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=vigyan.wordpress.com&#038;blog=370709&#038;post=2577&#038;subd=vigyan&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>सापेक्षतावाद सिद्धांत : प्रकाश के गुणधर्म</title>
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		<pubDate>Mon, 06 May 2013 08:16:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
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		<description><![CDATA[प्रकाश ऊर्जा का ही एक रूप है। प्रकाश का व्यवहार थोड़ा विचित्र है। न्युटन के कारपसकुलर अवधारणा(corpuscular hypothesis) के अनुसार प्रकाश छोटे छोटे कणों (जिन्हें न्युटन ने कारपसकल नाम दिया था।) से बना होता है। न्युटन का यह मानना प्रकाश के परावर्तन(reflection) के कारण था क्योंकि प्रकाश एक सरल रेखा मे परावर्तित होता है और [&#8230;]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=vigyan.wordpress.com&#038;blog=370709&#038;post=2553&#038;subd=vigyan&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<div class="wp-caption alignleft" style="width: 160px"><img class=" " alt="" src="https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/6/6e/The_sun1.jpg/250px-The_sun1.jpg" width="150" height="113" /><p class="wp-caption-text">प्रकाश (सूर्य)</p></div>
<p>प्रकाश ऊर्जा का ही एक रूप है। प्रकाश का व्यवहार थोड़ा विचित्र है। <a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Isaac_Newton">न्युटन </a>के <a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Opticks">कारपसकुलर अवधारणा(corpuscular hypothesis)</a> के अनुसार प्रकाश छोटे छोटे कणों (<em>जिन्हें न्युटन ने कारपसकल नाम दिया था।</em>) से बना होता है। न्युटन का यह मानना प्रकाश के <strong>परावर्तन(reflection)</strong> के कारण था क्योंकि प्रकाश एक सरल रेखा मे परावर्तित होता है और यह प्रकाश के छोटे कणों से बने होने पर ही संभव है। केवल कण ही एक सरल रेखा मे गति कर सकते है।</p>
<div class="wp-caption alignright" style="width: 210px"><img alt="" src="https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/8/8a/Young_Diffraction.png/200px-Young_Diffraction.png" width="200" height="100" /><p class="wp-caption-text">थामस यंग का प्रकाश अपवर्तन दिखाता डबल-स्लिट प्रयोग जिसने प्रकाश के तरंग होने की पुष्टि की थी।</p></div>
<p>लेकिन उसी समय<a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Christian_Huygens"> क्रिस्चियन हायजेन्स( Christian Huygens)</a> और <a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Thomas_Young_(scientist)">थामस यंग( Thomas Young) </a>के अनुसार <strong><a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Huygens%E2%80%93Fresnel_principle">प्रकाश तरंगो से बना होता</a> </strong>था। हायजेन्स और यंग का सिद्धांत <strong>प्रकाश के अपवर्तन(refraction)</strong> पर आधारित था, क्योंकि माध्यम मे परिवर्तन होने पर प्रकाश की गति मे परिवर्तन आता था, यह प्रकाश के तरंग व्यवहार से ही संभव था। न्युटन के कारपसकुलर अवधारणा के ताबूत मे अंतिम कील <strong><a href="https://en.wikipedia.org/wiki/James_Clerk_Maxwell">मैक्सवेल(James Clerk Maxwell)</a></strong> ने ठोंक दी थी, उनके<strong><a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Maxwell%27s_equations"> चार सरल समीकरणों</a></strong> ने सिद्ध कर दिया कि प्रकाश विद्युत-चुंबकिय क्षेत्र की स्वयं प्रवाहित तरंग( self-propagating waves) मात्र है। इन समीकरणों से प्रकाश की गति की सटीक गणना भी हो गयी थी। लेकिन २० वी शताब्दि मे<strong> <a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Photoelectric_effect">फोटो-इलेक्ट्रिक प्रभाव(Photoelectric effect)</a> </strong>की खोज ने प्रकाश के कणो के बने होने के सिद्धांत मे एक नयी जान डाल दी।</p>
<p>इन दोनो मे क्या सही है? क्या प्रकाश कण है ? या एक तरंग ?<span id="more-2553"></span></p>
<p>आज हम जानते हैं कि ये दोनों सिद्धांत सही है, प्रकाश दोहरा व्यवहार रखता है, वह एक ही समय में कण और तरंग दोनों गुण-धर्म रखता है। प्रकाश के कण व्यवहार मे उसे फोटान कहा जाता है और उसके तरंग व्यवहार मे उसे विद्युत-चुंबकिय विकिरण(electro-magnetic radiation) कहा जाता है।</p>
<h2><strong>फोटान</strong></h2>
<p>फोटान किसी परमाणु द्वारा उत्सर्जित ऊर्जा है जिसे हम प्रकाश के रूप मे देखते हैं। किसी परमाणु मे इलेक्ट्रान,  प्रोटान और न्युट्रान से बने नाभिक की कक्षा मे परिक्रमा करते हैं। इन इलेकट्रानो की नाभिक के आसपास एकाधिक ऊर्जा अवस्थाओं की कक्षायें होती है। किसी विशिष्ट ऊर्जा अवस्था वाली कक्षा मे इलेक्ट्रान के पास तुल्य विशिष्ट ऊर्जा होती है। जब भी कोई परमाणु कुछ ऊर्जा प्राप्त करता है तब उसके इलेक्ट्रान जो नाभिक के पास कम ऊर्जा अवस्था वाली कक्षा मे होते है ;कूद कर नाभिक से दूर अधिक ऊर्जा वाली कक्षा मे चले जाते है। इस अवस्था मे परमाणु को <strong>उत्तेजित अवस्था</strong> (excited state) मे माना जाता है और यह एक अस्थायी अवस्था होती है, प्राकृतिक रूप से परमाणु अपनी कम ऊर्जा वाली अवस्था मे आने का प्रयास करता है। इलेक्ट्रान अपनी ऊर्जा को <strong>एक पैकेट</strong> के रूप मे उत्सर्जित कर अपनी कम ऊर्जा वाली कक्षा मे चला जाता है, इसी ऊर्जा के पैकेट को <strong>फोटान</strong> कहा जाता है। यह उत्सर्जित ऊर्जा इलेक्ट्रान की उन कक्षाओं की ऊर्जाओं के अंतर के तुल्य ही होती है। इसी उत्सर्जित ऊर्जा या फोटान को हम प्रकाश के रूप मे महसूस करते है।</p>
<h2><strong>विकिरण(तरंग) रूप मे प्रकाश</strong></h2>
