प्रश्न आपके, उत्तर हमारे

प्रश्न आपके, उत्तर हमारेइस चिट्ठे पर पाठक कभी कभी अपनी टिप्पणियों मे लेख सामग्री से भिन्न लेकिन उचित प्रश्न करते रहे हैं। यह मंच पाठकों को प्रश्न पूछने का अवसर प्रदान करता है।

हमारा प्रयत्न रहेगा कि इस मंच के द्वारा पाठकों की जिज्ञासा का समाधान यथासंभव किया जा सके। हम जानते है कि कुछ प्रश्नो के उत्तर हम शायद नही दे पायें लेकिन हम उत्तर देने का भरसक प्रयास अवश्य करेंगे।

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293s टिप्पणियाँ to “प्रश्न आपके, उत्तर हमारे”

  1. गुरूदेव, एक साधारण सा प्रश्न!

    प्रश्न : पृथ्वी सूर्य का चक्कर क्यूँ लगाती है?
    उत्तर : गुरुत्वाकर्षण के कारण!

    परन्तु,
    जैसे पृथ्वी पर कोई वस्तु अगर हम छोड़ते हैं, तो ग्रुत्वकर्षण के कारण वो पृथ्वी की ओर आकर्षित हो जाती है, वह पृथ्वी का चक्कर तो नहीं लगाने लगती! फिर आकाशीय पिंड क्यूँ चक्कर लगाने लगते हैं? वो एक-दुसरे में क्यूँ नहीं मिल जाते? पृथ्वी क्यूँ सूर्य में विलीन नहीं हो जाती?

    अगर उत्तर है, कि ग्रुत्वकर्षण का प्रभाव यहाँ की अपेक्षा बहुत कम हो जाता है, इसलिए वो चक्कर लगाने लगती है, तो हम उत्तर से संतुष्ट नहीं हैं! अब आप इसका उचित कारण बताइए!

    • पृथ्वी से कृत्रिम उपग्रह छोड़े जाते है, वह पृथ्वी का चक्कर लगाते है। यह भी गुरुत्वाकर्षण से होता है। जब हम पृथ्वी से कोई भी पिंड छोड़ते है, वह पृथ्वी की ओर वापिस आयेगा या परिक्रमा करेगा, या पृथ्वी को छोड़कर अंतरिक्ष मे जायेगा, वह उसकी गति पर निर्भर करता है। इस विशेष गति को पलायन वेग(Escape Velocity) कहते है, पृथ्वी के लिये यह 11.2 km/s है। इससे कम होने पर पिंड वापिस आयेगा, ज्यादा होने पर अंतरिक्ष मे चला जायेगा, समान होने पर परिक्रमा करेगा। यह सरल शब्दो मे है, वास्तविक प्रक्रिया थोड़ी और जटिल है। उसमे पिंड के गति की दिशा और कोण की भी गणना होती है।

      पृथ्वी और अन्य ग्रहों की कक्षा समय के साथ कम हो रही है, एक समय ऐसा भी आयेगा जब पृथ्वी सूर्य मे समा जायेगी। लेकिन यह और बात है कि सूर्य उसके पहले ही लाल दानव बन कर इतना बड़ा हो जायेगा कि पृथ्वी को निगल लेगा।
      ज्यादा जानकारी के लिये वीकी पर देखो : http://en.wikipedia.org/wiki/Escape_velocity

    • bhai dekho, surya ka gurutva karshan aur pruthvi ka grutvakarshan jis jagah par pruthvi ghumti hai waha balanced ho jata hai…is liye pruthvi vaha se ghumna shuru kar deti hai….aur jab pruthvi pe koi vastu chodi jati hai pruthvi ka grutvakarshan us vastu ke grutvakarshan se bahut jyada hota hai is liye balance hone se pehle hi wo gir jati hai!!!!!!!!!!

  2. सामान मात्रा में पदार्थ और प्रति-पदार्थ मिलकर शून्य हो जाने चाहिए! [ (+u) + (-u) = 0 ]
    पर वो ऊर्जा का निर्माण करते हैं! क्यूँ?

    अगर वो ऊर्जा का निर्माण करते हैं, तब तो प्रश्न ये उठता है, कि आखिर ये ऊर्जा आई कहाँ से? बिग-बैंग के समय सामान मात्रा में कण और प्रति-कण बनने चाहिए थे! तभी सब मिलकर शून्य हो जाते! जिससे ये सिद्ध होता, कि बिग-बैंग के पहले कुछ था ही नहीं. अगर ये शून्य नहीं होते, तब तो प्रश्न वहीँ का वहीँ है, क्या बिग-बैंग की स्थिति उत्पन्न करने के लिए किसी ईश्वर की आवश्यकता है?

    अगर प्रति-ब्रह्माण्ड संभव है, तो ब्रह्माण्ड और प्रति-ब्रह्माण्ड अगर भविष्य में कभी मिलते हैं तो वे शून्य नहीं होंगे, और ऊर्जा उत्पन्न करेंगे. आखिर ये ऊर्जा आएगी कहाँ से?

    • पदार्थ और प्रति पदार्थ , राशि (संख्या) नहीं है, उसका भौतिक अस्तित्व है। दोनो ही ऊर्जा से निर्मित है केवल विद्युत आवेश विपरीत है। धन और ऋण विद्युत मिलकर शून्य नहीं होते, उनसे ऊर्जा बनती है, हर विद्युत उपकरण इसी सिद्धांत पर कार्य करता है।
      बिग बैंग के समय समान मात्रा में पदार्थ और प्रति पदार्थ नहीं बने थे, पदार्थ कणो की मात्रा अधिक थी, इसे सम्मितिय उल्लंघन कहते है। अब्दुस सलाम को इसी खोज पर नोबेल मिला था।
      ऊर्जा कहाँ से आई,वर्तमान में अज्ञात है लेकिन उसके लिये किसी ईश्वर की आवश्यकता नहीं है। प्रश्न यह भी हो सकता है कि ईश्वर कहाँ से आया ? जिस तरह ईश्वर का निर्माता नहीं है, ऊर्जा का श्रोत अज्ञात है।

    • Einstie kahaty hai ki big bang kai E=mc2 ,matlabi ki see padart se utpan honai vali urjaa uskai dvavman kai karn hoti ?

  3. क्या प्रति-ऊर्जा भी होती है? अगर हाँ, तो उसकी प्रायोगिक पुष्टी हो चुकी है या नहीँ?

    कहीँ ऐसा तो नहीँ कि पदार्थ और प्रति-पदार्थ मिलकर ऊर्जा और प्रति-ऊर्जा का निर्माण करते होँ, जिससे ये मिलकर शून्य हो सकेँ ?

    • प्रति ऊर्जा का अस्तित्व अभी तक प्रमाणित नहीं है लेकिन ऋणात्मक ऊर्जा की प्रायोगिक पुष्टि हो चुकी है। दोहरा रहा हुं कि केवल ऋण तथा धन संख्या का योग शून्य होता है, भौतिक वस्तुओं का नहीं ।

  4. प्रति पदार्थ और ऋणात्मक पदार्थ मेँ क्या अन्तर है?

  5. बिग बैँग की स्थिति उत्पन्न होनेँ के क्या कारण रहे होँगे? मतलब पहले कुछ नहीँ था फिर अचानक ऐसा क्या हुआ, जिससे विस्फोट हो गया?

    • यह एक अनसुलझा प्रश्न है जिसका उत्तर भविष्य के पास है। यह कहना कि बिग बैंग के पहले कुछ नहीं था भी सही नहीं है, संभव है कि यह एक चक्र हो जिसमें एक बिग बैग के बाद बिग क्रंच (महासंकुचन) होता हो, उसके बाद यही चक्र!

  6. ब्रह्माण्ड की बाहरी परत कैसी है? किसकी बनी है? जैसे गुब्बारे की तो रबर की होती है।

    • 1. ब्रह्माण्ड गुब्बारा नही है, उसे समझाने के लिये दिया जाने वाला एक उदाहरण मात्र है!
      2. ब्रह्माण्ड बाह्य परत को समझने के लिये, पृथ्वी का उदाहरण लेते है। इसकी की बाह्य परत किसे मानोगे ? ठोस धरती को या उसके वायुमंडल की सबसे बाह्य परत को ? या वह भाग जहां पर वायुमंडल खत्म होकर अंतरिक्ष प्रारंभ होता है ?
      हमारे सौर मंडल की सीमा को हीलीयोस्फीयर कहते है, यह एक बुलबुले के जैसा है, इस बुलबुले की बाहरी सीमा तक सौर वायु (सूर्य से उत्सर्जित आवेशित कण) पहुंचती है, इस सीमा के बाहर वह नही पहुंच पाती है। ध्यान रहे सौर वायु और प्रकाश अलग है। लेकिन सौर मंडल के इस बुलबुले की बाह्य परत जैसा कुछ नही है, बस एक सीमा है उसके बाहर सौर वायु का प्रभाव नही है।
      ऐसा ही ब्रह्माण्ड के साथ है, ब्रह्माण्ड की बाहरी परत जैसा कुछ नही है, बिग बैंग की कास्मिक(ब्रह्माण्डीय) किरणे जहां तक पहुंची है वहां तक ब्रह्मांड है, लेकिन कोई भौतिक परत नही है।

    • अनमोल जी , ब्रह्माण्ड की कोई सीमा नहीं होती ये अनंत है , क्योंकि सोचिये की पृथ्वी से एक्स दुरी पर किसी बिंदु को हम ब्रह्माण्ड की सीमा माने तो उससे १ मीटर आगे क्या होगा ? .यही अनंत का एहसास है . यहाँ सिर्फ दो संभावनाए हे की या तो एक ही ब्रह्माण्ड है जो की असीम है या की सिमित माने जाने वाले असंख्य ब्रह्माण्ड है . इसका जिक्र “a brief history of time ” में भी उपलब्ध है |as per me knows|

  7. हम कैसे जान लेते हैँ कि कोई तारा या मँदाकिनी यहाँ से अमुक प्रकाश वर्ष दूर है? दूसरे शब्दोँ मेँ, हम किसी आकाशीय पिँड की दूरी कैसे ज्ञात करते हैँ?

  8. फोटॉन हर समय गति क्योँ करता रहता है?

    प्रत्येक फोटॉन एक निश्चित वेग से ही गति क्योँ करता है, जबकि एक फोटॉन दूसरे फोटॉन से कई गुना अधिक ऊर्जा का भी हो सकता है ?

    प्रकाश का वेग स्थिर क्योँ है?

    अगर किसी फोटॉन को खाली अन्तरिक्ष मेँ छोड़ दिया जाये और वह भविष्य मेँ किसी दूसरे पिँड से न टकराये न ही किसी बल या ऊर्जा का उसपर प्रभाव पड़े तो क्या वह फोटॉन अनन्तकाल तक गति करता रहेगा?

    • प्रश्न: फोटॉन हर समय गति क्योँ करता रहता है?
      उत्तर : सभी मूलभूत कण(क्वार्क, इलेक्ट्रान, प्रोटान) गतिमान रहते हैं। प्रकृति मे स्थिरता का अभाव है।
      प्रश्न: प्रत्येक फोटॉन एक निश्चित वेग से ही गति क्योँ करता है, जबकि एक फोटॉन दूसरे फोटॉन से कई गुना अधिक ऊर्जा का भी हो सकता है ?
      उत्तर : अनमोल, वापिस उसी बिंदु पर आ गये! E=mc2 इसमे c स्थिर है, E बढ़ेगी तो m भी बढ़ेगा। ज्यादा ऊर्जा वाले कण का संवेग ज्यादा होगा। वैसे फोटान की गति पर नियंत्रण संभव है, उसे धीमा किया जा सकता है।
      प्रश्न: प्रकाश का वेग स्थिर क्योँ है?
      उत्तर : इस पर “समय श्रृंखला” मे एक लेख आयेगा।
      प्रश्न : अगर किसी फोटॉन को खाली अन्तरिक्ष मेँ छोड़ दिया जाये और वह भविष्य मेँ किसी दूसरे पिँड से न टकराये न ही किसी बल या ऊर्जा का उसपर प्रभाव पड़े तो क्या वह फोटॉन अनन्तकाल तक गति करता रहेगा?
      उत्तर : इस प्रश्न का उत्तर एक प्रति-प्रश्न से न्युटन का गति का पहला नियम क्या कहता है ?

      अनमोल, ज्ञान प्राप्त करने का अर्थ प्रश्नो के उत्तर पा लेना नही होता, कुछ प्रश्नो के उत्तर चिंतन मनन से पाये जाते है, इसीसे हमारा बुद्धि तेज होती है। इस बार तुमने जो प्रश्न पूछे है, इनमे से अधिकांश का उत्तर तुम स्वंय पा सकते थे। जैसे आखिरी वाला प्रश्न !

  9. हमारे अनुसार अन्तिम प्रश्न का उत्तर है कि फोटॉन अनन्त काल तक गतिमान रहेगा।
    न्यूटन का पहला नियम भी यही कहता है कि अगर किसी गतिमान पिँड पर बाह्य बलोँ का अभाव हो तो वह चिरकाल तक उसी वेग से गतिमान रहेगा।
    प्रश्न का मूलभाव ये था कि क्या गति करनेँ मेँ फोटॉन की ऊर्जा कम नहीँ होगी?

    पर हमारे प्रश्न मेँ फोटॉन था, जिसका द्रव्यमान शून्य होता है। न्यूटन को इस बात की जानकारी नहीँ थी।

    • अनमोल जी किसी भी तंत्र [systom] की उर्जा कम क्यों होती है ? जब वह उर्जा कीसी अन्य तंत्र अथवा बल के प्रभाव में आये .यदि ऐसा नहीं होता है तो किसी भी तंत्र की उर्जा हमेशा स्थिर रहती है. यदि पृथ्वी पर हमें घर्षण एवेम स्टेप उठाते समय गुरुत्वाकर्षण के विरुथ कार्य न करना पड़े तो हमरी उर्जा कभी ख़त्म नहीं होगी अनंतकाल तक चाहे कितना भी चले .

  10. चुम्बक से चुम्बकीय तरंगोँ के निकलनेँ का क्या कारण है? मतलब ऐसी क्या खास बात होती है चुम्बक मेँ जिससे वह केवल लोहे को ही आकर्षित करता है? और क्योँ?

    • चुम्बकीय क्षेत्र लोहे के अतिरिक्त और भी कई तत्वों को आकर्षित करता है. इसमें लोहा, लिथियम गैस, कोबाल्ट, निकेल प्रमुख है. चुम्कत्व इलेक्ट्रान की स्पिन से उत्पन्न होता है, इलेक्ट्रान स्वयं चुम्बक होता है, फेरोमेग्नेटिक तत्व जैसे लोहे में इलेक्ट्रान एक रेखा में आ कर बड़ा चुम्बक बना लेते है, बाकी तत्वों में यह नहीं हो पाता है.

    • मूल रूप से प्रकृति में चुम्बकत्व नाम की कोई चीज नहीं होती.
      जब भी कोई आवेश गतिमान होता है तब उसके आस पास चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है.
      प्रत्येक पदार्थ परमाणुओं से बना होता है जिसमे स्थिर प्रोटोन और गतिमान इलेक्ट्रान होते हैं, इलेक्ट्रान की घूर्णन गति के कारण उस पदार्थ में चुम्बकीय गुण उत्प्पन हो जाता है.

      लोहे का साधारण टुकडा चुम्बक की तरह व्यवहार नहीं करता क्युकिन उसमे वामावर्त घूर्णन वाले और दक्षिणावर्त घूर्णन वाले इलेक्ट्रान याद्रछित रूप से विन्यासित होते हैं.
      इस वजह से उनके द्वारा उत्पान चुम्बकीय क्षेत्र एक दुसरे के प्रभाव को निरस्त कर देता है
      इसके विपरीत एक छड चुम्बक में वामावर्त घूर्णन वाले और दक्षिणावर्त घूर्णन वाले इलेक्ट्रॉन्स अलग अलग कर दिए होते हैं

  11. अब सापेक्षता के सिद्धांत से सम्बंधित प्रश्न !
    वेगों के योग के नियम में क्या कमियां हैं? अगर हम 2,40,000 km/s के वेग से गतिमान रेलगाड़ी के अंदर 70,000 km/s के वेग से रेलगाड़ी की दिशा में ही आगे बढ़ें, तो क्या भूमि के धरातल के सापेक्ष हमारा वेग प्रकाश के वेग से अधिक नहीं हो जायेगा?

  12. लेख से अपने प्रश्न का उत्तर तो ज्यादा कुछ समझ में नहीं आया,
    पर सूत्रों के प्रयोग से ज्ञात हुआ,
    2,40,000 + 70,000 * 3/5
    = 2,40,000 + 42,000
    = 2,82,000 km/s

  13. लेख से अपने प्रश्न का उत्तर तो ज्यादा कुछ समझ में नहीं आया,
    पर सूत्रों के प्रयोग से ज्ञात हुआ,
    2,40,000 + 70,000 * 3/5
    = 2,40,000 + 42,000
    = 2,82,000 km/s

    अब आप स्पष्ट कर ही दीजिए…

  14. गुरूजी, सापेक्षता के सिद्धांत के अनुसार ग्रुत्वकर्षण बल एक अवबोधन मात्र है, वास्तव में इसका कोई अस्तित्व नहीं होता! फिर एकीकृत सिद्धांत में ग्रुत्वकर्षण को शामिल किया जाना क्यूँ आवश्यक है?

  15. कल्पना कीजिये एक रेलगाड़ी की जो धरातल के सापेक्ष प्रकाश के वेग के नजदीक के वेग से दौड रही है! रेलगाड़ी के अंदर बैठे द्रष्टा के लिए रेलगाड़ी से बाहर की वस्तुवें संकुचित दिखाई देंगी! और रेलगाड़ी से बाहर बैठे द्रष्टा को रेलगाड़ी के अंदर की वस्तुवें संकुचित दिखाई देंगी! दोनों लोग यह संकुचन इसलिए देखेंगे, क्यूंकि दोनों एक दूसरे के सापेक्ष गति कर रहे हैं! बाहर वाले के लिए वो स्थिर है और रेलगाड़ी चल रही है जबकि अंदर वाले के लिए ट्रेन स्थिर है और बाहर की दुनिया चल रही है! आपने यात्रा करते हुवे लोगों को कहते हुवे सुना भी होगा, आगरा आ गया! वो ये नहीं कहते कि हम आगरा आ गए! :) ! ये तो हुआ Length Contraction! अब आते हैं Time Dilation पर !

    माना हम ट्रेन पर बैठे सुबह के दस बजे, और बैठते समय अपनी हाथ की घड़ी, स्टेशन की घड़ी से मिला ली! अब हमारी रेलगाड़ी 2,40,000 किमी./सेकंड के भीषण वेग से दौड रही है! फिर कुछ दूरी तय करने के बाद एक स्टेशन आया! हमारी रेलगाड़ी रुक गयी! स्टेशन पर देखा की ग्यारह बज गए थे, और अपनी हाथ घड़ी देखा तो उसमें दस बजकर 36 मिनट ही हुए थे. यहाँ तक ठीक है?

    अब आते हैं हमारे प्रश्न पर! ये बताइए कि हमारी रेलगाड़ी, धरातल के सापेक्ष दौड़ रही थी, जिसके कारण उसमें धरातल के सापेक्ष ही समय अंतराल में संकुचन हुआ, और समय भी धीमी गति से आगे बढ़ा.
    और अगर हम मानें कि हमारी रेलगाड़ी स्थिर थी और धरातल ही दौड़ रहा था (क्योंकि समस्त गतियाँ सापेक्ष हैं), इस स्थिति में रेलगाड़ी के सापेक्ष धरातल के अंतराल में संकुचन तो होता है, पर धरातल के समय में संकुचन क्यूँ नहीं होता?

    • ANMOL EINSTEIN JI , MAIN AAP KO BATANA CHAHUNGA KI AAP KA DUSRA PARAGRAPH POORI TARAH SE GALAT HAI. AAP PARISTHITIYON KO ACHCHHE SE SAMJHE AAP KO AWASHYA HI APNI GALTI MALUM HO JAAEGI.

      • क्या आप इस पैराग्राफ की बात कर रहे हैं?
        “माना हम ट्रेन पर बैठे सुबह के दस बजे, और बैठते समय अपनी हाथ की घड़ी, स्टेशन की घड़ी से मिला ली! अब हमारी रेलगाड़ी 2,40,000 किमी./सेकंड के भीषण वेग से दौड रही है! फिर कुछ दूरी तय करने के बाद एक स्टेशन आया! हमारी रेलगाड़ी रुक गयी! स्टेशन पर देखा की ग्यारह बज गए थे, और अपनी हाथ घड़ी देखा तो उसमें दस बजकर 36 मिनट ही हुए थे. यहाँ तक ठीक है?”

        इसमें कौन सी गलती है (?) जी? सापेक्षता के सिद्धांत के अनुसार तो यह सही है!

      • जी हाँ, मैं इन्ही पंक्तियों की बात कर रहा था। मुझे लगता है आपने मेरा “REPLY COMMENT” नहीं पड़ा। जिसमें सापेक्षता और विशेष सापेक्षता के सिद्धांत के प्रतीत होने में फर्क को बतलाया गया है।

  16. बहुत अच्छा है यहाँ तो हम भी पूछेंगे कभी कभी और कभी कभी यहाँ से ही ले लेंगे प्रश्न
    आभार

  17. 1….ek sidha shada sabal ….kya parallal world ka astitv hia,,,,,
    kya three dimension ke allaba bhi koi or dimension hai …

    agar ye sab hai to koyo stephen howking god ke astitv ko nakarte hai ….
    shayad vo kisi parallal univers main ho ….
    2…kya prakas se adhik kisi ki speed nahi hai …..

    ha esa koyo mante hai jabki …ham jante hai ki gelaxy ek dusre se prakash ki ghati se adhik ghati se dur ja rahi hai ……..

    • दीपक,
      १. समान्तर ब्रह्माण्ड एक अवधारणा है, इसका आस्तित्व संभव है, लेकिन प्रमाणित नहीं. इसका अर्थ है कि यह सैद्धांतिक रूप से हो सकता है लेकिन प्रायोगिक रूप से देखा नहीं गया है.
      भगवान को मानना नहीं मानना व्यक्तिगत अवधारणा है, स्टीफन हाकिंग और अधिकतर वैज्ञानिक भगवान को नहीं मानते. पीटर हिग्स भी नहीं मानते, इसमे कोई आश्चर्य नहीं है. वह उनकी अपनी मान्यता है. मै भी भगवान के आस्तित्व पर विश्वास नहीं करता.
      २. प्रकाश गति से तेज यात्रा संभव नहीं है. वह आइन्स्तैन के सापेखातावाद के सिद्धांत का उल्लंघन है. आकाशगंगाए एक दूसरे से प्रकाशगति से तेज गति से दूर जा रही है, यह सत्य है लेकिन इसमे आकाशगंगाए गति नहीं कर रही है, उनके मध्य का अंतरिक्ष (स्पेस-टाइम) का विस्तार हो रहा है. इसमे पिंड की गति नहीं है, उनके मध्य अंतराल का विस्तार है.

      • एक मूल सार है गीताजी का जिसे में बहुत ही गहरा और व्यापक मानता हूँ ,” मयाध्यक्षेण प्रकृतिम सूयते स चराचरम ” , अर्थात मेरी अध्यक्षता में प्रकृति समस्त चर [life ] अचर [universe including everything ] को जन्म देती है . मतलब प्रकृति को सृष्टी का सृजन & सञ्चालन करने का कार्यभार सौपते हुए इश्वर अध्यक्ष अर्थात बिना व्यवधान के प्रकृति को अपना काम करने देते है , इसीलिए हम प्रकृति को ही कुछ रहस्यों को जानने के बाद उसे ही सब कुछ समझ लेते है . इस तथ्य पर कुछ विचार कीजिये और फिर देखिये की इश्वर के अस्तित्व से सम्बंधित आपकी सोच पर क्या प्रभाव पड़ता है .

  18. स्ट्रिँग थ्योरी के 24 डाइमेँसन के नाम क्या हैँ और M थ्योरी के 10+1 डाइमेँशन के नाम क्या हैँ?

  19. गुरुजी, वास्तव मेँ तापमान क्या है? निर्वात मेँ तापमान क्या होगा? निर्वात मेँ तापमान कम ज्यादा कैसे होता है? परम शून्य से नीचे का तापमान भी होता है क्या? और किसी चीज को परम शून्य तक कैसे ठण्डा किया जा सकता है?

    • तापमान किसी भी पदार्थ कि उष्मता ऊर्जा का माप है. हर पदार्थ अपने आपको परम शून्य तापमान तक जाने का प्रयास करता है, इस प्रक्रिया में वह उष्मा का उत्सर्जन करता है, वही उस पदार्थ का तापमान होता है.
      निर्वात में पदार्थ नहीं होता, तापमान होने का प्रश्न नहीं उठता.
      परम शून्य पर सभी पदार्थ कण गति करना बंद कर देते है, तो उससे निचे तापमान संभव नहीं है. परम शून्य तक ठंडा करना भी संभव नहीं है, उसके आस पास तक ठंडा करने द्रव नाईट्रोजन का प्रयोग होता है.

  20. आशीष जी ,नमस्कार ,कृपया यह बताये की आसमान में बिजली का निर्माण कैसे होता है ?
    और इस बिजली से पृथ्वी क़े अलावा बाहर अन्तरिक्ष की ओर भी नुक्सान की सम्भावना होती है , तथा अगर वोल्ट में नापे तो कितना वोल्ट तक का करंट इसमें हो सकता है ?

    • आकाशीय बिजली प्राय: कपासीवर्षी (cumulonimbus) मेघों में उत्पन्न होती है। इन मेघों में अत्यंत प्रबल ऊर्ध्वगामी(ऊपर कि दिशा में ) पवनधाराएँ चलती हैं, जो लगभग ४०,००० फुट की ऊँचाई तक पहुँचती हैं। इनमें कुछ ऐसी क्रियाएँ होती हैं जिनके कारण इनमें विद्युत्‌ आवेशों की उत्पत्ति तथा वियोजन होता रहता है। इस प्रक्रिया को आयोनाइजेशन कहते है।
      बादलों में इनके ऊपरी स्तर धनावेषित तथा मध्य और निम्नस्तर ऋणावेषित होतें हैं। बादलों के निम्न स्तरों पर ऋणावेश उत्पन्न हो जाने के कारण नीचे पृथ्वी के तल पर प्रेरण(induction) द्वारा धनावेश उत्पन्न हो जाते हैं। बादलों के आगे बढ़ने के साथ ही पृथ्वी पर के ये धनावेश भी ठीक उसी प्रकार आगे बढ़ते जाते हैं। ऋणावेशों के द्वारा आकर्षित होकर भूतल के धनावेश पृथ्वी पर खड़ी सुचालक या अर्धचालक वस्तुओं पर ऊपर तक चढ़ जाते हैं। इस विधि से जब मेघों का विद्युतीकरण इस सीमा तक पहुँच जाता है कि पड़ोसी आवेशकेंद्रों के बीच विभव प्रवणता (वोल्टेज )विभंग मान(potential gradient – इस सीमा पर वायु सुचालक हो जाती है) तक पहुँच जाती है, तब विद्युत्‌ का विसर्जन एक चमक के साथ गर्जन के के रूप में होता है। इसे तड़ित/बिजली कहते हैं।
      इसका प्रभाव पृथ्वी के वायुमंडल तक ही रहता है, अंतरिक्ष में कोई प्रभाव नहीं होता क्योंकि वहां इसके बहाव के लिए कोई चालाक नहीं होता है.यह लगभग एक टेरा वाट तक हो सकती है। इसका करंट ३०,००० एम्पीयर तक हो सकता है. ध्यान रहे विद्युत् ऊर्जा को वोल्टेज में नहीं वाट या अम्पीयर में नापा जाता है,

  21. आशीष, एक अटपटा विचार मन में आया तो उसे साझा कर रहा हूँ. किसी प्रकाश स्रोत (जैसे सूर्य) से तीन लाख किलोमीटर प्रति सैकंड की गति से किरणें-कण-तरंगें-फोटॉन निकल रहे हैं. उसके सामने एक लोहे का बक्सा खुला रखा है. यदि उस बक्से का ढक्कन बंद कर दिया जाये तो क्या यह कहा जा सकता है कि ढक्कन बंद करते समय उस अंतराल से गुज़र रहे किरणें-कण-तरंगें-फोटॉन (अर्थात प्रकाश) उस बक्से में बंद रह गए होंगे?

    इसी से मिलता-जुलता प्रश्न: क्या कारण है कि सर्वोच्च संभव गति से चल रहे अति सूक्ष्म फोटॉन धातु की पतली सी शीट को भेद नहीं पाते, यहाँ तक कि लकड़ी के पतले बोर्ड को भी नहीं भेद पाते.

    और यह भी: क्या फोटॉन भारहीन होते हैं? फोटॉन के पैकेट्स से हमारा क्या अभिप्राय है? यदि वे कण हैं तो निश्चित ही उनका भार अवश्य होगा, भले ही कितना ही नगण्य हो. ऐसे में किसी प्रकाश उत्सर्जित करनेवाली वस्तु (जैसे बल्ब) के द्रव्यमान में लम्बी अवधि में कमी आनी चाहिए (भले ही वह कितनी ही नगण्य क्यों न हो)?