<p><a href="http://vigyan.files.wordpress.com/2011/07/emfspectrum1.jpg"><img class="alignleft" alt="" src="http://vigyan.files.wordpress.com/2011/07/emfspectrum1.jpg?w=480&#038;h=256" width="480" height="256" /></a>किसी दोलन करते आवेश(oscillating charge) द्वारा उत्पन्न ऊर्जा को <strong>प्रकाशीय विकिरण</strong> कहा जाता है। यह आवेश दोलन करते हुये एक विद्युत क्षेत्र तथा एक चुंबकिय क्षेत्र द्वारा उत्पन्न होता है इसलिए प्रकाश को विद्युत-चुंबकिय विकिरण कहा जाता है। ध्यान दें कि यह दोनों क्षेत्र एक दूसरे के लंबवत दोलन कर रहे होते हैं और प्रकाश विद्युत-चुंबकिय विकिरण के कई प्रकारो मे से केवल एक प्रकार मात्र है। इन सभी प्रकारों को <strong>विद्युत-चुंबकिय वर्णक्रम( electromagnetic spectrum )</strong> पर विद्युत-चुंबकिय क्षेत्र के दोलन करने की<strong> आवृत्ति (frequency)</strong> के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। हमारे द्वारा दृश्य प्रकाश की आवृत्ति विद्युत-चुंबकिय वर्णक्रम का एक नन्हा सा भाग है जिसके एक ओर बैंगनी(अधिकतम आवृत्ति) और दूसरी ओर लाल रंग(न्यूनतम आवृत्ति) का प्रकाश है। बैंगनी प्रकाश की आवृत्ति अधिक होती है अर्थात उसकी ऊर्जा अधिक होती है। यदि आप <a href="http://vigyan.files.wordpress.com/2011/07/emfspectrum1.jpg">विद्युत-चुंबकिय वर्णक्रम</a> को देंखे तो पायेंगे कि गामा किरणे सबसे ज्यादा ऊर्जा वाली किरणे है। कोई आश्चर्य नही कि गामा किरणे अधिकतर पदार्थो को भेद देती है। ये किरणे इतनी ज्यादा ऊर्जा रखती है कि वे आपको जैविक रूप से प्रभाव डाल सकती है, आपके डीएनए को प्रभावित कर कैंसर उत्पन्न करने की क्षमता रखती है गामा किरणे! इस विद्युत-चुंबकिय विकिरण मे ऊर्जा की मात्रा विकिरण की आवृत्ति पर निर्भर है। दृश्य विद्युत-चुंबकिय विकिरण जिसे हम प्रकाश कहते है उसे भी हम भिन्न आवृत्तियों के आधार पर अलग अलग कर सकते है; जिसमे हर आवृत्ति से संबंधित एक प्रकाश रंग होता है।</p>
<h2><strong>प्रकाश के गुणधर्म</strong></h2>
<p><a href="http://vigyan.files.wordpress.com/2013/05/prism.gif"><img class="size-medium wp-image-2560 alignright" alt="prism" src="http://vigyan.files.wordpress.com/2013/05/prism.gif?w=300&#038;h=109" width="300" height="109" /></a>जब प्रकाश अंतरिक्ष मे यात्रा करता है तब वह कई प्रकार के माध्यमो से गुजरता है। हम प्रकाश के परावर्तन(reflection) को से भलीभांति परिचित है क्योंकि हमने किसी चमकीली सरल सतह जैसे दर्पण द्वारा प्रकाश के परावर्तन को देखा है। यह प्रकाश का किसी विशिष्ट पदार्थ से किया गया विशेष व्यवहार है। जब प्रकाश एक माध्यम से दूसरे माध्यम मे प्रवेश करता है उसकी किरणे मुड् जाती है, उसे हम अपवर्तन(refraction) कहते है। यदि कोई प्रकाश के मार्ग मे स्थित कोई माध्यम प्रकाश की भिन्न आवृत्तियों को भिन्न भिन्न तरीके से मोड़ दे तो हम प्रकाश के घटक रंगो को देख सकते है। उदाहरण के लिये वातावरण मे उपस्थित पानी की बूंदे सूर्य प्रकाश से इंद्र धनुष का निर्माण करती है। पानी की यह बूंदे सूर्यप्रकाश की भिन्न भिन्न आवृत्तियों को भिन्न भिन्न तरीके मोड़ देती है जिससे हर रंग का प्रकाश अलग हो जाता है और हमें प्रकाश के वर्ण-क्रम से सुंदर रंग दिखायी पड़ते है। कांच का प्रिज्म भी यही कार्य करता है। प्रिज्म पर जब एक विशिष्ट कोण पर प्रकाश डाला जाता है, प्रकाश अपवर्तित(मुडता) होता है, हर आवृत्ति अलग अलग कोण से मुडती है जिससे हमे अलग अलग रंग दिखायी पड़ते है। यह प्रभाव प्रिज्म के आकार और प्रकाश के कोण से उत्पन्न होता है।<br />
<a href="http://vigyan.files.wordpress.com/2013/05/relativity1.gif"><img class="alignright size-medium wp-image-2565" alt="relativity1" src="http://vigyan.files.wordpress.com/2013/05/relativity1.gif?w=300&#038;h=132" width="300" height="132" /></a></p>
<p>यदि आप दायें चित्र को ध्यान से देखें तो पायेंगे कि प्रकाश कि जब प्रकाश तरंग प्रिज्म मे प्रवेश कर रही है तब वह नीचे की ओर मुड़ रही है। जब प्रकाश वायु से प्रिज्म मे प्रवेश करता है तब उसकी गति कम हो जाती है। जब प्रकाशतरंग का निचला भाग प्रिज्म मे प्रवेश करता है वह धीमा हो जाता है। जबकि प्रकाश तरंग का उपरी भाग जो अभी भी वायु मे है निचले भाग से अधिक गति मे यात्रा कर रहा है, प्रकाश तरंग के उपरी और निचले भाग की गति मे इस अंतर के कारण प्रकाश तरंग मुड़ जाती है। इसी तरह से जब प्रकाश तरंग प्रिज्म से बाहर जाती है, तरंग का उपरी भाग पहले बाहर आता है और उसकी गति निचले भाग से ज्यादा होती है जोकि अभी भी प्रिज्म के अंदर है। गति मे इस अंतर से तरंग मे और अधिक मोड् आ जाता है। किसी स्केटबोर्ड पर कोई खिलाड़ी जब किसी सपाट सतह से घास की सतह पर जाता है तब खिलाड़ी सामने झुक जाता है क्योंकि स्केट की गति कम हो गयी है लेकिन उसका शरीर भी भी पुरानी गति पर है। इसी तरह का व्यवहार प्रकाश भी कर रहा है जब वह एक माध्यम से दूसरे माध्यम मे जाता है तब वह मुड जाता है। स्केटबोर्ड और खिलाडी घास की सतह आने से पहले एक ही गति पर है अचानक स्केटबोर्ड घास की सतह पर आ गया है और स्केटबोर्ड खिलाडी कि तुलना मे धीमा हो गया है, जिससे खिलाडी सामने झुक जाता है। (वास्तविकता मे खिलाडी घास की सतह पर आने से पहले कि गति से चलने का प्रयास कर रहा है, न्युटन का गति का पहला नियम!)</p>
<p>हम प्रकाश की संरचना के बारे मे कुछ जानते है , अब हम प्रकाश गति समझने का प्रयास करते है। प्रकाश विद्युत-चुंबकिय विकिरण है, इसलिये प्रकाश गति को विद्युत-चुंबकिय विकिरण की गति के रूप मे समझना ज्यादा आसान है। वास्तविकता मे प्रकाशगति <strong>&#8220;सूचना की गति&#8221;</strong> है। कोई घटना घटित हुयी है या नही इसका पता हमे उस घटना की सूचना मिलने पर ही होता है। यह सूचना हमे उस घटना से उत्पन्न रेडीयो संकेत /प्रकाश द्वारा प्राप्त विद्युत-चुंबकिय विकिरण मे निहित होती है। कोई भी घटना काल-अंतराल मे उत्पन्न एक संयोग है और किसी भी घटना की सूचना किसी विकिरण के रूप मे ही उत्सर्जित होती है। निर्वात(Vaccume) मे इस <strong>सूचना का प्रवाह 299,792,458 मीटर/सेकंड</strong> की गति से होता है। एक लंबी  रेल-गाड़ी जब चलना प्रारंभ करती है तब अंतिम डिब्बा इंजन से साथ उसी समय एक साथ चलना प्रारंभ नही करता है। सबसे पहले इंजन चलता है, उसके बाद इंजन से सटा डिब्बा, उसके बाद दूसरा डिब्बा, क्रमशः अंत मे आखिरी डिब्बा। इंजन से आखिरी डिब्बे तक गति के प्रवाह मे विलंब होता है, इंजन से चलने की सूचना आखिरी डिब्बे तक कुछ् विलंब से पहुँच रही है। यह <strong>विलंब</strong> विशेष सापेक्षतावाद सूचना के स्थानांतरण के जैसे ही है, लेकिन<strong> विशेष सापेक्षतावाद मे सूचना की गति कि एक अधिकतम सीमा है; प्रकाशगति</strong>! कोई भी सूचना इस गति से ज्यादा तेज नहीं जा सकती है। आप रेल के इस उदाहरण को कितना भी विस्तृत कर लें लेकिन किसी भी तरह से इंजन के चलने की सूचना आप आखिरी डिब्बे तक प्रकाशगति से तेज नही पहुँचा सकते है!</p>
<p>प्रकाशगति पर हम इतना जोर क्यों दे रहे हैं ? क्योंकि यह एक विशेष गति है जो हम आने वाले लेखों मे विस्तार से देखेंगे!</p>
<p><strong>अगले अंक मे विशेष सापेक्षतावाद!</strong></p>
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		<title>सापेक्षतावाद सिद्धांत : ब्रह्माण्ड के गुणधर्म</title>
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		<pubDate>Mon, 29 Apr 2013 09:01:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[ब्रह्मांड]]></category>
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		<description><![CDATA[यदि आप ब्रह्माण्ड की व्याख्या कुछ मूलभूत शब्दो मे करना चाहें तो  आप कह सकते है कि ब्रह्माण्ड के कुछ सरल गुणधर्म होते हैं। हम इन सभी गुणों से परिचित भी हैं, इतने ज्यादा कि हम उन पर ध्यान भी नही देतें हैं। लेकिन विशेष सापेक्षतावाद के अंतर्गत ये गुणधर्म हमारी अपेक्षा के विपरीत आश्चर्यजनक [&#8230;]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=vigyan.wordpress.com&#038;blog=370709&#038;post=2531&#038;subd=vigyan&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>यदि आप ब्रह्माण्ड की व्याख्या कुछ मूलभूत शब्दो मे करना चाहें तो  आप कह सकते है कि ब्रह्माण्ड के कुछ सरल गुणधर्म होते हैं। हम इन सभी गुणों से परिचित भी हैं, इतने ज्यादा कि हम उन पर ध्यान भी नही देतें हैं। लेकिन विशेष सापेक्षतावाद के अंतर्गत ये गुणधर्म हमारी अपेक्षा के विपरीत आश्चर्यजनक रूप से व्यवहार करतें हैं। विशेष सापेक्षतावाद पर आगे बढने से पहले ब्रह्माण्ड के इन मूलभूत गुणो की चर्चा करतें है।</p>
<p><strong>अंतराल/अंतरिक्ष(Space)</strong></p>
<div id="attachment_43" class="wp-caption alignright" style="width: 161px"><a href="http://vigyan.files.wordpress.com/2007/01/3d.png"><img class=" wp-image-43   " alt="त्री-आयामी" src="http://vigyan.files.wordpress.com/2007/01/3d.png?w=151&#038;h=121" width="151" height="121" /></a><p class="wp-caption-text">त्री-आयामी</p></div>
<p>हम जो भी कुछ भौतिक वस्तुओ को देखते है या जो भी घटना घटीत होती है , वह अंतराल/अंतरिक्ष के तीन आयामो मे होती है। अंतराल/अंतरिक्ष यह हमारे भौतिक विश्व का त्रीआयामी चित्रण है। इसी अंतराल/अंतरिक्ष के कारण किसी भी पिंड/वस्तु की तीन दिशाओ मे लंबाई, चौडाई और ऊंचाई होती है और वह तीन दिशाओ दायें/बायें, उपर/नीचे तथा आगे/पिछे  गति कर सकता है।</p>
<p><strong><span id="more-2531"></span>समय</strong></p>
<p><a href="http://vigyan.files.wordpress.com/2013/04/infinity-time2.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-2544" alt="Infinity-Time2" src="http://vigyan.files.wordpress.com/2013/04/infinity-time2.jpg?w=300&#038;h=179" width="300" height="179" /></a>समय अंतराल का चौथा आयाम है। सामन्य जीवन मे समय को हम अंतराल मे होने वाली विभिन्न घटनाओ के बहाव को मापने के उपकरण के रूप मे प्रयुक्त करते हैं। जी हां हम समय को एक उपकरण की तरह प्रयोग करते है लेकिन समय हमारे भौतिक आस्तित्व के लिये आवश्यक है। किसी भी घटना की व्याख्या के लिये हम समय और अंतराल(अंतरिक्ष) को अलग नहीं कर सकते है। ये दोनो एक दूसरे से सहजीवी के रूप मे गुंथे हुये है। किसी एक की अनुपस्थिति मे दूसरे का कोई अर्थ नही है। दूसरे शब्दो मे समय के बिना अंतराल(अंतरिक्ष) व्यर्थ है, वैसे ही अंतराल(अंतरिक्ष) के बिना समय व्यर्थ है। समय और अंतराल(अंतरिक्ष) की एक दूसरे पर निर्भरता को ही<strong> काल-अंतराल-सातत्य( Spacetime Continuum)</strong> कहा जाता है। इसका अर्थ है कि हमारे ब्रह्माण्ड मे कोई भी उपस्थिति काल-अंतराल की एक घटना है। विशेष सापेक्षतावाद के अंतर्गत काल-अंतराल को<strong> सार्वत्रिक-समय( universal time component)</strong> की आवश्यकता नहीं है। इसके अंतर्गत किसी भी घटना का समय दो भिन्न गति करते प्रेक्षकों के लिये एक दूसरे के सापेक्ष भिन्न होगा। हम आगे देखेंगे कि  विशेष सापेक्षतावाद के अनुसार कोई भी दो घटनांये एक साथ  घटित नहीं हो सकती हैं।</p>
<p><strong>पदार्थ(matter)</strong></p>
<p>पदार्थ की सबसे सरल परिभाषा के रूप मे स्थान(अंतराल/अंतरिक्ष) ग्रहण करने वाली कोई भी वस्तु है। कोई भी पिंड जिसे आप देख सकते है, स्पर्श कर सकते हैं, या बल प्रयोग से उसे हटा सकते है पदार्थ है। आपने बचपन से कक्षाओ मे पढा ही होगा कि पदार्थ अरबो सूक्ष्म संघनित परमाणुओ से बना होता है। उदाहरण के लिये पानी एक यौगिक है जो दो हायड्रोजन और एक आक्सीजन के परमाणु से बने अणुओ होता है।</p>
<p><a href="http://vigyan.files.wordpress.com/2013/04/matter.jpg"><img class="aligncenter size-medium wp-image-2546" alt="matter" src="http://vigyan.files.wordpress.com/2013/04/matter.jpg?w=300&#038;h=213" width="300" height="213" /></a></p>
<p>लेकिन यह परमाणु भी और छोटे कणो से बना होता है जिन्हे <strong>न्युट्रान, प्रोटान और इलेक्ट्रान</strong> कहते है। न्युट्रान और प्रोटान परमाणु के केन्द्र मे तथा इलेक्ट्रान इस केन्द्रक की परिक्रमा करते होते है। न्युट्रान इनमे सबसे भारी कण होता है लेकिन विद्युत-उदासीन होता है। प्रोटान भी भारी कण(न्युट्रान से हल्का) है लेकिन धनात्मक आवेशित होता है। इलेक्ट्रान हल्के कण होते है और ऋणात्मक रूप से आवेशित होते है। किसी परमाणु के इन कणो की संख्या से उस परमाणु के गुणधर्म परिभाषित होते है। उदाहरण के लिये परमाणु मे एक ही प्रोटान हो तो वह हायड्रोजन का परमाणु , दो हो तो हिलीयम , तीन हो तो लिथियम बनायेगा। प्रोटानो की यही संख्या उस परमाणु का ब्रह्माण्ड मे व्यवहार निर्धारित करती है। परमाणु मे प्रोटान तथा इलेक्ट्रानो की संख्या समान होती है। न्युट्रानो की संख्या भी सामान्यतः प्रोटानो के बराबर होती है लेकिन उनका समान होना आवश्यक नही है।</p>