    • 1. सबसे पहले समस्त ब्रह्माण्ड मे सिर्फ दो ही चीजें है, पदार्थ और ऊर्जा।
      2. आईन्सटाइन ने प्रमाणित किया कि पदार्थ और ऊर्जा एक ही है और इनका एक से दूसरे रूप मे परिवर्तन संभव है।
      3. समस्त ब्रह्माण्ड दो तरह के कणो से बना है, फर्मीयान और बोसान। फर्मीयान कण पदार्थ बनाते है और बोसान कण ऊर्जा।
      4. अधिकतर बोसान कण का द्रव्यमान नही होता है,इसमे फोटान भी है। फोटान बोसान का एक प्रकार है जो विद्युत-चुंबक बल का वाहक कण है।.
      5. विद्युत बल्ब मे विद्युत ऊर्जा इलेक्ट्रान द्वारा अवशोषित होती है, और ये आवेशित इलेक्ट्रान अधिक ऊर्जा होने से गतिमान हो जाते है। विद्युत बल्ब का फिलामेंट की धातु इस तरह की होती है कि इलेक्ट्रान आपस मे टकराकर ऊर्जा उत्सर्जित करते है, यह ऊर्जा उष्णता/प्रकाश फोटान के रूप मे बाहर आती है। जो ऊर्जा आपने विद्युत रूप मे दी थी, वही उष्णता/प्रकाश रूप मे बाहर आयी। द्रव्यमान का क्षय नही हो रहा है। ध्यान रहे कि ऊर्जा के अविनाशिता के नियम के अनुसार ऊर्जा का निर्माण और विनाश असंभव है, केवल एक रूप से दूसरे रूप मे परिवर्तन संभव है।
      6. किसी बक्से मे आप फोटानो को बंद नही कर सकते है, वे उस बक्से के पदार्थ द्वारा अवशोषित कर लिये जायेंगे। बक्सा आंशिक मात्रा मे उष्ण या आवेशित हो जायेगा।
      7. फोटान कुछ और नही, बस ऊर्जा का संघनित रूप(packet) है।फोटान अपनी आवृत्ति के आधार पर दॄश्य प्रकाश/एक्स रे/उष्मा/गामा किरण जैसे एकाधिक रूप मे रह सकते है। जब हम पैकेट कहते है इसका अर्थ होता है कि प्रकाश किरण सतत नही होती है, विद्युत चुंबकिय ऊर्जा छोटे छोटे टुकड़ो मे अर्थात पैकेट अर्थात फोटान के रूप मे प्रवाहित होती है।
      8. फोटान किस पदार्थ को भेद सकते है यह उसकी आवृत्ती/तरंग दैध्र्य पर निर्भर है। गामा किरण लगभग हर वस्तु को भेद सकती है। दृश्य प्रकास कुछ ही वस्तुओ को भेद सकती है। एक्स रे कुछ ज्यादा पदार्थो को भेद सकती है। यह सभी विद्युत-चुंबकिय विकिरण अर्थात फोटान ही है। बस आवृत्ति भिन्न है। लेजर भी फोटान ही है।
      9. फोटान की आवृत्ति कुछ भी हो अर्थात प्रकाश/एक्स रे/गामा किरण/रेडीयो तरंग सभी की गति एक जैसे रहती है।
      इस चित्र को भी देखे

      • धन्यवाद, आशीष.
        ऐसे ही पढ़ते रहने से चीज़ें बेहतर समझ में आने लगेंगीं.
        कणों के अवशोषण से आपका क्या तात्पर्य है? क्या यह कणों का ह्रास होना है? अवोशोषित हो चुके कणों का क्या होता है?

      • केवल बलवाहक कण ही अवशोषित किये जा सकते है, क्योंकि ये उर्जा के पैकेट मात्र होते है। ये बलवाहककण पदार्थ-कणो मे समा जाते है, अर्थात अवशोषित हो जाते है, फलस्वरूप पदार्थ कण की ऊर्जा बढ़ जाती है, पदार्थ कण या तो ज्यादा गतिमान हो जाते है, या उष्ण हो जाते है। पदार्थ कण द्वारा बल-वाहक-कण(बोसान) के अवशोषण द्वारा पदार्थ-कण(फर्मीयान) की प्रतिक्रिया बहुत से कारक पर निर्भर है, जैसे उसका प्रकार (धातु/अधातु), रंग इत्यादि।
        पदार्थ कण विशेष स्थितियो मे अपनी ऊर्जा का उत्सर्जन बोसान कणो के रूप मे करते है।

        कणो का ह्रास केवल पदार्थ कणो के ह्रास मे संभव है, यह रेडीयो सक्रिय पदार्थो मे होता है , जहां पर पदार्थ कण का कुछ भाग क्षय होकर ऊर्जा अर्थात बलवाहक कण और न्युट्रीनो मे परिवर्तित हो जाता है।

      • आशीष,
        मैं इसी प्रश्न पर पुनः विचार कर रहा हूँ . यदि बक्से की भीतरी सतह पूर्ण रूप से परावर्तनशील (लगभग पूर्ण) है. तब क्या कुछ क्षण के लिए फोटोन बक्से में बंद होंगे?

  22. आशीष जी नमस्कार ,
    कई बार पहाड़ों पर हम बादलों क़े अन्दर गए /कई बार एयर बस भी बादलों क़े अन्दर से निकलती है, मेरा प्रश्न बादल तो एक कोहरे जैसा लगता है फिर बादल फटना ओर इतनी तबाही होना कैसे ओर क्या विज्ञान की मदद से पूर्व अनुमान नहीं लगाया जा सकता ?

  23. क्या आप बता सकते हैँ कि हाइजेनबर्ग नेँ अनिश्चितता का सिध्दान्त कैसे दिया? किस आधार पर दिया? उन्होँने इसके लिए क्या प्रयोग किया?

  24. आयाम की परिभाषा क्या होगी?

    मेरा मत है कि वास्तविक संसार मेँ तीन आयामोँ से कम आयाम संभव ही नहीँ है। शून्य आयामी बिन्दु, एक आयामी रेखा और द्विआयामी समतल सिर्फ गणित मेँ ही हो सकते हैँ बाह्य जगत मेँ नहीँ।

    स्ट्रिँग सिध्दान्त की स्ट्रिँग को एक आयामी संरचना कैसे माना जा सकता है? अगर उसमेँ लम्बाई है तो उसकी और भी सूक्ष्म त्रिज्या भी होगी। एक आयाम का मतलब त्रिज्या शून्य। अब शून्य त्रिज्या का अर्थ क्या होगा? ऐसी कोई स्ट्रिँग हो ही नहीँ सकती।

    आप ऐसी किसी वास्तविक वस्तु का नाम नहीँ बता सकते जो तीन से एक भी आयाम कम पर संभव हो।

    क्या यह सही है?

    • अनमोल तुम्हारा प्रश्न स्ट्रिंग सिद्धांत को चुनौती दे रहा है. मानव मस्तिष्क केवल तीन आयामों (न कम न ज्यादा) समझ सकता है. वहीं मछली केवल दो ही आयाम देख सकती है, सोच सकती है.
      स्ट्रिंग को एक आयामी कहा जाता है, वही मूलभूत कण जैसे क्वार्क को शून्य आयामी (शून्य, चौड़ाई, लम्बाई और उंचाई ), यही शून्य गणना में अनंत लाता है.
      स्ट्रिंग सिद्धांत अभी प्रमाणित नहीं है, वह केवल गणितीय सिद्धांत है, प्रायोगिक धरातल पर उसका प्रमाणित होना अभी बाकी है.

  25. सर, मैं आप से जानना चाहता हूँ कि ब्रह्माण्ड के समूह वास्तविकता में हैं या सैद्धांतिक रूप में हैं…???
    और इनकी उपस्थिति को किस आधार पर एक दुसरे से पृथक माना जाता है।

    १. भिन्न- भिन्न ऊर्जा या शक्ति के आधार पर
    २. गैलेक्सी के समूह से निर्मित ब्रह्माण्ड में आपसी दूरी अधिक होने के कारण
    ३. ब्रह्माण्ड के निर्माण की क्रिया ही भिन्न-भिन्न होने के कारण
    ४. या फिर मनुष्य के समूह, पेड़-पोधों के समूह या अन्य प्रजाति के समूह के संयोजित रूप को ही ब्रह्माण्ड कहते हैं..।

    • क्या आप अपने प्रश्न को विस्तार दे सकते है? मै आपका प्रश्न नही समझ पाया!

      • सर, मैं जानना चाहता हूँ कि ब्रह्माण्ड के समूह(MULTIVERSE) की अवधारणा व्यावहारिक रूप में संभव है या फिर सिद्धान्तिक रूप में.. ।
        प्रश्न पूंछने का कारण : अभी तक मैं सुनते आया हूँ व्यापकता का दूसरा नाम ब्रह्माण्ड है। जिसके अंतर्गत सर्वस्व सम्मलित है। उसमे सम्मलित होने के लिए कुछ भी शेष नहीं रहता।

        आगे प्रश्न यह है कि ब्रह्माण्ड के समूह(MULTIVERSE) की अवधारणा के होने का कारण इनमे से क्या हैं..??
        १. ब्रह्माण्ड की भिन्न- भिन्न स्थिति में ऊर्जा या शक्ति का वितरण या उसके रूप के भिन्नता होना।
        २. गैलेक्सी के समूह से निर्मित ब्रह्माण्ड में गैलेक्सी के समूहों का अपना अपना समुच्चय होना।जिससे की समुच्चय में आपसी दूरी अधिक होगी।
        ३. ब्रह्माण्ड के निर्माण की क्रिया में भिन्नता होना।
        ४. या फिर मनुष्य के समूह, पेड़-पोधों के समूह या अन्य प्रजाति के समूह के संयोजित रूप को ही सयोंजित ब्रह्माण्ड कहते हैं..। जहाँ मनुष्य के समूह, पेड़-पोधों के समूह या अन्य प्रजाति की अपनी अलग-अलग दुनिया है।
        ५. और यदि कहीं ब्रह्माण्ड का निर्माण वर्तमान में जारी है। तो इससे निर्मित ब्रह्माण्ड में संख्यात्मक विकास होना। ब्रह्माण्ड के समूह होने का कारण है।

        या फिर ब्रह्माण्ड के समूह(MULTIVERSE) की अवधारणा का कुछ और ही कारण है।

      • वर्त्तमान ज्ञान के अनुसार समान्तर ब्रह्माण्ड (मल्टीवर्ष) अभी सैद्धांतिक रूप में ही है, वास्तविकता में हो सकता है या नहीं भी !

        आपके प्रश्न का उत्तर छोटा नहीं है, मुझे इस पर एक पूरा लेख लिखना होगा! अभी इतना कह सकता हूँ कि मल्टीवर्ष इन सभी से अलग है. मल्टीवर्ष में एकाधिक ब्रह्माण्ड होते है और हर ब्रह्माण्ड में एक वास्तु की अलग अलग कापी होने की संभावना होती है. अर्थात यदि दो ब्रह्माण्ड है तो आप और मै एक नहीं है, हम दोनों कि एक कापी दूसरे समान्तर ब्रह्माण्ड में भी है.
        मान लो कि आपने एक सिक्का उछाला तो एक ब्रहमांड में वह चित आयेगा, दूसरे में पट! अर्थात इस घटना के लिए दो परिणामो की संभावना है इसलिए दो समान्तर ब्रह्माण्ड होंगे. जितनी ज्यादा संभावनाए उतने समान्तर ब्रह्माण्ड. यह दिमाग को चकरा देना वाला अजीब सा सिद्धांत है लेकिन असंभव नहीं.

        यह संभव है कि किसी समान्तर ब्रह्माण्ड में महात्मा गांधी की ह्त्या नहीं हुयी हो, जबकि हमारे ब्रह्माण्ड में उनकी ह्त्या हुयी है. ये दो ब्रह्माण्ड इसलिए कि महात्मा गांधी की हत्या होने या ना होने की दो संभावनाए है.

      • जी धन्यवाद..
        मुझे अपने प्रश्न का उत्तर पहली पंक्ति से ही मिल गया है। “ब्रह्माण्ड के समूह” पर लेख का मैं इंतज़ार करूँगा। मुझमे इसको जानने की ललक है।

  26. yaha kaise pata chalta hai ki dur se dikhne bale star alag alag hai ya ek hi hai …..matlab ki gravitational lance se hame uski ek se adhik image dikhti hai …………

    • तारो से निकलने वाले प्रकाश से उनकी दूरी और संरचना, घटक तत्व और उनकी मात्रा पता चल जाती है। दो छवियो मे ये सभी एक जैसे ही होंगे, इन सभी कारको के अध्यन से गुरुत्व्यिय लेंस से बनने वाली एकाधिक छवियों को पहचाना जा सकता है।

  27. aap bade hai or apko life ka jyada anubhab hai .. main apse ek or bhat janna chaunga ….ki einstin ne essa kyo kaha tha ki indian muniyo ka dimag 5% work karta hai jabki unka 3% parsent …

  28. दीपक,
    मुझे नहीँ लगता कि आइंस्टीन नेँ ऐसा कभी कहा था। भारतीयोँ की एक विशेषता है कि वे विदेशियोँ से अपनेँ आप को अधिक महान सिध्द करनेँ के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहते हैँ। जब भी कोई नई खोज होती है उसके कुछ ही दिनोँ बाद पता चलता है कि यह खोज हमारे धर्म ग्रन्थोँ मेँ पहले ही हो चुकी थी।:)
    ऐसा सिध्द करनेँ के लिए अनेक भारतीय प्राचीन ग्रन्थोँ के श्लोकोँ के मनमानेँ अर्थ निकालते हैँ और आधुनिक वैज्ञानिक निष्कर्षोँ को उन ग्रन्थोँ मेँ पहले से होनेँ की बात कहते हैँ।
    अन्य अन्धविश्वासी भारतीय उनकी बातोँ को बिना किसी गहरे विश्लेषण के मान लेते हैँ और फिर सभी से अपनेँ धर्म ग्रन्थोँ के महान होनेँ की डीँगेँ मारा करते हैँ।

    पहले मैँ भी उनकी बातोँ के झाँसे मेँ आ गया था। (आशीष जी इसके गवाह हैँ:)) फिर कई लेखोँ, चर्चाओँ और अनुभवोँ के बाद पता चला कि ये भारतियोँ की आदत मेँ शुमार है। वे अपनेँ आप को महान सिध्द करनेँ के लिए कुछ भी लिख सकते हैँ। इसलिए मेरा सुझाव है कि बिना किसी गहरे विश्लेषण के इस प्रकार की किसी भारतीय बात पर विश्वास न किया करेँ।

    अब आइंस्टीन तो दुनिया मेँ रहे नहीँ। कुछ भी यह कहकर लिख दो कि आइंस्टीन नेँ ऐसा कहा था। अब कौन पूछनेँ जायेगा?

    हाँ यह बात अगर किसी विदेशी नेँ लिखी हो तो सच हो सकती है क्योँकि उसके पास गलत लिखनेँ का कारण नहीँ है। या फिर किसी विश्वसनीय श्रोत मेँ यह बात लिखी हो। क्या आप बता सकते हैँ कि आइन्स्टीन का यह कथन ऐसे किस श्रोत से है जिस पर विश्वास किया जा सके?

    • ANMOL SAHU JI, AAP KABHI BHI CHAR LOGON KO DEKH KAR YAH NAHI KAH SAKTE KI UNKE GROUP ME SABHI AISE HI HONGE. HAAN UNKE SWABHAV KO DEKH KAR GROUP KI PRAKRATI KO AWASHYA HI NIRDHARIT KIYA JAA SAKTA HAI.

      YAHI GALTI KI JAATI HAIN BHAUTIK SWAROOP, BHAUTIKTA OR BHAUTIKTA KE ROOP KO SAMJHNE ME. SHRI MAN YADI AISA HONE LAGTA TO ELECTRON KI SANKHYA MERE GURON(RASHIYON) KI MAAP KE BARABAR HOTI.

    • बिलकुल सही कहा आशीष,

      हमेशा कोई नयी वैज्ञानिक खोज के बाद में ही लोग अपने ग्रन्थ ले कर आ जाते हैं कि ये बात तो हमारे ग्रंथों में पहले से लिखी थी.

      अगर उनमें इतने ही वैज्ञानिक तथ्य लिखें हुए हैं तो उन्हें खोज होने से पहले क्यूँ नहीं सामने लाते

  29. आप पुनः ध्यान से पढ़िये। सापेक्षता के सिध्दान्त के अनुसार यह प्रश्न बिल्कुल सही है।
    अगर आपनेँ सापेक्षता का सिध्दान्त पढ़ा है तो उसमेँ आपनेँ जुड़वा विरोधाभास (Twin Paradox) के बारे मेँ पढ़ा होगा। अगर नहीँ भी पढ़ा तो विकीपीडिया से पढ़ सकते हैँ। यह एक ऐसा विरोधाभास है जो आजतक हल नहीँ हुआ है। इस पहेली के हल के रुप मेँ कई सिध्दान्त हैँ पर सभी वैज्ञानिकोँ का किसी एक सिध्दान्त पर एक मत नहीँ है।
    हमारा यह प्रश्न भी उसी विरोधाभास से सम्बन्धित है।

    • अच्छा तो आप ही साहू जी भी है और Einstein भी खैर…
      चलिए देखते हैं, जब मैं आप से दूर जाता हूँ। तब आप देखेंगे कि मेरा आकर जिस अनुपात में घटता हुआ प्रतीत होता है। उसी अनुपात में आपका आकर भी घटता हुआ प्रतीत होता है। इसे कहते हैं सापेक्षता का सिद्धांत..

      ठीक इसी तरह प्रकाश के वेग से गतिशील वस्तु या पिंड के आकर में कमी, द्रव्यमान अन्नत और समय अन्नत होता हुआ, प्रतीत होता है। इसे कहते हैं विशेष सापेक्षता का सिद्धांत..
      क्या है ना जब हम भी प्रकाश के वेग से गतिशील हो जाएँगे तब ऐसा भी प्रतीत नहीं होगा। ऐसा सापेक्षीय गति होने पर ही संभव होगा। यहाँ समझने योग्य बिंदु यही है, कि दोनों परिस्थितियों में तो आकार कम प्रतीत हो रहा है तब प्रकाश के वेग का क्या अभिप्राय..??

      प्रकाश के वेग से गतिशील पिंड में वास्तव में कमी, द्रव्यमान अन्नत और समय भी अन्नत होने लगता है। फिर प्रतीत होने वाली बात कैसे..?? वो ऐसे कि जब हम परिक्षण करने के लिए वहां पहुंचेंगे। तब आकार हमारे अनुपात में कम ही नहीं होगा। और जब हम अपनी अवस्था से ही परिक्षण करेंगे तब ही इस घटना को देखा जा सकता है।
      अरे यह कैसे…??? ये तो गलत है जिसको करना संभव नहीं है। तो हम उन परिक्षण के परिणाम को क्यों माने..??

      वो ऐसे कि जब पिंड प्रकाश के वेग से गतिशील होता है तब उसमे निर्पेक्षीय अनुपात में परिवर्तन होते हैं। और जब वस्तु या पिंड के सामान्य वेग के कारण वस्तु दूर जाती है। तब परिवर्तन होता नहीं है। सिर्फ सापेक्षीय प्रतीत होता है।
      इसे ऐसा मान लिया जाता है मानो उस पिंड की अपनी अलग ही दुनिया बन गई है।

      अब आप स्वयं के द्वारा बनाई गई परिस्थितियों में इस बात से अनुमान लगा सकते हैं कि आप सही हैं या नहीं..।

      • 1. आधारभूत ब्रह्माण्ड! जी, आपका शुभ नाम क्या है?

        2. क्या आपनें सापेक्षता के विशेष सिद्धांत का भली-भाँती अध्ययन किया है?

        3. “ठीक इसी तरह प्रकाश के वेग से गतिशील वस्तु या पिंड के आकर में कमी, द्रव्यमान अन्नत और समय अन्नत होता हुआ, प्रतीत होता है। इसे कहते हैं विशेष सापेक्षता का सिद्धांत..”

        अगर धरातल को स्थिर मान लें, तो धरातल के सापेक्ष के प्रकाश के निकटतम वेग से गतिमान रेलगाड़ी का अवलोकन यदि हम करते हैं तो द्रव्यमान में अधिकता, समय में कमी और आकार में भी कमी पायेंगे!” (जबकि यहाँ आपने समय को उन्नत होता बताया है.)

        4. “जब पिंड प्रकाश के वेग से गतिशील होता है तब उसमे निर्पेक्षीय अनुपात में परिवर्तन होते हैं।” परिवर्तन निरपेक्ष कैसे हो सकता है? निरपेक्ष परिवर्तन का अर्थ हुआ की यात्री को रेलगाड़ी से बाहर की वस्तुवें जिस अनुपात में छोटी दिख रही हैं, उसी अनुपात में अंदर की वस्तुवें भी संकुचित दिखनी चाहिए. पर ऐसा नहीं होता!

        5. अधिक जानकारी के लिए कृपया पहले इसे पढ़ लें! http://en.wikipedia.org/wiki/Special_relativity

        6. “माना हम ट्रेन पर बैठे सुबह के दस बजे, और बैठते समय अपनी हाथ की घड़ी, स्टेशन की घड़ी से मिला ली! अब हमारी रेलगाड़ी 2,40,000 किमी./सेकंड के भीषण वेग से दौड रही है! फिर कुछ दूरी तय करने के बाद एक स्टेशन आया! हमारी रेलगाड़ी रुक गयी! स्टेशन पर देखा की ग्यारह बज गए थे, और अपनी हाथ घड़ी देखा तो उसमें दस बजकर 36 मिनट ही हुए थे. यहाँ तक ठीक है?” आपके अनुसार यहाँ क्या परिवर्तन होना चाहिए?

      • यह कहना मुश्किल होगा कि मैंने विशेष सापेक्षता के सिद्धांत का भली-भाँती अध्ययन किया है या नहीं..
        मैंने बहुत साल पहले कक्षा-११वी. में ऐसा ही पड़ा था।
        खैर.. आप इतना जान लें कि अन्नत समय होने का व्यवहारिक अर्थ घड़ी का सुस्त पड़ना भी होता है। यानि कि घड़ी का धीरे-धीरे चलना।
        अन्नत का गणितीय में दो अर्थ निकाले जाते हैं। एक तो अधिकतम मान के लिए.. और दूसरा सर्वाधिक होने के लिए..।
        इसी तरह भौतिकी में जिस स्थान से प्रकाश किरणें समान्तर आती हुई प्रतीत होती हैं। उसे भी अनंत कहते हैं। और जहाँ गुरुत्वाकर्षण बल समाप्त होता है। उसे भी अनंत कहते हैं।

      • आधारभूत ब्रह्माण्ड,
        ग्यारहवीं में विशेष सापेक्षता का सिद्धांत! इन दिनों तो B.Sc. से पहले लोग सापेक्षता के सिद्धांत के बारे में जानते ही नहीं है, यदि उन्होंने स्कूल से बाहर निकलकर कुछ पढाई न की हो तो!

        वैसे कहीं आप विद्या निकेतन इंटर कॉलेज, कानपुर के भौतिकी के अध्यापक तो नहीं हैं?

  30. प्रश्न १. ऐसा माना जाता है की सूर्य का प्रकाश हम तक आने मैं लगभग 8 .5 मिनट लेता है, इस का मतलब की अगर अभी सूर्य ख़तम हो जाये तो हमे 8 .5 मिनट बाद पता चलेगा. अब आते मैं मुद्दे की बात पर, हमारे सबसे पास के तारे अल्फा सेंतुरी का प्रकाश हम तक लगभग ४ वर्ष मैं आता है, तो जो ब्रह्माण्ड हम आज देखते हैं वो तो जाने कितने लाख प्रकाश वर्ष बाद हम तक पहुंचा है, मतलब हम कई लाख वर्ष पहले के आकाशमंडल को देखते हैं, तो हम जो calculation करते है वो कैसे सही हो सकती है?
    प्रश्न २. हमारे आंखे .4 mircon से .7 micron के वर्णक्रम के प्रकाश को देख सकती है, हम केवल २० हर्ट्ज़ से २० किलो हर्ट्ज़ के बीच की ध्वनि को ही सुन सकते हैं, इससे ऊपर और नीचे भी कितनी धवानियाँ और प्रकाश होंगे जिन्हें हम न तो देख सकते और न सुन सकते फिर हम इतनी लिमिटेड इन्द्रियों से कैसे इस दुनिया की थाह पाने की सोच सकते है?
    प्रश्न ३. हमारे हम मैं जो विचार आते हैं उन्हें हम किस तरह परिभाषित कर सकते हैं? वो किसी प्रकार की ऊर्जा है ?

    • १. ब्रह्मांडीय स्तर पर की गणनाओ में खगोलीय पिंडो के द्वारा उत्सर्जित प्रकाश के पृथ्वी तक पहुँचाने में लगे समय का ध्यान रखा जाता है.
      २. हमारी इन्द्रियाँ सक्षम नहीं लेकिन हमारे पास उपकरण तो है.
      ३. आपका प्रश्न अभी तक अनुत्तरीत है, विचार का प्रवाह हमारे मस्तिस्क में विद्युत् संकेतो के रूप में ही होता है लेकिन विचार कैसे बनते है, क्यों बनते है , अनुत्तरीत है.

  31. main ek student hi hu …or apni puri life ko ek parrelal univers ko khojne main samrpit karta hu ….muje pata nahi main kis disha main ja raha hu par main jaha se eski surubat kar raha hu vo apko sab ko batata hu …………….ye to ham sabhi jante hai ki theoritical rup se eska astitv hai …….par maine mere asspass kuchh esa dekha jo muje use or adhik janne ke liye prerit kartra hai ….apne bhi dekha hoga …bhut pret ke bare main suna hoga …unme kuchh to sachhai hai …..ya sirf energy ka koi rup hia …ya koi duniya jo kisi or dimenssion me ho ….maine kuchh pata kiya

  32. sir aapki hindi mehnat ke liye salam. Mujhe dravman(Mass) ke baare mein bataye?saralta se

  33. फोटान, जो कि प्रकाश वेग से गतिमान होते हैँ, विशेष सापेक्षता के सिध्दान्त के अनुसार समय का प्रयोग करते हैँ या नहीँ? क्या फोटान पर भी समय शून्य होता है?

  34. बहुत दिन हुए कहाँ है आप,माफ़ कीजियेगा मंगल की खबर [तथा चित्रों ] का इंतज़ार है ,

  35. स्ट्रिँग सिध्दान्त के अलावा और कौन कौन से सिध्दान्त हैँ जो एकीकृत सिध्दान्त होनेँ का दावा करते हैँ?

  36. फ्रिज मेँ जमी हुई बर्फ पिघलनेँ पर जो पानी बनता है उस पानी मेँ सफेद रंग का कोई पदार्थ आ जाता है जो पानी मेँ विलेय नहीँ नहीँ होता। जल की सतह मेँ बैठ जाता है। लगता है पानी गन्दा हो।

    तो वो सफेद पदार्थ क्या है? क्योँ और कैसे बनता है?

  37. इंटरनेट पर भारी मात्रा मेँ डाटा मौजूद है। यह डाटा संग्रहीत कहाँ होता है?

    उसकी संग्रहण क्षमता कितनी होगी?

    इंटरनेट का क्या कोई मालिक भी है?

    हमलोग जो इंटरनेट के पैसे सर्विस प्रदाता को देते हैँ वो पैसे कौन लेता है? (अन्त मेँ)

    इंटरनेट पर साईट बनानेँ पर जो वार्षिक धन चुकाना पड़ता है तो यह धन कौन लेता है? उसे कौन अधिकार देता है ऐसा करनेँ का?

    • इंटरनेट पर भारी मात्रा मेँ डाटा मौजूद है। यह डाटा संग्रहीत कहाँ होता है?

      उत्तर : हर वेब साईट का अपना सर्वर होता है, डाटा उसी सर्वर पर होता है. एक सर्वर पर एक से ज्यादा साईट भी हो सकती है. कुछ कम्पनियाँ इस काम के लिए सर्वर राकहती है जिन्हें होस्टिंग कंपनी कहते है. वैसे अपने नीजी सर्वर भी रखे जा सकते है, जैसे ब्लॉग वाणी का अपना सर्वर था.

      उसकी संग्रहण क्षमता कितनी होगी?
      उत्तर : सर्वर की क्षमता होस्टिंग कंपनी पर निर्भर है, कितनी भी हो सकी है.

      इंटरनेट का क्या कोई मालिक भी है?
      उत्तर : इंटरनेट एक जाल मात्र है, जिसने इन सर्वरों को जोड़ रखा है, इसका कोई मालिक नहीं है, अलबत्ता कुछ नियामक संस्थान है जो इसके सञ्चालन के नियम तय करते है.

      हमलोग जो इंटरनेट के पैसे सर्विस प्रदाता को देते हैँ वो पैसे कौन लेता है? (अन्त मेँ)
      उत्तर : सर्विस प्रदाता ही, क्योंकि वह आपके कंप्यूटर को जाल से जोड़ता है, उसी के पैसे लेता है.

      इंटरनेट पर साईट बनानेँ पर जो वार्षिक धन चुकाना पड़ता है तो यह धन कौन लेता है? उसे कौन अधिकार देता है ऐसा करनेँ का?
      उत्तर : होस्टींग कंपनी क्योंकि आपकी साईट उसके सर्वर पर है! आपको सर्वर का किराया देना होगा!

  38. kya parmanu ko sukshamdarshi se dekha ja sakta hai

  39. sir ji manav me dhawni ki samaniy dar kitne DB hoti ha

  40. अगर हम प्रकाश की गति कि विपरीत दिशा मेँ चलेँ तो हमारे सापेक्ष प्रकाश का वेग तो C से अधिक नहीँ हो जायेगा?

  41. kya aapko nahi lagta ham kabhi bhi univesre ki starting ka pata nahi laga payenge.

  42. 1. क्या प्रकाश तरंगो के तरंगदैर्घ्य मेँ परिवरर्तन किया जा सकता है? अगर हाँ तो किन पदार्थो से किस प्रकार?