<p><strong>गति(motion)</strong></p>
<p>कोई भी वस्तु जो अंतरिक्ष मे स्थानांतरण कर रही हो गतिमान होती है। गति भौतिकी की बहुत सी दिलचस्प अवधारणाओ को जन्म देती है।</p>
<h2><strong>द्रव्यमान तथा ऊर्जा (Mass and Energy)</strong></h2>
<p><strong>द्रव्यमान</strong></p>
<p>किसी पदार्थ के द्रव्यमान की दो परिभाषायें है और दोनो महत्वपुर्ण हैं। एक परिभाषा जो हाईस्कूल मे पढाई जाती है और दूसरी पूर्ण रूप से तकनिकी है जो भौतिकी मे प्रयुक्त की जाती है।</p>
<p>सामन्यतः <strong>द्रव्यमान को किसी पिंड मे पदार्थ की मात्रा</strong> (अर्थात इलेक्ट्रान, प्रोटान और न्यूट्रान की संख्या )के रूप मे परिभषित किया जाता है। यदि आप द्रव्यमान को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से गुणा कर दें तब आपको <strong>भार (Weight)</strong>प्राप्त होगा। जब आप यह कहते है कि खाना खाने या व्यायाम से आपका भार परिवर्तन हो रहा है, वास्तविकता मे आपका द्रव्यमान परिवर्तन हो रहा होता है। ध्यान दें कि द्रव्यमान आपकी अंतरिक्ष मे स्थिति पर निर्भर नही करता है। चंद्रमा पर आपका द्रव्यमान आपके पृथ्वी के द्रव्यमान के समान ही होगा। लेकिन आपका भार चंद्रमा पर पृथ्वी की तुलना मे 1/6 रह जायेगा क्योंकि चंद्रमा पर गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी की तुलना मे 1/6है। पृथ्वी पर ही जैसे आप सतह से दूर जाते है, गुरुत्वाकर्षण कम होते जाता है अर्थात आपका भार कम होते जाता है।</p>
<p><a href="http://vigyan.files.wordpress.com/2013/04/weight-mass.jpg"><img class="aligncenter size-medium wp-image-2549" alt="weight-mass" src="http://vigyan.files.wordpress.com/2013/04/weight-mass.jpg?w=300&#038;h=157" width="300" height="157" /></a></p>
<p>भौतिकी मे द्रव्यमान की परिभाषा थोडी अलग है। इस परिभाषा के अनुसार किसी पिंड की गति मे <strong>&#8220;त्वरण के लिये आवश्यक बल की मात्रा(the amount of force required to cause a body to accelerate)&#8221;</strong> को द्रव्यमान कहा जाता है। भौतिकी मे द्रव्यमान ऊर्जा से जुडा हुआ है। किसी पिंड का द्रव्यमान गतिशिल निरीक्षक के सापेक्ष उस पिंड की गति पर निर्भर करता है। गतिशिल पिंड यदि अपने द्रव्यमान की गणना करता है तब द्रव्यमान हमेशा समान ही रहेगा। लेकिन यदि निरिक्षक गतिशिल नही है और वह गतिशिल पिंड के द्रव्यमान की गणना करता है, तब निरिक्षक पिंड की गति के त्वरित होने पर उस पिंड के द्रव्यमान मे वृद्धि पायेगा। सरल शब्दो मे आप एक जगह खडे होकर किसी गतिशिल पिंड के द्रव्यमान की गणना कर रहे हों और वह पिंड अपनी गति बढाते जा रहा हो तो आप हर मापन मे उस पिंड के द्रव्यमान को पहले से ज्यादा पायेंगे। इसे ही <strong>सापेक्ष द्रव्यमान</strong> (<strong>relativistic mass</strong>)कहते है। ध्यान दिजीये कि आधुनिक भौतिकी मे द्रव्यमान के सिद्धांत का प्रयोग नहीं होता है, अब उसे ऊर्जा के रूप मे ही मापा जाता है। अब ऊर्जा और द्रव्यमान को एक ही माना जाता है। आगे इस पर हम और चर्चा करेंगे।</p>
<p><strong>ऊर्जा(Energy)</strong></p>
<p>किसी तंत्र के कार्य करने की क्षमता की मात्रा ऊर्जा कहलाती है। इसके कई रूप है, जैसे  स्थितिज(potential) ऊर्जा, गतिज(Kinetic) ऊर्जा इत्यादि। ऊर्जा की अविनाशिता के नियम के अनुसार ऊर्जा का निर्माण और विनाश असंभव है, उसे केवल एक रूप से दूसरे रूप मे परिवर्तित किया जा सकता है। ऊर्जा का एक रूप मे संरक्षण नही होता है, तंत्र की कुल ऊर्जा की मात्रा का संरक्षण होता है। जब आप छत से एक गेंद को गिराते हैं, गिरती हुयी गेंद के पास गतिज ऊर्जा होती है। जब आप गेंद को गिराने वाले थे , गेंद के पास स्थितिज(potential) ऊर्जा थी जो गिराने के बाद गतिज(Kinetic) ऊर्जा मे परिवर्तित हो गयी। जैसे ही गेंद जमीन से टकरती है कुछ ऊर्जा तापिय ऊर्जा(heat energy) मे परिवर्तित होती है। यदि आप इस संपूर्ण प्रक्रिया मे हर चरण पर कुल ऊर्जा का मापन करेंगें, कुल ऊर्जा आपको हमेशा समान मिलेगी।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>अगले अंक मे  प्रकाश</strong></p>
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			<media:title type="html">आशीष</media:title>
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		<title>22 अप्रैल : पृथ्वी दिवस पर हमारी वसुंधरा से जुड़े कुछ मनोरंजक तथ्य</title>
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		<pubDate>Mon, 22 Apr 2013 14:58:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[अंतरिक्ष]]></category>
		<category><![CDATA[सौर मंडल]]></category>
		<category><![CDATA[पृथ्वी दिवस]]></category>
		<category><![CDATA[Earth Day]]></category>

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		<description><![CDATA[पृथ्वी दिवस पर हमारी वसुंधरा से जुड़े कुछ मनोरंजक तथ्य!  पृथ्वी का एक दिन 23 घंटे 56 मिनट और 4.091 सेकेंड का होता है। पृथ्वी का घनफल एक ट्रिलीयन घन किमी है। क्या आप 1000 मीटर ऊँचे , 1000 मीटर लम्बे, 1000 मीटर चौड़े घन की कल्पना कर सकते है? अब ऐसे एक ट्रिलीयन घन [&#8230;]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=vigyan.wordpress.com&#038;blog=370709&#038;post=2521&#038;subd=vigyan&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>पृथ्वी दिवस पर हमारी वसुंधरा से जुड़े कुछ मनोरंजक तथ्य!</p>
<ol>