    • जब भी प्रकाश एक माध्यम से दूसरे माध्यम (जैसे निर्वात से वायु या वायु से जल, या वायु से कांच) मे जाता है तब उसके तरंगदैर्ध्य तथा गति मे परिवर्तन आता है। कारण इस समीकरण से समझा जा सकता है
      तरंगदैर्ध्य(λ) x आवृति(Ν) = तरंगगति(v)

      आवृति स्थिर रहती है, उसमे परिवर्तन नही आता है, लेकिन माध्यम के परिवर्तन से गति मे परिवर्तन होता है। गति के इस परिवर्तन के संतुलन के लिये तरंगदैर्ध्य मे परिवर्तन आवश्यक है।

  43. Twin paradox kya hai?.. abhi tak yah ek puzzle kyon hai

  44. KYAA ANTARISHK ME GATI BADHAI JA SAKTI HAI

    • आपका प्रश्न स्पष्ट नही है कि गति किसकी बढा़ना है! किसी यान की गति अंतरिक्ष मे ऐसे भी ज्यादा होती है क्योंकि कोई अवरोध नही होता है। पृथ्वी पर वायुं से, धरती या जल के घर्षण से गति कम होते जाती है। लेकिन अंतरिक्ष मे ऐसा कोई अवरोध ना होने से न्युटन का प्रथम नियम पूरी तरह कार्य करता है।

  45. यदि आप किसी लिफ्ट में दियसलाई की तीली को जलायें और वह लिफ्ट नीचे बिना किसी रोक के गिरने लगे यानि कि वह केवल पृथ्वी के गुरुत्वकर्षण के फ्री फॉल में हो तब दियसलाई की तीली की जलती लौ का क्या होगा।

    (संभवतः यह आइन्स्टाइन का सुझाया एक प्रश्न है। जहाँ भी मैँनेँ यह प्रश्न पढ़ा था वहाँ इसका उत्तर नहीँ दिया गया था।)

  46. आग की लौ हमेशा ऊपर की ओर ही क्योँ जाती है?

    अगर माचिस की तीली को जलायेँ और उसे तेजी से ऊपर ले जायेँ तो क्या होगा और अगर तेजी से नीचे ले आयेँ तो क्या होगा?
    (वायु के प्रतिरोध को नगण्य मानिये, अन्यथा तीली बुझ जायेगी। :-) अभी तीन चार बार कोशिश की पर वायु के प्रतिरोध के कारण तीली इतनी जल्दी बुझ जाती कि पता ही नहीँ चल पाता कि लौ बुझनेँ से पहले ऊपर की ओर थी या नीचे की ओर या यथावत ही थी।)

  47. parmanu dravyaman aur mol ko spast karo plz. sir thanks

  48. दोस्तों, मैंने कुछ समय पहले ही एक फिल्म देखकर ख़त्म की। उसका नाम तरंग था। यह फिल्म समान्तर ब्रह्माण्ड पर आधारित थी। आप देखेंगे कि फिल्म में पहले से ही समान्तर ब्रह्माण्ड की उपस्थिति को जायज ठहरा दिया गया है। फिल्म के मध्य में 11-आयाम की उपस्थिति को कुछ जरूरतों को समझने में आवश्यक बिंदु बतलाया गया है। उसी समय दोनों ब्रह्माण्ड की आपसी वार्ता में चल रही वार्ता को स्वपन कहा जाता है।

    मैंने भी एक आर्टिकल में वर्तमान को स्वपन का दर्जा दिया था। जिसको जानने के लिए प्रश्न करने की आवश्यकता नहीं होती। जहाँ वर्तमान, ब्रह्माण्ड के स्वरुप अर्थात विशिष्ट संरचना को वर्गीकृत नहीं अपितु विश्लेषित करता हुआ मालूम पड़ता है। फिल्म के अंत में जो दिखाया गया है। तब ऐसा लगता है मानो हम ही एक निर्देशित तंत्र के रूप में ब्रह्माण्ड है। जिसकी प्रकृति ब्रह्माण्ड की प्रकृति के अनुरूप ही कार्य करती है। याद रहे यह कहना तब संभव होगा जबकि हम ब्रह्माण्ड की प्रकृति को जानते हों। फिल्म का मजा तब तक अधुरा रहेगा। जब तक आपको फिल्म देखते समय दो-चार ठहाके की हसी न आ जाए..। यह हसी एक रचनाकार के रूप में होगी। जो ब्रह्माण्ड की रचना को क्रमबद्ध संरक्षित करता गया होगा।
    जरूर देखिये.. FREQUENCY

  49. kya 0 digri par pura pani barf ban jata hai spast kijie

  50. EINSTEIN KI THEORY OF RELATIVITY SE THEORITICALY YE KAISE POSSIBLE HAI KI HUM BHOOT KAAL (PAST) MAI JAA SAKTE

  51. EINSTEIN KI THEORY OF RELATIVITY SE THEORITICALY YE KAISE POSSIBLE HAI KI HUM BHOOT KAAL (PAST) MAI JAA SAKTE HAI

  52. kramsh: K , L , M , N, kosh me electrano ki sakhya 2 , 8 , 18 , 32 hoti hai but N kosh ke baad ke kosho me electrano ka vitran samjhaia

    • अनिल, अभी तक किसी भी तत्व के परमाणु की किसी भी इलेक्ट्रान कक्षा मे 32 से ज्यादा इलेक्ट्रान नही पाये गयें है। शायद 32 इलेक्ट्रान किसी भी कक्षा मे इलेक्ट्रानो की अधिकतम संख्या है। O,P तथा Q कक्षा मे भी अधिकतम 32 इलेक्ट्रान ही हो सकते है।

  53. K = s = 2
    L = s,p = 2+6 = 8
    M = s,p,d = 2+6+10 = 18
    N = s,p,d,f =2+6+10+14 = 32
    O = s,p,d,f = 2+6+10+14 = 32
    P = s,p,d = 2+6+10 = 18
    Q = s,p = 2+6=8

    स्पष्ट है कि 2, 8, 18, 32 के बाद O, P, Q कक्षाओँ मेँ क्रमशः 32, 18 और 8 इलेक्ट्रान रहते हैँ। और इसी से 1 से लेकर 118 परमाणु क्रमांक वाले तत्वोँ मेँ इलेक्ट्रान वितरण समझाया जा सकता है।

    अब यदि 118 परमाणु क्रमांक वाले तत्व से आगे के तत्वोँ की खोज होती है तो 119 और 120 परमाणु क्रमांक वाले तत्व के अन्तिम इलेक्ट्रान आठवीँ कक्षा यानी R कक्षा मेँ जायेँगे।

    फिर 121 से आगे के लिए s,p,d,f से आगे g मेँ जाना पड़ेगा। g मेँ अधिकतम 18 इलेक्ट्रान होँगे। जिससे पाँचवेँ आवर्त यानी O कक्षा मेँ 32 से बढ़कर अधिकतम 50 इलेक्ट्रान हो जायेँगेँ, इसी प्रकार छठे आवर्त मेँ 18 से बढ़कर अधिकम 32 इलेक्ट्रान और सातवेँ मेँ 8 से बढ़कर अधिकतम 18 इलेक्ट्रान हो जायेँगे।
    इस प्रकार परमाणु क्रमांक 121 से 151 तक के तत्वोँ मेँ इलेक्ट्रान वितरण समझाया जा सकेगा। और आठवेँ आवर्त मेँ 50 और तत्व रह सकेँगे।

    पर यहाँ तक कोई आयेगा नहीँ। क्योँकि अधिक परमाणु क्रमांक वाले तत्व अस्थायी होते हैँ और शायद प्रयोगशाला मेँ जबरदस्ती बनाये जाते हैँ।

    (किसी भी स्थिति मेँ अन्तिम कक्षा मेँ आठ से ज्यादा इलेक्ट्रान नहीँ हो सकते।)

    • और अन्तिम कक्षा मेँ दो से ज्यादा इलेक्ट्रान तभी हो सकते हैँ जब अन्तिम से पहले वाली सभी कक्षायेँ 2n^2 के अनुसार पूर्ण भरी होँ।

  54. parantu aapne yah nahi bataya ki einstein ke kis equation ko hal karne par time travel ki possibility banati hai

  55. प्रकाश का वेग निरपेक्ष है, क्योँ?
    प्रकाश एक स्थिर वेग (c) से ही गति क्योँ करता है?

  56. आयाम की परिभाषा?
    द्रव्यमान की परिभाषा?
    ऊर्जा की परिभाषा?
    समय की परिभाषा?
    पदार्थ की परिभाषा?
    स्थान की परिभाषा?

    उपरोक्त सभी की परिभाषाएँ कुछ सटीक और गहरी वैचारिक बिँदु से दीजिए।

  57. 1. पदार्थ
    2. प्रतिपदार्थ
    3. ऋणात्मक पदार्थ
    4. श्याम पदार्थ
    की परिभाषाएँ क्या हैँ और इनमेँ मुख्य अन्तर और विशेषताएँ कौन कौन से हैँ?

    इसीप्रकार

    1. ऊर्जा
    2. प्रति ऊर्जा
    3. ऋणात्मक ऊर्जा
    4. श्याम ऊर्जा
    की परिभाषाएँ क्या हैँ और इनमेँ मुख्य अन्तर और विशेषताएँ कौन कौन से हैँ?

    इनके अतिरिक्त क्या और किसी प्रकार के पदार्थ और ऊर्जा होते हैँ? यदि होते हैँ तो उनकी भी जानकारी दीजिए।

  58. सर, मैं आप से एक भ्रान्ति के बारे में पूंछना चाहता हूँ। मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं इस विषय में अपने सर की बातों को नहीं समझ पा रहा हूँ। मैं अपनी राय को व्यक्त करके या अपने सर की सोच को बताकर। आपमें या आपके द्वारा दिए जाने वाले उत्तर में सोच या राय का प्रभाव नहीं देखना चाहता।

    प्रश्न: क्या मैं मान सकता हूँ कि सर अल्बर्ट आइन्स्टीन की भूमिका परमाणु बम में थी..??

    आप इसका उत्तर विस्तृत भी दे सकते हैं। और एक शब्द में भी.. क्योंकि हम दोनों को इस विषय की पूर्ण जानकारी है। पर मुझे लगता है कि सिर्फ सोच का प्रभाव हावी हो रहा है। मैं उत्तर के इंतज़ार में हूँ..।

    • दुर्भाग्य से इसका उत्तर हां है। आइन्स्टीन ने अमरीकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट को परमाणु बम बनाने की सलाह दी थी, वे चाहते थे कि जर्मनी (हिटलर) से पहले अमरीका परमाणु बम बना ले। आपको ज्ञात होगा कि आइन्स्टीन यहूदी थे तथा जर्मनी से भागकर अमरीका मे शरण ली थी। वे नही चाहते थे कि ऐसी विनाशकारी शक्ति हिटलर के हाथ लगे।

      इसके अतिरिक्त परमाणु बम उनके कार्य E=mc2 पर ही आधारित है।

  59. मित्र , मेरा प्रयास आपको एक परिकल्पना के माध्यम से ये एहसास करवाना था की यदि प्रकृति ने हमें अर्थात हमारी चेतना को किसी घटना को याद रखने की शक्ति \गुण नहीं दिया होता . ये इस तरह से है की जैसा हम गंणित में करते है की माना की पेड़ की ऊंचाई x है ” – तो मेरे मित्र इस अवस्था में जब की हम किसी घटना को याद नहीं रख पाएंगे तो हमारे लिए भूतकाल का अस्तित्व ही नहीं होगा . हम सिर्फ वर्तमान को ही महसूस कर पाएंगे .तो मेरे कहने का मतलब है की क्या उस परिकल्पित अवस्था में हमारे सिधांत जो हमने समय ,सापेक्षता व अन्तराल के लिए बनाये है जरुर कुछ अलग होते उसमे भूतकाल जैसी कोई अवधारणा ही नहीं होती तो क्या भोतिकी के सारे सिधांत मूलतः हमारी चेतना पर ही सीधे निर्भर करते है ? अर्थात जो समय की आभासी नकारात्मक दिशा जो भूतकाल को प्रदर्शित करती है वो वास्तव में केवल हमारे मस्तिस्क और चेतना का बुना जाल है यथार्त नहीं |और इसीलिए जब हम समय से सम्बंधित किसी भी शोध के अंत में जाते है तो यही पाते है की भूतकाल में जाना संभव नहीं , यदि है तो केवल आभासी उपस्थिति मात्र घटनाओ को प्रभावित किये बिना |ये तो यही सिद्ध करती है की हम घूम कर वापस चेतना ,मस्तिष्क एवं एहसास पर ही आ गए .ashish ji please give some comment on this.

    • गोविंद जी,

      भौतिक घटनाये वास्तविक होती है, उनका प्रभाव वास्तविक होता है, जबकि चेतना, मस्तिष्क या स्मृति वास्तविक घटनाओं के अतिरिक्त आभासी घटनाओं को भी दर्ज करती है। एक वास्तविक है, दूसरे मे कल्पना का मिश्रण भी है।

      आप इन दोनो को एक जैसे नही देख सकते है। कुछ भौतिकी सिद्धांत या परिकल्पना जैसे समय यात्रा मे हम कल्पनाओं का सहारा लेते है क्योंकि हम उन्हे प्रायोगिक रूप से कर के देख नही सकते। लेकिन ये आभासी या कल्पना नही होती है, ज्ञात वैज्ञानिक सिद्धांतो के आधार पर वे संभव होती है।

      हमारी चेतना एक टेप कैसेट के जैसी है जो वास्तविक हो जरूरी नही है लेकिन वैज्ञानिक सिद्धांत और उनके प्रभाव वास्तविक होते है।

      • sir ji time is also an imaginary .as it doesnt have any other phisical properties . its also a matter of feelings only.so a thing that is not purely phisical how we can use it as a base of all physical phenomenons.

      • यह सही है कि समय का अपना अस्तित्व नही होता है लेकिन वह वास्तविक भौतिक गति से जुड़ा होता है। समय हमेशा किसी ना किसी गति से जुड़ा हुआ होता है। जैसे एक दिन पृथ्वी के एक सम्पूर्ण घूर्णन से जुड़ा है, एक वर्ष पृथ्वी की सूर्य की परिक्रमा को दर्शाता है।

  60. प्रश्न संख्या २] बल की परिभाषा क्या है ? latest or still that one we read in 8/9 वह व्यवस्था जिसके द्वारा कार्य किया जाता है या कुछ और परिवर्तन आये है इस परिभाषा में , ? और यदि में इसमें कुछ संशोधन करना चाहू तो क्या प्रोसेस है ? अधिकारिक परिभाषा कहा देखि जा सकती है ?

  61. प्रश्न संख्या ३ ] einstien द्वारा बताये गए effect ” की भारी गृह \ पिंड पास से गुजरते हुए प्रकाश की किरण को अपनी और मोड़ देते है इसमें और refraction में क्या फर्क है .और यदि नहीं तो प्रकाश के मुड़ने की घटना [refraction] तो धरती पे आम है ?