<li><a href="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/9/97/The_Earth_seen_from_Apollo_17.jpg/599px-The_Earth_seen_from_Apollo_17.jpg"><img class="alignright" alt="" src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/9/97/The_Earth_seen_from_Apollo_17.jpg/599px-The_Earth_seen_from_Apollo_17.jpg" width="215" height="215" /></a> पृथ्वी का एक दिन 23 घंटे 56 मिनट और 4.091 सेकेंड का होता है।</li>
<li>पृथ्वी का घनफल एक ट्रिलीयन घन किमी है। क्या आप 1000 मीटर ऊँचे , 1000 मीटर लम्बे, 1000 मीटर चौड़े घन की कल्पना कर सकते है? अब ऐसे एक ट्रिलीयन घन की कल्पना किजीये, वह पृथ्वी है!</li>
<li>पृथ्वी का द्रव्यमान 6,000,000,000,000,000,000,000,000 किलो है।</li>
<li> पृथ्वी पूरी तरह से गोल नहीं है। घू्र्णन से ध्रुवों पर चपटी है। ध्रुवों से व्यास 12,713.6 किमी (7882.4 मील) है लेकिन विषुवत पर 12,756.2 किमी (7908.8 मील ) है। दोनो में अंतर 43 किमी का है, जो 0.3 प्रतिशत है, यह ज़्यादा नहीं है लेकिन है।<span id="more-2521"></span></li>
<li>पृथ्वी थोड़ी चपटी तो है लेकिन सूर्य और चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण उसे और चपटा करते है जिसे हम ज्वार भाटा कहते हैं। जीहाँ यह प्रभाव सागर पर लगभग एक मीटर का होता है लेकिन ठोस ज़मीन पर भी यह आधा मीटर होता है।</li>
<li> ऐसी कोई जगह नहीं है जहाँ पृथ्वी का वातावरण समाप्त हो कर अंतरिक्ष प्रारभ होता है। वातावरण उंचाई के साथ पतला होता जाता है। आधिकारिक रूप से 100 किमी ऊँचाई पर अंतरिक्ष प्रारंभ माना जाता है जिसे कारमन रेखा कहते है। इस ऊँचाई पार करने वाले को अंतरिक्ष यात्री कहा जाता है।</li>
<li>चंद्रमा का व्यास पृथ्वी का एक चौथाई है, जो उसे मातृ ग्रह की तुलना में सबसे बड़ा उपग्रह बनाता है। वैसे शेरान जो प्लूटो का सबसे बड़ा उपग्रह है, प्लूटो के व्यास के आधे से ज़्यादा व्यास का है। लेकिन अब प्लूटो ग्रह नहीं है, इसलिये चंद्रमा विजेता है!</li>
<li>चंद्रमा आपकी कल्पना ज़्यादा दूर है। यदि हम पृथ्वी बास्केटबाल की गेंद माने तो चंद्रमा 7.4 मीटर दूरी पर एक टेनिस की गेंद है।</li>
<li>पृथ्वी का वातावरण विद्युत चुंबकिय विकिरण के एक छोटे भाग को ही पार होने देता है जिसे हम प्रकाश कहते है, अन्य मुख्य भाग जैसे अवरक्त , पराबैंगनी, क्ष किरण और गामा किरण रोक दी जाती है। यह सब ख़तरनाक विकिरण है, अन्यथा जीवन संभव नहीं था।</li>
<li>पृथ्वी गरम हो रही है और यह एक तथ्य है।</li>
<li>पृथ्वी पर 200 से कम उल्कापात से बने क्रेटर है, जबकि चंद्रमा पर वे अरबों में है। पृथ्वी के कई क्रेटर हवा पानी से नष्ट हो चुके है और वे करोड़ों वर्ष पूराने है जबकि चंद्रमा पर वे नये है।</li>
<li>एक क्षुद्रग्रह 2010 TKपृथ्वी की कक्षा में सूर्य की परिक्रमा करता है लेकिन वह कभी पृथ्वी के क़रीब नहीं आयेगा। वह 300 मीटर लंबा है।</li>
<li>पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा एक दीर्घ वृत्त में करती है। पृथ्वी सूर्य की सबसे समिपस्थ स्थिति में 147.1 मिलियन किमी (91.3 मिलियन मील) तथा दूरस्थ स्थिति 152.1 मिलियन किमी (94.3 मिलियन मील ) दूर होती है।</li>
<li> <a href="http://ga.water.usgs.gov/edu/2010/pictures/global-water-volume-fresh.jpg"><img class="alignright" alt="" src="http://ga.water.usgs.gov/edu/2010/pictures/global-water-volume-fresh.jpg" width="144" height="144" /></a>यदि आप पृथ्वी के समस्त पानी की एक बुँद बनाये तो वह 1400 किमी (860 मील ) व्यास मात्र की ही होगी।</li>
<li> पृथ्वी के वातावरण का वज़न 5000 ट्रिलीयन टन है।</li>
<li> पृथ्वी अब तक का ज्ञात इकलौता ग्रह है जिसपर जीवन है!</li>
</ol>
<p>Source <a href="http://www.slate.com/blogs/bad_astronomy/2013/04/22/earth_day_15_facts_about_our_planet.html" rel="nofollow">http://www.slate.com/blogs/bad_astronomy/2013/04/22/earth_day_15_facts_about_our_planet.html</a></p>
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			<media:title type="html">आशीष</media:title>
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	</item>
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		<title>सापेक्षतावाद सिद्धांत : परिचय</title>
		<link>http://vigyan.wordpress.com/2013/04/15/relativity/</link>
		<comments>http://vigyan.wordpress.com/2013/04/15/relativity/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 15 Apr 2013 08:46:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[ब्रह्मांड]]></category>
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		<description><![CDATA[अलबर्ट आइन्स्टाइन ने 1905 में &#8220;विशेष सापेक्षतावाद(Theory of Special Relativity)&#8221; तथा 1915 में &#8220;सामान्य सापेक्षतावाद(Theory of General Relativity)&#8221; के सिद्धांत को प्रस्तुत कर भौतिकी की नींव हीला दी थी। सामान्य सापेक्षतावाद के सिद्धांत के अनुसार न्युटन के गति के तीन नियम(Newtons laws of motion) पूरी तरह से सही नहीं है, जब किसी पिंड की गति [&#8230;]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=vigyan.wordpress.com&#038;blog=370709&#038;post=2497&#038;subd=vigyan&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><strong><img class=" wp-image-2510 alignleft" style="margin:5px;" alt="einsteen" src="http://vigyan.files.wordpress.com/2013/04/einsteen.png?w=98&#038;h=139" width="98" height="139" /><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Albert_Einstein">अलबर्ट आइन्स्टाइन</a></strong> ने 1905 में <strong>&#8220;विशेष सापेक्षतावाद(Theory of Special Relativity)</strong>&#8221; तथा 1915 में &#8220;<strong>सामान्य सापेक्षतावाद(Theory of General Relativity)</strong>&#8221; के सिद्धांत को प्रस्तुत कर भौतिकी की नींव हीला दी थी। सामान्य सापेक्षतावाद के सिद्धांत के अनुसार <strong><a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82%E0%A4%9F%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%97%E0%A4%A4%E0%A4%BF_%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%AE">न्युटन के गति के तीन नियम(Newtons laws of motion)</a> पूरी तरह से सही नहीं है</strong>, जब किसी पिंड की गति प्रकाश गति के समीप पहुंचती है वे कार्य नहीं करते है। साधारण सापेक्षतावाद के सिद्धांत के अनुसार <strong><a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82%E0%A4%9F%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%A3_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4">न्युटन का गुरुत्व का सिद्धांत </a>भी पूरी तरह से सही नहीं है</strong> और वह अत्याधिक गुरुत्वाकर्षण वाले क्षेत्रो में कार्य नहीं करता है।</p>
<p>हम सापेक्षतावाद को विस्तार से आगे देखेंगे, अभी हम केवल न्युटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत तथा साधारण सापेक्षतावाद सिद्धांत के मध्य के अंतर को देखेंगे। ये दोनों सिद्धांत कमजोर गुरुत्वाकर्षण के लिए समान गणना करते है , यह एक सामान्य परिस्तिथी है जो हम रोजाना देखते और महसूस करते है। लेकिन निचे तीन उदाहरण दिए है जिसमे इन दोनों सिद्धांतो की गणनाओ में अंतर स्पष्ट हो जाता है।<span id="more-2497"></span></p>
<p><strong>न्युटन के सिद्धांत और आइन्स्टाइन के सापेक्षतावाद के सिद्धांत के मध्य कुछ मूलभूत </strong><strong>अन्तर</strong></p>
<ol>
<li><a href="http://vigyan.files.wordpress.com/2013/04/mercury_precession.gif"><img class="alignright  wp-image-2499" alt="mercury_precession" src="http://vigyan.files.wordpress.com/2013/04/mercury_precession.gif?w=192&#038;h=115" width="192" height="115" /></a>बुध गृह की कक्षा समय के साथ चित्र में दिखाए अनुसार अपने प्रतल से विचलित होती है। (चित्र में विचलन को बढा चढ़ा कर दिखाया गया है,वास्तविकता  में यह कम है।) इसे सामान्य रूप से<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Precession_of_the_perihelion_of_Mercury#Perihelion_precession_of_Mercury"><strong> ग्रह की सूर्य समीप स्थिती में विचलन(precession of the perihelion )</strong></a> कहा जाता है। न्युटन के सिद्धांत के अनुसार इस विचलन को पूरी तरह से समझा नहीं जा सकता है। लेकिन साधारण सापेक्षतावाद के सिद्धांत के अनुसार हर शताब्दी में 43 सेकण्ड का विचलन अतिरिक्त होना चाहीये , और यह विचलन निरिक्षणों के अनुरूप था। यह प्रभाव काफ़ी छोटा है लेकिन गणना के अनुसार और सटीक है ।</li>
<li>आइन्स्टाइन के सिद्धांत के अनुसार गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में प्रकाश की दिशा में परिवर्तन होना चाहिए जोकि न्युटन के सिद्धांत के विपरीत है। लेकिन सूर्यग्रहण के समय इसे निरीक्षित कीया गया और आइन्स्टाइन के सिद्धांत के प्रभाव और सटीक मूल्य को सही पाया गया। इस प्रभाव को <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Gravitational_lensing"><strong>गुरुत्वीय लेंसींग(gravitational lensing)</strong></a> कहा जाता है।</li>
<li>साधारण सापेक्षतावाद के सिद्धांत के अनुसार किसी विशाल गुरुत्वीय क्षेत्र से आने वाले प्रकाश में लाल विचलन होना चाहीये, यह भी न्युटन के सिद्धांत के विपरीत है। विस्तृत निरिक्षणो विशाल गुरुत्वीय क्षेत्र से आने वाले प्रकाश में <a href="https://vigyan.wordpress.com/2006/08/29/doplarredshift/"><strong>लाल विचलन(red shift)</strong></a> पाया गया और उसका मूल्य आइन्स्टाइन के सिद्धांत की गणना से सटीकता से मेल खाता था।<br />
<strong>विद्युत-चुम्बकीय(electro-magnetic)</strong> क्षेत्र की तरंगे हो सकती है जो ऊर्जा का वहन करती है, इसी तरंग को प्रकाश कहा जाता है। उसी तरह से गुरुत्वीय क्षेत्र की भी ऊर्जा वहां करने वाली तरंग होना चाहीये, जिसे <strong>गुरुत्वीय तरंगे(gravitational wave)</strong> कहते है। इन तरंगो को <a href="http://vigyan.wordpress.com/2007/01/12/spacetime/"><strong>काल-अंतराल(space-time)</strong></a> में वक्रता उत्पन्न करने वाली लहरों के रूप में देखा जा सकता है। इन तरंगो की गति भी प्रकाश गयी के तुल्य होना चाहीये। जिस तरह त्वरण करते आवेश से विद्युत्-चुम्बकीय तरंगे उत्पन्न होई है, त्वरण करते द्रव्यमान से भी गुरुत्वीय तरंगे उत्पन्न होनी चाहीये। लेकिन गुरुत्वीय तरंगे को महसूस करना  या उनका निरिक्षण करना कठिन है क्योंकि वे बहुत कमजोर होती है। अभी तक उनके निरिक्षण का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मील पाया है लेकिन उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से <strong>युग्म पल्सर(binary pulsers)</strong> तारो में देखा गया है। पल्सर तारो से उत्पन्न पल्सो के आगमन समय को सटीकता से मापा जा सकता है, इससे यह जाना जा सकता है की युग्म पल्सर तारो की कक्षा<strong> धीमे धीमे कम</strong> हो रही है। यहाँ पाया गया है की कक्षा में कमी की दर <em>एक वर्ष में एक सेकंड का दस लांखवाँ</em> भाग है , यहाँ कमी गुरुत्वीय तरंगो के रूप में ऊर्जा क्षय के फलस्वरूप है जोकि साधारण सापेक्षतावाद के सिद्धांत के अनूरूप है ।</li>
</ol>
<p><strong>विशेष सापेक्षतावाद</strong></p>
<p>आइन्स्टाइन का विशेष सापेक्षतावाद सिद्धांत उन्ही तंत्रों के लिए है जो त्वरण नहीं कर रहे हो अर्थात उनकी गति में कोई परिवर्तन नहीं हो रहा हो। न्युटन के दूसरे नियम के अनुसार त्वरण के लिए बाह्य बल आवश्यक है, विशेष सापेक्षतावाद बलो की अनुपस्थिति में ही वैध है। इसी वजह से इसे गुरुत्वीय बल की उपस्थिति वाले क्षेत्रो में में प्रयोग में नहीं लाया जा सकता है।<em><strong> हम इस लेख श्रृंखला में देखेंगे की इसे किस तरह से प्रयोग में लाया जाता है।</strong></em></p>
<ul>
<li>विशेष सापेक्षतावाद की सबसे बड़ी खोज द्रव्यमान तथा ऊर्जा में संबध है।</li>
</ul>
<p style="text-align:center;">E=mc<sup>2</sup></p>
<ul>
<li>दूसरी सबसे बड़ी खोज काल और अंतराल पर गति का प्रभाव है। प्रकाश गति के समीप गति प्राप्त करने पर अंतराल गति की दिशा में सिकुड जाता है तथा समय की गति धीमी हो जाती है। यह सब विचित्र  लगता है क्योंकि हमने आज तक प्रकाश गति की गति के तुल्य कोई भी वस्तु/पिंड देखा नहीं है, लेकिन अनेक प्रयोगों ने सिद्ध किया है कि  विशेष सापेक्षतावाद का सिद्धांत सही है और हमारी समझ से सही न्युटन के नियम प्रकाश गति के समीप गलत हो जाते है।</li>