    • प्रकाश किरण फोटानो से बनी होती है, ये फोटान दोहरा व्यवहार रखते है अर्थात कण तथा तरंग दोनो के रूप मे व्यवहार करते है।

      गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से ये कण(फोटान) किसी भारी द्रव्यमान वाले पिंड के गुरुत्व से प्रकाश कण या प्रकाश किरण मुड़ जाती है। यह गुरुत्वाकर्षण का फोटान पर प्रभाव है।

      लेकिन अपवर्तन(refraction) प्रकाश के तरंग व्यवहार के फलस्वरूप होता है, माध्यम मे परिवर्तन होने से प्रकाश किरण की तरंग के तरंग दैधर्य मे बदलाव आता है और उसकी दिशा बदल जाती है।

      प्रकाश किरण पर गुरुत्विय प्रभाव तथा अपवर्तन दोनो अलग अलग प्रभाव से है और दोनो मे कोई समानता नही है।

  62. sir if v write our event in a dairy,does dairy has any impect on our events then wud d dairy start behaving fast or slow if our events r happening with speed of light. means how c effects time ? see my fb req too asish ji.

  63. Big bang क्या है? इसके बारे मेँ जो भी परिभाषाए या जानकारी दी जा रहीँ है वह केवल अनुमान है या प्रयोग से प्राप्त है? शिघ्र उतर देँ

  64. sir,what is the maximum possible speed of displacement ?

  65. i know sir possible velocity is c . but me ye poochna cahata hu ki kinhi bhi 2 objects ke beech badne wali duri ki adhiktam gati kya ho sakati hai. check ur fb frnd req pliz.

  66. सूर्यग्रहण को नंगी आँखोँ से देखना मना होता है! क्योँ? बिस्तार से बताऐँ साथ हीँ CFC के बारे मेँ पूर्ण जानकारी चाहता हूँ।

    • सूर्यग्रहण ही नही सूर्य को किसी भी समय नंगी आंखो से देखना मना होता है। सूर्य से प्रकाश के अतिरिक्त पराबैंगनी किरणे निकलती है जो आंखो को क्षति पहुंचा सकती है और यह क्षति हमेशा के लिये हो सकती है। पराबैंगनी किरणे से कैंसर भी हो सकता है।
      CFC यह क्लोरोफ्लोरो कार्बन है। इसे एअर कंडीशनर, फ्रिज जैसे उपकरणो मे प्रयोग किया जाता है। यह ओजोन को आक्सीजन के अणुओ मे तोड़ देता है। पृथ्वी के वायुमंडल मे ओजोन की एक परत है जो पृथ्वी के वातावरण मे पराबैंगनी किरणो को आने से रोकती है। CFC से इस परत को क्षति पहुंचती है।

  67. agar kai solid chij pritvi se akash ki or urdadvadar tivra gati se pheki jaye to vah bramhand me pahuchegi ya nahi? agar ha to vah vapas laut kar prithvi par aayegi?

    • यदि पृथ्वी से कोई पिंड आकाश मे फेंका जाये तो वह पृथ्वी पर वापिस आयेगी, पृथ्वी का चक्कर लगायेगी या पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से छूटकर अंतरिक्ष मे चली जायेगी, उसकी फेंके जाने की गति पर निर्भर करता है।
      इस विशेष गति को पलायन वेग कहते है,पृथ्वी का पलायन वेग 11.2 किलोमीटर प्रति सैकिंड या 40,320 किलोमीटर प्रति घंटा है। इस से अधिक वेग रखने से कोई भी यान हमारा ग्रह छोड़कर सौर मण्डल के दुसरे ग्रहों की ओर जा सकता है।
      अगर पृथ्वी से चलें तो सूरज के गुरुत्वाकर्षक क्षेत्र से निकलने के लिए पलायन वेग 42.1 किलोमीटर प्रति सैकिंड है। अगर सूरज की ही सतह से चलें तो पलायन वेग 617.5 किलोमीटर प्रति सैकिंड है। अगर सही स्थान पर सही पलायन वेग से चलें तो सूरज के गुरुत्वाकर्षण की सीमाएँ तोड़कर कोई यान सौर मण्डल से बाहर निकल सकता है।

    • जितेन्द्र गोस्वामीजी ने इसका सही उत्तर दिया है। जब हमारे मस्तिष्क मे आक्सीजन की कमी होती है तब उसकी पूर्ती के लिये हमारा शरीर स्वतः जम्हाई लेता है। एक और शोध के अनुसार जम्हाई लेने की प्रक्रिया मस्तिष्क को शीतल भी करती है।

  68. jamhai aane ka peeche kaha jata hai ki jub brain me oxygen ki kami hoti hai to ye humare shareer ki swat prakriya hoti hai jiss-se ek lambi gehri saans hum lete hai aur oxygen ki matra poori ho jati hai, aisa kuch maine kahin padha tha.

    • CFC ऐसे कार्बनिक यौगिक होते है जिनमे क्लोरीन, फ्लोरीन, हायड्रोजन और कार्बन होते है। सामान्यतः इन्हे फ्रीआन भी कहते है। इनके एकाधिक प्रकार है। खूले वातावरण मे ये अत्याधिक सक्रिय ( अल्पायु)होते है और विघटित होकर नये यौगिको का निर्माण करते है।

  69. sir, aisa kaun sa force hai jo gravity se bhi strong hai, jiske kaaran universe expand ho raha hai

  70. ese logo ke liye jinko gyan ki pyaas ho aur language ek problem ho unke liye kisi vardan se kum nahi he
    i m running a software company AIS if any kind of help u want then please say, in fact just order me, i will try my best for this site. cause i want to do something like this.

  71. सर- फोटान कण क्या है? इसकी खोज किसने की थी

  72. WHAT IS THE GOD

  73. ashish jee kya aap mujhe Physics of the impossible ki ebook de sakte hai?

  74. 12 sept के दिन मेरे EMAIL ID पर एक मेल आया था जिसमे लिखा था कि British international lottery programme मे आपके EMAIL ID ने £5.5 USD जिता है। कृपया आप अपना नाम पता आदि लिखकर भेजा । पुन: एक मेल आया जिसमे लिखा था कि आपके लौटरी का पैसा WESTERN UNION पर डाल दिया गया है (Western union transfercode, amount, sendername, question and their answer भी दिया था) परन्तु आपका नाम एक्टीवेट नही किया गया है आप पहले ट्रांसफर चार्ज भेज दिजिए आपका नाम एक्टीवेट कर दिया जाएगा।

    मुझे तो यह पूरा धोखा लगता है। क्या यह संम्भव है मै आपका राय जानन चाहता हूं

  75. Pankaj ji ye jo mail aapko prapt hui hai wo ek SPAM mail hai, is-se PHISHING bhi kehte hai.(pronounced as fishing, matlab kanta dal kar fish pakadna, ye mail ek tarah ka kanta hai,)

  76. सर, मैं एक बेबाकूफी भरा प्रश्न आपके सामने रखना चाहता हूँ। पर इस प्रश्न की अहमियत मेरे लिए बहुत है।
    “कार्य करने की क्षमता को ऊर्जा कहते हैं।” तो कार्य ऊर्जा करती है या फिर पदार्थ..??

  77. आधारभूत ब्रह्माण्ड, आपके प्रश्न के जवाब के लिए आपसे एक प्रश्न, जब आप पानी पीते हैं तो पानी आप पीते हैं या आपका मुहँ ?

  78. सर, मैं प्रश्न के उत्तर का इंतज़ार कर रहा हूँ। क्या आप मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर देने वाले थे ?? आपके द्वारा पूछे गए प्रश्न का उत्तर मैने दे दिया है। मुझे इंतज़ार है…

  79. आधारभूत ब्रह्माण्ड जी, देरी से जवाब देने के माफ़ी चाहूँगा, दरअसल जिस प्रकार पानी आप पीते हैं मगर मुंह के द्वारा, इसी तरह कार्य तो उर्जा ही करती है लेकिन पदार्थ के द्वारा. वैसे मुझे लगता है की आपके सवाल का जवाब वैज्ञानिक के बजाय दार्शनिक रूप से ज्यादा अच्छी तरह बताया जा सकता है. दुर्भाग्यवश मैं दर्शन के बारे में ज्यादा नहीं जानता.

  80. How many litres of liquid CCL4 must be measured out to contain 10^25 CCL4 molecule?

  81. भाई, एक बात बताऍं कि जैसे हम भौगोलिक और आकाशीय पिण्‍ड खासतौर पर चंद्रमा से तिथियों, अमावस्‍या, पूर्णिमा आदि का निर्धारण कर सकते हैं क्‍या उसी तरह वारों का यथा सोमवार, बुधवार या शुक्रवार का निर्धारण भी किया जा सकता है क्‍या। मेरा सोचना है कि हर सातवें दिन कोई खगोलीय घटना नहीं होती है, जैसे पूर्णिमा/अमावस्‍या आदि लगभग नियमित अंतराल पर होते हैं, उस तरह सातवें/आठवें दिन के अंतराल पर कोई ऐसी घटना नहीं घटती है कि दिनों का/वार का निर्धारण संभव हो। अर्थात, मैं कहूँ कि आज मंगलवार है तो मैं इसे वैज्ञानिक रूप से या खगोलीय रूप से कैसे सिद्ध कर सकता हूँ। जैसे अमावस को कर सकता हूँ। जाहिर है कि यह सब पृथ्‍वी पर रहकर ही पूछा जा रहा है। कृपया, प्रकाश डालें।

    • मेरी जानकारी मे वारो का किसी आकाशीय/खगोलीय घटना से कोई संबध नही है। यह हो सकता है कि पूर्णिमा से अमावश्या(और उल्टा) की अवधि को दो भागो मे बांटने के लिये सप्ताह बना दिये गये हो और हर वार को एक आकाशीय पिंड से जोड़ दिया गया हो।

      अब्राहमिक धर्मो (यहुदी, इस्लाम, ईसाई ) धर्मो मे सप्ताह के सात दिन , ईश्वर द्वारा छः दिनो मे ब्रह्माण्ड की रचना और सांतवे दिन आराम करने से है।

      हिंदू धर्म मे यह परंपरा वैदिक काल से है।

      लेकि सप्ताह मे सात दिन हर सभ्यता मे नही है, कुछ अपवाद भी है जैसे चीन जापान और कोरीया मे यह दस दिन का होता था।

      इस लेख को देखें।

  82. SIR JI MAI AAPKE SAMNE EK BAHUT GHATIYA SAWAL POOCH RHA HU ISS KE sorry pr kya sceince GHOST OR BHOOT JESE BAATO KO MANTI H KYA ???

  83. सर मै एक गाँव से निकला छात्र हूँ मेरे गाँव मे बहुत से लोगोँ के भूत प्रेत कि बीमारी है और मै इन सब को नही मानता हुँ न तो भगवान और न भूत को तो मुझे ये बताओ कि ये बिमारी कोनसी है और इसका क्या ईलाज है

  84. सर क्या समय के साथ 2 दिन छोटे होते जा रहे हैँ मेरा मतलब है कि लाखोँ साल पहले एक वर्ष 365 दिन से अधिक होता था ?

  85. sir ji kya samay ke saath saath earth sun ke paas ja rhi h matlab unke beech ki duri kam ho rhi h ydi ha to kya 1 year m days ki sankhya kam ho rhi ya jayada ho rhi hai
    ?

  86. विभिन्न पिंड एक दूसरे से कैसे प्रतिक्रिया करते है ?

  87. MUJHE COMPUTER KE BARE MAI JANNA HAI.

  88. आशीष जी , नमस्कार , मैंने आप से पृथ्वी की स्पीड के बारे में सवाल पुछा था, आपने जवाब भी दिया था , मगर आज मुझे वह जवाब नहीं मिल रहा है कृपया मेरी मदद करें ,[ और यह भी बताएं की पुराने जवाब कैसे ढूंड सकतें है ] धन्यवाद ,

  89. बल की दिशा क्या होती है?

  90. kya eisa koi yantr hai jo pani se hidrozan ko alag kar energy main convert kare;;;;//?

  91. nirvat me roket urta kese he kyoki vaha par to koi bal kary nahi karata he

  92. आशीष सर,
    ऊपर एक प्रश्न वेब सर्वर्स के बारे में पूछा गया था | उसी के बारे में एक बात पूछना चाहता हूँ | हम जानते हैं इन्टरनेट का कोई मालिक नहीं पर कुछ नियामक संस्थाएं हैं | इन्टरनेट सर्विस प्रदाता हमें इन्टरनेट से जोड़ने के पैसे लेता है |
    पर एक देश में, जैसे भारत में सूचना के प्रवेश का क्या कोई स्थायी सर्वर (या अड्डा या गेटवे) भी होता है जहाँ से हर सूचना जो देश में आती है और देश के बहार जाती है, जहाँ से इसे गुजरना ही होता है, जहाँ से सरकार सूचनाओं पर निगरानी करती है ? या कोई भी अपने सर्वर को इन्टरनेट से जोड़कर मनमाने तरीके से सूचनाएं आदान-प्रदान (देश के बाहर भेजना और देश के अन्दर लाना) कर सकता है | मसलन विकिलीक्स के पेजेज़ एक बार खुलने बंद हो गए थे तो वे किसने बंद करवाए, कहाँ पर ये लिंक फ़िल्टर किये गए, कैसे किये गए | जैसे चीन और कुछ अन्य देश करते हैं | कुछ सामग्रियों को हटाने के लिए सरकारें वेब पोर्टल या कम्पनी को निर्देश देती रही हैं | पर मैं ये जानना चाहता हूँ क्या हर देश में प्रवेश करने के लिए कोई सरकार नियंत्रित सर्वर है जो बाद में देश के सारे अन्य सर्वर्स को जोड़ता है ? जहाँ से सरकार जबरन किसी सुचना को नियंत्रित कर सकती है जैसे विकिलीक्स के मामले में हो रहा था | क्या बीएसएनएल इस गेटवे का काम करता है ?

    • हर देश मे अपने इंटरनेट नियामक होते है, जो इंटरनेट पर नियंत्रण रखने की कोशिश करते है। किसी भी देश मे इंटरनेट सुविधा देने वाली कंपनी को इन नियामको द्वारा बनाये नियमो का पालन करना होता है लेकिन किसी भी देश मे इंटरनेट को नियंत्रित करने वाला एक सर्वर नही होता है। हर इंटरनेट सुविधा देने वाली कंपनी के अपने सर्वर होते है जो नियमो के अंतर्गत कार्य करने के लिये बाध्य होते है। नियामक उन्हे किसी साइट , यु आर एल या पेज को बंद करने कह सकते है।

  93. भगवान है या नहिँ अगर हैँ तो कहाँ कब और कैसे मिलेगा:-|

  94. हम जानते हैँ कि
    प्रत्यावर्ती धारा का औसत मान शून्य होता है क्योँ कि इसका मान एक बार धनात्मक व एक बार NEGATIVE होता है जबकि हम जानते हैँ आवेश प्रवाह को ही हम धारा कहते हैँ तो क्या प्रत्यावर्ती धारा मेँ एक बार आवेश आगे और एक बार आवेश पीछे जाता है?
    इसे किस प्रकार समझा जा सकता है क्रपया बताइये

    • विद्युत धारा का अर्थ होता है इलेक्ट्रानो का बहाव! इलेक्ट्रानो का बहाव ही विद्युत आवेश के बहाव के रूप मे होता है। आप सही है कि प्रत्यावर्ती धारा मे इलेक्ट्रानो के बहाव कि दिशा कर चक्र मे विपरीत हो जाती है।

  95. प्रश्न संख्या २] बल की परिभाषा क्या है ? latest or still that one we read in 8/9 वह व्यवस्था जिसके द्वारा कार्य किया जाता है या कुछ और परिवर्तन आये है इस परिभाषा में , ? और यदि में इसमें कुछ संशोधन करना चाहू तो क्या प्रोसेस है ? अधिकारिक परिभाषा कहा देखि जा सकती है ?