</ul>
<p><strong>साधारण सापेक्षतावाद</strong></p>
<p>विशेष सापेक्षतावाद के सिद्धांत की एक सीमा है कि इसके वैध होने के लिए त्वरण अर्थात बलो की अनुपस्थिति अनिवार्य है। विशेष सापेक्षतावाद सिद्धांत की इस कमी को दूर करने के लिए आइन्स्टाइन ने साधारण सापेक्षतावाद का सिद्धांत प्रस्तुत किया। आइन्स्टाइन को इस सिद्धांत के विकास के लिए दस वर्ष लग गये। उन्होंने विशेष सापेक्षतावाद के सिद्धांत में गुरुत्वीय बल के प्रभाव को जोड़ते हुए <strong>साधारण सापेक्षतावाद का सिद्धांत</strong> प्रस्तुत किया। न्युटन के गुरुत्व बल के सिद्धांत की जगह लेने एक नया सिद्धांत आ गया।</p>
<p><em>(अगले अंको में हम सापेक्षतावाद के सिद्धांत को विस्तार से देखेंगे। अगला अंक इस सिद्धांत को समझने के लिए अनिवार्य मूलभूत तकनीकी शब्दों/जानकारीयों  पर केन्द्रित  होगा)</em></p>
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		<title>हिग्स बोसान संबधित 10 महत्वपूर्ण तथ्य</title>
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		<pubDate>Fri, 15 Feb 2013 04:04:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>आशीष श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[नयी खोज]]></category>
		<category><![CDATA[ब्रह्मांड]]></category>
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		<description><![CDATA[ हिग्स बोसान ’ईश्वर कण’ नही है। जी हाँ लोग उसे ईश्वर कण कहते है क्योंकि लेओन लेडरमैन ने अपननी ’ईश्वर कण&#8221; नामक पुस्तक मे हिग्स बोसान को यह नाम दिया था। यह पुस्तक के विपणन के लिये एक अच्छा नाम था लेकिन वैज्ञानिक रूप से गलत था। इसी पुस्तक मे लेखक लेओन लेडरमैन तथा सह [&#8230;]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=vigyan.wordpress.com&#038;blog=370709&#038;post=2479&#038;subd=vigyan&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<ol>
<li> <a href="http://vigyan.files.wordpress.com/2013/02/higgsboson.jpg?w=300"><img class="alignright  wp-image-2489" alt="" src="http://vigyan.files.wordpress.com/2013/02/higgsboson.jpg?w=240&#038;h=136" width="240" height="136" /></a><strong>हिग्स बोसान ’ईश्वर कण’ नही है।</strong> जी हाँ लोग उसे ईश्वर कण कहते है क्योंकि <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Leon_Lederman"><strong>लेओन लेडरमैन</strong></a> ने अपननी ’<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/The_God_Particle:_If_the_Universe_Is_the_Answer,_What_Is_the_Question%3F"><strong>ईश्वर कण</strong></a>&#8221; नामक पुस्तक मे हिग्स बोसान को यह नाम दिया था। यह पुस्तक के विपणन के लिये एक अच्छा नाम था लेकिन वैज्ञानिक रूप से गलत था। इसी पुस्तक मे लेखक लेओन लेडरमैन तथा सह लेखक डीक टेरेसी ने लिखा है कि प्रकाशक इस पुस्तक का नाम ’<strong><a href="http://en.wiktionary.org/wiki/Goddamn">गाडडैम </a>पार्टीकल</strong>’ रखने के लिये तैयार नही था जबकि यह नाम हिग्स कण को खोजने मे आने वाली कठिनाईयों तथा अधिक लागत के संदर्भ मे उपयुक्त नाम था।</li>
<li> <strong>हिग्स बोसान के लिये नोबेल मिलेगा लेकिन किसे ?</strong> हम नही जानते है। हिग्स बोसान का आईडीया 1963 तथा 1964 के बहुत से शोधपत्रो के द्वारा प्रकाश मे आया था। एक शोधपत्र <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Francois_Englert">फ्रांसवा एन्ग्लेर्ट(Francois Englert)</a> तथा <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Robert_Brout">राबर्ट ब्राउट (Robert Brout) </a>का था, दो शोधपत्र <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Peter_Higgs">पिटर हिग्स(Peter Higgs)</a> के और एक शोधपत्र <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Gerald_Guralnik">गेराल्ड गुरानिक(Gerald Guralnik)</a> ,<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/C._R._Hagen">रिचर्ड हेगन(Richard Hagen)</a> तथा <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Tom_Kibble">टाम किबल(Tom Kibble) </a>का था। परंपराओं के अनुसार एक वर्ष मे भौतिकी का नोबेल अधिकतम तीन लोगों को दिया जाता है। इसलिये चयन कठिन है। हिग्स बोसान की सैद्धांतिक खोज के साथ प्रायोगिक खोज भी महत्वपूर्ण है लेकिन इसमे समस्त विश्व मे फैले लगभग 7000 वैज्ञानिको का योगदान है जोकि नोबेल पुरस्कार के चयन को और कठिन बनाता है। यह संभव है कि <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/LHC">लार्ज हेड्रान कोलाइडर( Large Hadron Collider) </a>के निर्माताओं मे से किसी को नोबेल दिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त यह भी संभव है कि तीन व्यक्तियों के नियमो से बाहर जाकर शांति के नोबेल की तरह इसे एक संस्था को दिया जाये।<span id="more-2479"></span></li>
<li><strong>शायद हिग्स बोसान की खोज हो गयी है लेकिन अभी हम पूर्णतः संतुष्ट नही है।</strong> यह तय है कि हमने एक नया कण खोजा है। लेकिन यह तय करने मे कि हमने वास्तविकता मे क्या खोजा है , ज्यादा आंकड़े और समय चाहीये। अगले कुछ वर्षो मे वैज्ञानिको के लिये इस नये कण के गुणधर्मो को तय करने का कठिन कार्य होगा और इन गुणधर्मो का सैद्धांतिक हिग्स बोसान कणो के गुणधर्मो से मिलान किया जायेगा। इससे तय होगा कि यह नया कण पचास वर्ष पहले संकल्पित हिग्स बोसान कण है या कोई अन्य कण। यदि इसके गुण हिग्स बोसान से मिलते तो हम कह सकते है कि वह हिग्स बोसान है अन्यथा खोज जारी रहेगी, एक नया रहस्य जुड़ जायेगा।</li>
<li><strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/LHC"><img class="alignright" alt="" src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/0/06/Location_Large_Hadron_Collider.PNG/220px-Location_Large_Hadron_Collider.PNG" width="154" height="154" />लार्ज हेड्रान कोलाइडर( Large Hadron Collider) </a>एक प्रभावशाली यंत्र है।</strong> जीनेवा स्विटजरलैंड स्थित लार्ज हेड्रान कोलाइडर जिसने हिग्स बोसान की खोज की है वह मानव द्वारा निर्मित सबसे जटिल यंत्र है। यह एक वलयाकार चुंबकीय मशीन है जोकि जमीन की सतह के 100 मीटर नीचे है और उसकी परिधी 27 किमी है। यह मशीन एक समय मे 100 ट्रीलीयन प्रोटानों को प्रकाशगति के 99.999999% गति तक त्वरण देती है और इन प्रोटानो को आपस मे एक सेकंड मे 1000 लाख बार टकराती है। प्रोटानो की इस धारा को ले जाने वाली इसकी नली मे चंद्रमा के वातावरण के जैसे निर्वात उत्पन्न किया जाता है तथा इस नली का तापमान आकाशगंगाओं के मध्य के अंतरीक्ष के जैसे शीतल होता है। इन सभी प्रोटानो की कुल गतिज ऊर्जा किसी तेज गति से जाती मालगाड़ी के तुल्य होती है। इस मशीन मे लगी हुई तारो की कुल लंबाई 275,000 किमी है जोकि पृथ्वी को 7 बार लपेटने के लिये पर्याप्त है।</li>
<li><strong>लार्ज हेड्रान कोलाइडर से विश्व के नष्ट होने की कभी कोई संभावना नही थी।</strong> आपको कुछ सनकी व्यक्तियों द्वारा उत्पन्न अफवाहे याद होंगी जिसमे एलएचसी द्वारा विश्व के नष्ट होने की भविष्यवाणी की गयी थी। लोग डर गये थे कि इस मशीन से एक छोटा ब्लैक होल उत्पन्न होगा और वह पृथ्वी को नष्ट कर देगा और हम सब मारे जायेंगे। लेकिन यह किसी ने नही समझाया कि क्यो इस जटिल विशालकाय मशीन के निर्माता भौतिक वैज्ञानिक आत्महत्या के लिये इतना कठिन रास्ता चुनेंगे? यह अफवाहें मुर्खतापूर्ण थी, क्योंकि इस मशीन ऐसा कुछ नही होने जा रहा था जोकि अंतरिक्ष मे हमेशा नही होते रहती है। हाँ 19 सितंबर 2008 को एक चुंबक मे विस्फोट हुआ था लेकिन कोई घायल नही हुआ था। इस मशीन से होने वाली दुर्घटनाओं मे अज्ञान के अतिरिक्त किसी की जान नही गयी है।</li>
<li><strong>हिग्स बोसान सबसे महत्वपूर्ण कण नही है।</strong> हिग्स बोसान अन्य कणो की तरह ही एक और कण है। महत्वपूर्ण है हिग्स यांत्रिकी। वैज्ञानिक उत्साहित है क्योंकि वह अब हिग्स क्षेत्र समझ पायेंगे जिससे हिग्स कण उत्पन्न होता है। आधुनिक भौतिकी विशेषतः क्वांटम भौतिकी के अनुसार सभी कण एक बल या दूसरे बल से उत्पन्न तरंग मात्र है। जैसे विद्युतचुंबकीय क्षेत्र से उत्पन्न तरंग फोटान है, इलेक्ट्राब क्षेत्र से उत्पन्न तरंग इलेक्ट्रान है और अन्य कण भी। इसी कारण से सभी इलेक्ट्रानो का समान द्रव्यमान तथा समान आवेश होता है क्योंकि वे सभी ब्रह्माण्ड मे फैले हुये एक विशेष बल क्षेत्र मे उत्पन्न भिन्न तरंग मात्र होते है। हिग्स बल क्षेत्र जोकि रिक्त अंतरिक्ष मे फैला हुआ है इसे काफी रोचक बनाता है, हिग्स बोसान को पाना इस तथ्य का द्योतक है कि इस बल क्षेत्र का आस्तित्व है। हिग्स बोसान को कुछ शब्दो मे समझाना मुश्किल जाता है क्योंकि इसे समझाने से पहले <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Quantum_field_theory"><strong>बलक्षेत्र सिद्धांत(Field Theory)</strong> </a>समझाना होता है!</li>
<li><strong>हिग्स यांत्रिकी ब्रह्माण्ड को रोचक बनाती</strong> है। यदि हिग्स क्षेत्र का आस्तित्व ना होतो सभी मूलभूत कण जैसे इलेक्ट्रान तथा क्वार्क का द्रव्यमान शून्य होगा। भौतिकी के नियम बताते है कि परमाणु का आकार उससे जुड़े इलेक्ट्रानो के द्रव्यमान पर निर्भर करता है। इलेक्ट्रानो का द्रव्यमान जितना कम होगा परमाणु उतना बड़ा होगा। इलेक्ट्रान के शून्य द्रव्यमान होने से परमाणु का आकार ब्रह्माण्ड के आकार के समान हो जायेगा, अर्थात परमाणु का आस्तित्व ही नही होगा। हिग्स क्षेत्र के ना होने से ना तो परमाणु होंगे, ना ही रसायनशास्त्र और ना ही हम!</li>
<li><strong>आपका अपना द्रव्यमान हिग्स से नही आता है।</strong> पिछले बिंदु मे हमने हिग्स क्षेत्र के संदर्भ मूलभूत कण शब्द प्रयोग किया है। आपके शरीर का अधिकतर द्रव्यमान प्रोटान और न्युट्रान से आता है और ये कण मूलभूत नही है। प्रोटान और न्युट्रान क्वार्को के समूह है जो ग्लुआन से बंधे है। इन कणो का अधिकतर द्रव्यमान क्वार्क और ग्लुआन के मध्य की आपसी प्रतिक्रिया से उत्पन्न होता है और यह द्रव्यमान हिग्स बोसान के ना रहने पर भी लगभग उतना ही रहेगा। हिग्स बोसान के ना रहने पर भी द्रव्यमान रखने वाले प्रोटान और न्युट्रान रहेंगे लेकिन उनके गुण बदल जायेंगे।</li>
<li><strong>प्रति-गुरुतवाकर्षण चालीत उड़न मशीन नही बनने जा रही है। </strong>कभी कभी लोग यह सोचते है कि हिग्स बोसान द्रव्यमान से संबधित है इसलिये वह गुरुत्वाकर्षण से संबधित है और यदि हम हिग्स बोसान को नियंत्रित कर सके तो हम गुरुत्वाकर्षण को चालू /बंद कर सकेंगे। लेकिन दुःर्भाग्य से यह सत्य नही है। इसके पहले के बिंदु मे हमने देखा है कि आपका अधिकतर द्रव्यमान हिग्स क्षेत्र से नही आता है। यदि हम इस तथ्य को उपेक्षित भी कर दें तब भी हिग्स क्षेत्र के निंयंत्रण की कोई संभावना नही है। इसे इस तरह से समझें कि अंतराल मे हिग्स क्षेत्र मे परिवर्तन के लिये ऊर्जा की आवश्यकता होगी और ऊर्जा का दूसरा रूप द्रव्यमान है(E=mc<sup>2</sup>)। यदि आप किसी गोल्फ गेंद  तुल्य क्षेत्र के हिग्स बल को बंद कर दें उसके परिणाम स्वरूप पृथ्वी-द्रव्यमान के तुल्य द्रव्यमान उत्पन्न होगा। गोल्फ गेंद के आयतन मे पृथ्वीतुल्य द्रव्यमान होने से एक ब्लैक होल उत्पन्न हो जायेगा। यह योजना प्रायोगिक रूप से संभव नही है। हम हिग्स बोसान की खोज इसलिये नही कर रहे हैं कि उसका हम तकनीकी रूप से कैसे प्रयोग करेंगे। इस कण की खोज हम इसलिये कर रहे है कि हम जानना चाहते हैं कि ब्रह्माण्ड कैसे कार्य करता है।</li>
<li><strong>सरल कार्य समाप्त हो गया है।</strong> हिग्स बोसान की खोज ने स्टैंडर्ड माडेल को पूर्ण कर दिया है। दैनिक जीवन के पीछे के सभी भौतिकी नियम समझ लिये गये हैं। पीछले 2000-3000 वर्षो की जिज्ञासा समाप्त हो गयी है। लेकिन श्याम पदार्थ, श्याम ऊर्जा, ब्रह्माण्ड के जन्म की प्रसव वेदना जैसी चुनौतियाँ अभी बाकी है। हिग्स बोसान की खोज से इन समस्याओं के हल के लिये एक सूराग मिलेगा, <strong>ज्ञान यात्रा अभी समाप्त नही हुयी है, यह एक पड़ाव मात्र है।</strong></li>
</ol>
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