  96. आपके अनुसार प्रत्यावर्ती धारा मे इलेक्ट्रानो के बहाव कि दिशा कर चक्र मे विपरीत हो जाती है।

    परन्तु जङत्व के कारण ऐसा सम्भव नही है यदि हम मान भी ले तो इसका मतलब कि प्रत्यावर्ती धारा मेँ इलेक्ट्रानो का परिणामी विस्थापन शून्य होता है(क्योँक एक बार इलेक्ट्रान आगे और एक बार इलेक्ट्रान पीछे जाता है ) तो फिर धारा कैसे प्रवाहित होगी?
    कृपया विस्तार से बताइये।
    मैँ इस सवाल से बहुत परेशान हूँ।

    • इलेक्ट्रानो के प्रवाह और जड़त्व का कोई संबंध नही है। ध्यान दे कि इलेक्ट्रान एक ऋणावेशित कण है और वे हमारे धनात्मक विभव की ओर प्रवाहित होंगे, इस प्रवाह की गति भी अत्याधिक होती है। एक चक्र के पश्चात ये विभव विपरित हो जाते है और इलेक्ट्रान के प्रभाव की दिशा भी बदल जाती है। विद्युत धारा का प्रवाह एक दिशा मे कुछ समय के लिये, दूसरी दिशा मे कुछ समय के लिये होता है।

      • दो तीन साल पहले मैं अत्यधिक कन्फ्यूज्ड था इस विद्युत् के सारे लफड़े को लेकर । तब काफी खोजने पर मुझे ये लिंक मिला था । इस पोर्टल दिए गए सभी आर्टिकल पढ़ें (ध्यान दें, सिर्फ एक-आध पढने से आप फिर कन्फ्यूज़ होंगे, इसलिए सम्बंधित सभी आलेख पढ़ें) । उम्मीद है कुछ मदद मिले जिज्ञासा शांत करने में । इस पोर्टल पर काफी मेहनत की गयी है विद्युत् सम्बन्धी जिज्ञासाओं को समझाने की ।

        http://amasci.com/miscon/whatis.html

        असल में हमारी स्कूलों में भी, ज्यादातर अध्यापक इतने कुशल नहीं होते जो इतना गहराई में जाकर बता दें । ना ही आजकल के सिस्टम में इतना समय होता है कि हर छोटे से छोटे टॉपिक को प्रेक्टिकली और थियरीटिकली समझा सकें, एक सेशन में उनको कोर्स पूरा करना ही होता है । आजकल तो वैसे मार्क्स डिपेंडेंट पढाई होती है न कि समझाईश वाली पढाई, बस टॉपिक याद करने होते हैं ना कि समझने ।

        अग्रवाल जी के प्रश्न के लिए मेरा तो यही उत्तर होगा, (जो मैंने इस पोर्टल से सीखा), कि असल में इलेक्ट्रौन के मूवमेंट को जिस तरह हम चलने के सदृश समझ रहे हैं । वैसा नहीं है । चालक पदार्थ के इलेक्ट्रान उस पदार्थ से बहार आकर ना तो निकल जाते हैं ना उसमें पीछे से कोई दुसरे इलेक्ट्रान घुसते जाते हैं । असल में इलेक्ट्रान चलते नहीं है या आप ये माने की इलेक्ट्रान कुछ आवेश या उर्जा जैसा है । ये शब्दों के थोड़ी घलमेंल भी है । समझाने वाले ने यही कहा है कि इलेक्ट्रिसिटी शब्द जैसा कुछ है ही नहीं, इसको कोई शब्द देना थोडा कठिन है, इसको समझना ही पड़ेगा ।
        असल में यह स्रोत से दिया गया एक दबाव-उर्जा-बल-धक्का है (कृपया इन्हें तकनीकी शब्दों के तरह न लें, मेरा मतलब बस धक्के से है) । जो एक जगह से इलेक्ट्रान के जरिये स्थानांतरित होता है । जैसे ध्वनि तरंगें, या पानी में तरंगे एक जगह से दूसरी जगह पर पहुँचती हैं । तो वे पानी या हवा के कणों को एक स्थान से दुसरे स्थान पर ले नहीं जाती । बस उर्जा ही इनके कन्धों पर सवार होकर अलग-अलग रूपों में स्थानांतरित होती है ।

        ——–
        अगर मैं गलत जानकारी दे रहा हूँ तो आशीष सर से निवेदन है कि वो मुझे सही करें ।

      • (…. पिछले कमेन्ट से जारी समझे)
        विद्युत् या इलेक्ट्रान के बहाव के लिए सबसे सरल उदहारण समन्दर की लहरें हैं ।
        ज्वार के प्रभाव से समुद्र में एक लहर उठती है । आप उसे देख भी पाते हैं । चलता हुयी भी दिखती है । तट पर अगर आप खड़े हैं तो आपके पास टकराने पर आपको दबाव या टक्कर भी महसूस होगी । यह क्या था ? बस एक उर्जा का चलन, स्थानांतरण । ये आपको जो चलता हुआ दिखा वो पानी नहीं था, पानी के कण नहीं थे । अगर ऐसा होता तो सारा समंदर कुछ ही देर में अपनी जगह बदल कर पास की धरती पर आता ही जाता और समन्दर अपनी जगह निरंतर बदलता जाता । पर ऐसा नहीं होता है । पानी के कण को आप इलेक्ट्रान के जैसे समझ लें । कण वहीँ रहता है उर्जा चलती है । समंदर में ये उर्जा ग्रहों के आकर्षण से पैदा हुए ज्वार से आई । बस उर्जा परिवर्तित हो रही है । विद्युत् भी इसी तरह एक जगह से, जहाँ से हम समझ रहे हैं कि पैदा हो रही है, पानी के बाँध से । तो वो पैदा तो हो नहीं रही बस एक उर्जा या धक्का निरंतर पम्प किया जा रहा है तार रूपी पाईप के जरिये । यही उर्जा-धक्का हमारे तक पहुँचता है । जैसे ये कंप्यूटर तक पहुँच रहा है जो इस उर्जा को प्रयोग कर रहा है, यहाँ से भी कोई इलेक्ट्रान जैसा कण निकाल कर आगे हवा में नहीं कूदने वाला है बस वह उर्जा-धक्का ही एक रूप से दुसरें में परिवर्तित हुआ जा रहा है ।

  97. Sir , waiting for d answer of my quistion.please answer and help me.

  98. क्या vigyan.wordpress.com जैसी मैथ्स की कोई साईट है

  99. हिंदी में इस तरह के चिट्ठे को पाकर मैं प्रफुल्लित हो गया। बहुत-बहुत ध्यन्यवाद इसके लिए आपको।

    क्या आपने सोचा है की अंग्रेजी की जो बहुत ही अच्छी विज्ञान पुस्तकें हैं आमा आदमी के लिए उन्हें हिंदी में भी उपलब्ध करवाया जाए जैसे:

    The Fabric of Reality – David Deutch
    The Beginning of Infinity – David Desutch
    The Fabric of the Cosmos – Brian Greene
    Hyperspace – Michio Kaku
    The Mind of God – Paul Davies

    सूची बहुत ही लम्बी है…

    आपके आलेखों को पढ़कर लगता है की अगर आप प्रयास करें तो इन पुस्तकों का हिंदी अनुवाद सार्थक होगा। लेकिन सबसे बड़ी समस्या होगी इनके लिए प्रकाशक ढूँढ पाना!

  100. human kya hai kya ham only ek chemical sanrachana ya phir or kuchh………….

  101. धन्यवाद योगेन्द्र जी आपने बहुत बहुत बहुत अच्छा समझाया।
    Lekin sawal yeh hai ki
    प्रत्यावर्ती धारा का मान एक बार धनात्मक व एक बार NEGATIVE होता है।
    तो इस वाक्य का मतलब(अर्थ) क्या है?
    इसे किस प्रकार समझा जाये?
    गणितीय रुप से देखा जाये तो [ VE -VE =0 ]
    इसका मतलब धारा शून्य है।

    • प्रत्यावर्ति विद्युत धारा सदिश है, इसलीये इसकी गणना के लिये दिशा का भी ध्यान रखना होगा. इसलिये धन और ऋण मिलकर शून्य नही होंगे, दिशा के साथ जोडने पर मूल्य दोगुणा हो जायेगा.
      दूसरी बात यह है कि कोई भी भौतिक राशी धन या ऋण नही होती, ये तो हमने अपनी सुविधा के लिये चिह्न दिये है. इलेक्ट्रान को धन मानने पर हमे प्रोटान को ऋण मानना होगा क्योंकि उसका आवेश इलेक्ट्रान से विपरीत है.

  102. nirvat se praksh vayu me aata hai to uske chal me kya parivartan hoga

  103. Par A. C. ka toh ausat maan sunya hota hai.
    Toh aap mujhe yeh bataiye ki dhaara ka maan ek cycle main negative aur postive ka matlab kya hai?yadi isse disha pata chalti hai toh iska matlab ek baar electron aage aur ek baar electron peeche jaata hai, yeh kaise sambhav hai? yadi hum maan le toh parinaami visthapan sunya hoga tab dhaara kaise bahegi[ aavesh pravah ki dar ko hi hum dhaara kahte hain]

  104. So wad ka balb kitne samy me ak unit bijli khata hai?

  105. sir, ye photon kya hai?
    kisi bhi cheez ki sthiti ko ham x,y,z se darshate hai. ye us vasu ki vartman sthiti ko pradarshit karte hai. to kya hame us ki sahi aur vastvik sthiti ko janane ke liye ek aur direction samay ya time ki jarurat padegi?

  106. कोटर[hole] क्या है विस्तार पूर्वक समझाइये

  107. tatvo ke wargikarn ke itias ko vistar se samjhao

    • अनिल,

      त्वचा का रंग एक रासायनिक पदार्थ मेलेनीन से तय होता है। भैंस की त्वचा मे यह अधिकता मे पाया जाता है, जिससे उसका रंग काला होता है। वैसे कुछ अल्बिनो (रंग हीन या सफेद) भैंसे भी होती है जिनमे मेलेनीन की कमी होती है।

      इसी तरह से ही मानवो का रंग भी होता है।

  108. कोटर[अशुद्ध अर्द्धचालक(p-type) मेँ पाये जाते हैँ] क्या है?
    क्या आप मेरा प्रश्न समझ चुके हैँ यदि हाँ तो कोटर के बारे मेँ विस्तार पूर्वक समझाइये

  109. Pletinum pratirodh taapmaapi main sanyojak taaro[taambe se bane] ke pratirodh ko nirast karne ke liye theek vaise hi taar[taambe se bane] lagaye jaate hain jinke nichle sire aapas main jude hote hain.
    yeh kaise ho sakta samjhaiye.

  110. दीवाली में छोटे-छोटे बल्बों की झालरें घरों में सजाई जाती हैं. यह छोटे-छोटे बल्ब थोड़ी-थोड़ी देर में जलते-बुझते रहते हैं. कुछ झालरों में तो कोई छोटी सी मशीन लगी होती है, जिस कारन वो अलग-अलग प्रकार से लुप-झुप करते रहते हैं. पर कुछ में कोई मशीन नहीं होती, उसमें एक विशेष बल्ब लगा होता है जिसे यहाँ ‘मास्टर बल्ब’ कहते हैं. मात्र उस मास्टर बल्ब के कारन ही पूरी झालर अपने आप कुछ सेकंड जलती है, फिर बुझ जाती है फिर जलती है और फिर बुझ जाती है. उस मास्टर बल्ब की संरचना सभी बल्बों से अलग होती है. क्या आप बता सकते हैं कि यह मास्टर बल्ब पूरी झालर को जलाने – बुझाने का कार्य कैसे करता है?

    • Anmol ji, ye jo master balb hota hai, ye ek simple bulb ki tajah hi hota hai, but antar itna hai ki is main filament to jodne ke liye ek visesh prakar ki dhatoo ke wire ka prayog hota hai. ye dhatoo garam karne par failti hai(extend hoti hai). Samany tapman par ye wire filament to power supply karti hai, then it got hot as par ohms law and also from the heat from the filament, then it extend and the contact to the filament get disconnected and bulb shut down, now it start to cool and touch the filament wire again and the above process follow again. to make it clear, this master bulb connected in the series to the entire circuit so it can block(cut) the follow of current.
      hope this helps.

  111. sir ji, india mein first ufo kaha dekha gaya.

    • गुरुत्वाकर्षण से। वैसे पृथ्वी पूर्णतया गोल नही है, वह ध्रुवो पर चपटी है।
      कोई भी विशाल पिंड अपने गुरुत्व से पूर्ण गोलाकार होने का प्रयास करता है, लेकिन घूर्णन से वह अपने विषुवत पर बड़ा और ध्रुवो पर चपटा हो जाता है।

  112. Kya ap hume ye bata denge ki big bang se purw jab samay ka astitwa nahi tha tab big bang me lagi vastu ko kisne akattrit kiya jab ki kisi vastu ko hilne ke liye samay or gati ki awashkta hoti hai jab ki stephen hawking ka manna hai ki ishwar hai hi nhi…..!

  113. SIR JI,
    HAM JANTE HAI KI E=MC.C AGAR HA KISI VASTU KE MASS KO VIDHUT URJA ME BADAL DE AUR USE LIGHT KE TARO KE MADHYAM SE EK STHAN SE DUSRE STHAN PAR BHEJ DE AUR FIR WAPAS MASS ME BADAL DE . TO IS TARAH HAM MASS KO EK STHAN SE DUSRE STHAN PAR LE JA SAKTE HAI. KYA YE POSSIBLE HAI?

  114. Sir ji. mai ye pu6na chahta hu ki agar big bang ke bad agar sankuchan hoga to padarth prati padarth se jab takraenge to usme se jo urja paida hogi uska kya hoga kya jab dobara universe banega to usme kam aegi agar ha to humare universe ke banne ke purv bhi samay ka astitv hoga..

    • तारिक,
      तुम्हारा प्रश्न बहुत अच्छा है। जब बिग बैंग से ब्रह्माण्ड बना था तब किसी अज्ञात कारण से पदार्थ की मात्रा प्रति-पदार्थ से ज्यादा थी। इस कारण पदार्थ और प्रति-पदार्थ के टकारने के बाद ऊर्जा बनी लेकिन कुछ पदार्थ बच गया। इसी शेष पदार्थ से वर्तमान ब्रह्माण्ड बना है। इस की खोज अब्दुस सलाम ने की थी और उन्हे नोबेल मीला था।
      वर्तमान की जानकारी के अनुसार ब्रह्माण्ड का संकुचन नही मीलेगा, यह निरंतर विस्तार करते हुये ठंडा हो जायेगा। यह एक नयी खोज है, इसके पीछे श्याम ऊर्जा(डार्क एनर्जी) को माना जा रहा है। पिछले साल का नोबेल इसी खोज के लिये हुआ था।

      समय का आस्तित्व ब्रह्माण्ड के आस्तित्व के साथ ही हुआ है, ब्रह्माण्ड के बिना समय का कोई अर्थ नही है। समय एक जटिल धारणा है। समय यह गति का एक दूसरा रूप है। जिसे हम एक दिन मानते है वह पृथ्वी का अपने अक्ष पर एक घूर्णन है। एक वर्ष पृथ्वी की सूर्य की परिक्रमा काल को कहते है। समय का आस्तित्व नही होता है, हम किसी गति को ही समय मानते है।

      जब तुम घड़ी देखते हो तब एक मिनिट अर्थात कांटे का एक चक्कर लगाना है, यह गति है जिसे समय मान लीया जाता है। दूसरा उदाहरण जब तुम कहते हो कि दोपहर हो गयी या बारह बज गये, इसका अर्थ है कि सूर्य क्षितिज से गति करते हुये आकाश के मध्य आ गया है।

      अर्थात समय के आस्तित्व के लिये गति आवश्यक है, गति ब्रह्माण्ड के रहने पर ही होगी। ब्रह्माण्ड के आस्तित्व के बिना समय होगा ही नही।

      • मैं सर की बात को आंगे बढ़ाना चाहूँगा कि ब्रह्माण्ड के संकुचन को प्रमाणित ही नहीं किया जा सकता। क्योंकि प्रयोगों में सिद्धांत की अहम् भूमिका होती है। आपके लिए एक कल्पना प्रस्तुत है। यदि ब्रह्माण्ड के सभी अवयवों, पिंडों और निकायों में स्वतः संकुचन होने लगे। तो आप क्या कहना उचित समझेंगे ?? कि ब्रह्माण्ड का संकुचन हो रहा है ?? अथवा ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है ??

        वास्तव में होता ये है कि स्वतंत्र संकुचन के कारण सापेक्षीय दुरी में वृद्धि होती है। फलस्वरूप आप को कहना ही होगा कि ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है। न कि ब्रह्माण्ड का संकुचन हो रहा है।

      • सर, समय केवल एक अवधारणा नहीं है। जो ब्रह्माण्ड के अस्तित्व के साथ ही अस्तित्व में आई। समय केवल एक अवधारणा तब होती। जब कुछ नहीं से कुछ होने की बात सामने आती। वर्तमान में जानकारी के अनुसार अतिसूक्ष्म पिंड में अचानक विस्फोट के कारण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई है। तात्पर्य किसी न किसी भौतिकीय संरचना का अस्तित्व था।

        इतना सब कहने का उद्देश्य सिर्फ इतना सा था कि समय, केवल गति का दूसरा रूप नहीं है। जबकि गति, समय की प्रमुख शर्त है। आपने जो उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। वह बिलकुल सटीक हैं। परन्तु जब हम कहते हैं कि महा-विस्फोट के बाद से अब तक ब्रह्माण्ड के विस्तार में धीरे-धीरे कमी आई है। तो क्या हम यहाँ समय को नहीं दर्शा रहें है ?? हम किस आधार पर कहते हैं कि महा-विस्फोट की घटना इतने वर्ष पूर्व हुई थी ?? दरअसल हमारा संकेत उम्र(समय का रूप) की और था। इन्ही सब बिन्दुओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि समय केवल एक अवधारणा नहीं है। बल्कि गति, समय की प्रमुख शर्त है।

  115. व्यवहार मेँ हम कहते हैँ कि तार मेँ शार्ट शर्किट हो गया है
    to kya iske karan taar andar se toot jaata hai ya phir kuch aur hota hoga?
    iske baare main bataiye.
    ek aur sawal
    kya photon ka mass hota hai?

  116. adhar bhut brahmaand ji maine 1 jagah padha hai ki maha visfot ki ghatna ke bad se ab tak pindo ki gati dhiri hoti ja rahi hai.
    kalpna kijie agar pindo ki gati dhiri hoti ja rhi hai to shayad koi bal is per kary ker raha hoga.
    becouse newton ke gati vishayak pratham niyam ke anusar use apni gati parivartit nhi kerni chahie kyo ki usr per koi bahe bal aropit nhi hota hai.
    maine apna prashan isi adhar per pu6 tha.
    aur sir ji apne jo kaha hai ki brahmaand ka vistar hone ke bad thanda hokr vistar hota jaega ya thanda hoker sthir ho jaega..

  117. sir ji kya ap sadharan shapeksh or vishesh shapeksh ki paribhasa hume btaenge.

  118. आपका सोचना स्वाभाविक है, कि बाह्य बल की अनुपस्थिति में गति में त्वरण अथवा दिशा में परिवर्तन होना संभव ही नहीं है। गति अथवा उसकी दिशा में परिवर्तन, आरोपित बाह्य बल की उपस्थिति में होता है। इस तरह बाह्य बल गति के प्रथम नियम की प्रमुख शर्त है। समझने हेतू एक कल्पना है। माना, प्रत्येक पिंड, निकाय और निर्देशित तंत्र बाह्य बल की अनुपस्थिति में अस्तित्व रखते हों। तब किसी भी पिंड, निकाय अथवा निर्देशित तंत्र में परिवर्तन होने का सवाल ही नहीं उठता होगा। और इस तरह से किसी पिंड या निकाय का सम्बन्ध गलती से भी किसी अन्य दूसरे पिंड या निकाय से नहीं हो सकता। क्योंकि हमारे द्वारा यह निर्धारित ही नहीं हो पाएगा कि आखिर पिंड गतिशील है अथवा स्थिर-अवस्था में है। वास्तव में परिवर्तन की माप को ही भौतिकता कहा जाता है। इसके कारण ही किसी भौतिकीय संरचना में भौतिकता के गुण देखने को मिलते हैं। इसके लिए जरुरी है कम से कम एक बाह्य बल की उपस्थिति…

    अधिकतर लोगों के द्वारा समझ लिया जाता है कि अत्यधिक ताप और दाब (अतिसूक्ष्म पिंड होने की दूसरी शर्त का कारक) के कारण महा-विस्फोट हुआ था। जबकि ताप और दाब महा-विस्फोट के बाद की प्रक्रिया का प्रमुख घटक था। इसी तरह महा-प्रसार में भी ताप और दाब कम होते- होते स्थिर हो जाएगा।

  119. Ashish sir ji apne mere prashn ka uttar nahi diya sadharan sapesh or vishesh sapesh ki paribhasa btaenge hume…..
    aj tak sirf main uske rules hi sunta aya hu kya uska deffenetion bta denge mere science teacher bhi sapesh ke bare me nahi jante hai.
    agar ap meri help kar denge to apki ati kripa hogi……

  120. Adhar bhut brahmaand ji mere hisab se sir ji sahi kah rhe h becouse jab hum kahte hai ki pindo ki gati dhiri ho rahi hai to isse ye tatpeya nhi hai ki humare purwajo ne( adimanaw ne ) koi yantra se dekh ker anuman laga ker apne wanshajo ko bta diye ye to 1 audharna hai jise hum kewal earth ke time se matpte hai.

  121. Adhar bhut brahmaand ji mere hisab se sir ji sahi kah rhe h becouse jab hum kahte hai ki pindo ki gati dhiri ho rahi hai to isse ye tatperya ye nhi hai ki humare purwajo ne( adimanaw ne ) koi yantra se dekh ker anuman laga ker apne wanshajo ko bta diye ye to 1 audharna hai jise hum kewal earth ke time se matpte hai.
    wese kai ese bhaotiki niyam hai jise hum kewal kalpana tak hi dekh sakte hai wastwik nahi.
    or usi me se 1 maha visfot hai.

    • दोस्त, आपकी इस बात से शायद सर भी सहमत नहीं होंगे। आप जिसे अवधारणा कह रहे हैं। यदि सिर्फ यह अवधारणा होती। तो मैं इस विषय पर अपना समय बर्बाद नहीं करता। हमारे द्वारा सही-गलत तय करने से कुछ भी निर्धारित नहीं हो जाता। और जब कहा जाता है कि महा-विस्फोट के कुछ समय उपरांत ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति वर्तमान में ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति से कहीं बहुत अधिक थी। तो यह बिंदु गलत नहीं है। इसका भौतिकीय अर्थ निकलता है। इसे गहराई से समझने पर आपको समय के रूपों को समझने का मौका मिलेगा। मैं अभी भी इस बात पर अडिग हूँ, कि गति समय की प्रमुख शर्त है। न की गति, समय का एक रूप है। मैं समझ रहा हूँ कि आप किस ओर संकेत कर रहे हैं। आपने शायद सैद्धांतिक विज्ञान को अभी तक समझा नहीं है।

      • Brother mera matlab galat mat samjhna mujhe sir ki baat samjh me ai kyoki unhone bahut hi a6e tarike se samjhaya par apki baat meri samjh me nahi so maine apna vichar spasht kiya mai science ke baare me zyada nahi janta hu.
        so wahi janne ke liye is blog par ata hu.
        agar ap apna vichar sahi tarike samjhaenge to mahrbani hogi.

      • सर, आप गति के द्वारा ब्रह्माण्ड की उम्र और विशेष तत्वों की निर्धारित आयु को किस तरह से परिभाषित करेंगे ?? जैसा कि पूर्व में आपने समय की इकाइयाँ घंटे और वर्ष को गति द्वारा परिभाषित किया था।
        तारिक जी, अभी हम केवल यही कहना चाहेंगे कि गति, समय की प्रमुख शर्त है। न की समय का दूसरा रूप..।

  122. गुरु जी,
    Touchscreen कैसे काम करती है?
    Capacitive Touch मे ऐसा क्या होता है , जिससे वो सिर्फ त्वचा के श्पर्श पर ही कार्य करता है?
    इसकी सनरचना कैसी होती है?

  123. rasayanik samikaran santulit karna example sahit vistar se sajhao ?

  124. sir ek sabse alag que. karna chahata hu. earth gol hai aur hum us par rahte hai. agar hum kisi tarah earth ke centre me chale jayen to us jagah par gravity 0 ho jayegi. kya hum fir wahan se wapas aa sakte hai ya nahi.

  125. क्या केवल सूर्य प्रकाश मेँ हि सात रंग होते हैँ?

  126. prathi par haam kaha rahte hai yadi haam prathvi ke upar rahate hai to prathvi ke cchor par jane ke baad niche nahi gir jayege

  127. सेल मेँ धारा क्यो कैथोड से एनोड की ओर होती है

  128. गुरूजी मैँ लेन्ज नियम के बारे मे पूर्ण जानकारी चाहता हू

  129. Ashish sir apne bataaya nahi ki sadharan sapesh or vishesh sapesh ki kya paribhas( deffinatio ) hai.
    or ye neutrinos kya hai.

  130. Sir ji kya ap sadharan sapesh or vishesh sapesh ki paribhasa bata denge.
    plz.plz.plz.

  131. महोदय में आइंस्टीन के नियम सापेक्षिकता का सिद्धान्त के बारे में विस्तार से जानना चाहता हु उदाहरण सहित तो बड़ी किपा होगी

  132. सरजीमुझे लगताहै कbigbeng कासीदांतगतहै । तारोके दूरफेलने काकारणये नहीकुछऔरहै । मुझे लगताहे कहमारापूरामांड एकबहतबड़ीगेलेसीहै । औरइसमांडकसारीगेलेसीउसीबड़ीगेलेसीम है ।ओरमांडके केम ि◌वशालपावरहै जोइसे िगतमान बनातीह

  133. Electron ki chaaker lgane ki speed kya hoti hai

  134. Sir ji kya ap mere prashn ka uttar denge…
    sadharan sapesh or vishesh sapesh ki paribhasa hindi me denge mujhe english thik se nahi ati hai.

  135. सर हम जानते हैँ कि आँक्सीजन दहन का पोषण करती हैँ और हाइड्रोजन 1 ज्वलनशील गैस हैँ तब जल जिसमेँ ये दोँनो गैस रहती हैँ मेँ आग क्योँ नहीँ लगती है?

  136. आदरणीय सर ! क्या भविष्य मेँ कभी न खत्म होने वाली ऊर्जा स्रोत की खोज की जा सकती है?

  137. Sir ji kya aap mere prashn ka uttar denge mujhe thik se nind bhi nahi aa pa rahi hai.
    special relativity or general relativity ki paribhasa or niyam kya hai?
    Ye mera priy visay hai…

  138. आशीष,
    ये कहा जाता है कि अगर कोई व्यकि किसी यान में बैठ कर प्रकाश के बराबर वेग से गति करे तो उसके लिए समय, पृथ्वी पर मौजूद व्यक्ति को महसूस होने वाले समय से कम होगा.

    मेरा सवाल है ‘प्रकाश के बराबर वेग’ से क्या तात्पर्य है?

    मान लीजिये मैं अपने यान के साथ एक ऐसे स्थान पर स्थित हूँ जहां मेरे आस पास और कोई भी पिंड-ग्रह-नक्षत्र नहीं है.
    इस जगह पर मैं अगर स्थिर हूँ या गतिशील हूँ इन दोनों स्थितियों में फर्क कैसे किया जा सकता है.
    मेरा वेग चाहे कितना ही अधिक हो उसका कोई अस्तित्व कैसे होगा जब मेरे आस पास कोई ऐसा पिंड है ही नही जिसके सापेक्ष मई मैं अपने वेग का आंकलन कर सकूँ?

  139. sir aapki current knowledge k liye thnx….sir BCA and MCA course ke kaun kaun se scope h

  140. guru ji, padarth sthaan gherta hai, sthaan ke abhaav me padarth ka astitva sambhav nahi. yah sthaan ya jagah aaya kahan se?

  141. suryoday se pahle avam suryasta ke baad surya laal kyun dikhaye deta hai……………….???????????????????

    • सूर्य प्रकाश मे सभी रंगो का समावेश होता है। सूर्यास्त और सूर्योदय के समय सूर्य किरण एक कोण से पृथ्वी के वातावरण मे प्रवेश करती है, जिससे उन्हे ज्यादा दूरी तय करनी होती है। ज्यादा दूरी तय करने पर लाल रंग के अतिरिक्त अन्य रंगों की किरणे वातावरण के कणो से टकरा कर बिखर जाती है। ध्यान रहे कि लाल रंग कि किरणो की आवृत्ती सबसे कम होती है जिससे उनके बिखरने की संभावना अन्य रंगों से कम होती है। सूर्यास्त और सूर्योदय के समय हमारी आंखो तक केवल लाल रंग की किरण पहुँच पाती है जिससे सूर्य लाल रंग का दिखायी देता है।

  142. sir ji meri samajh me ye nahi ata ki jab prakash sadao aik hi gati se chalta hai to schoolo me ye kyo bataya jat hai ki prakash ki alag alag madhyyam me alag alag gati hoti hai ap ye bataie ki prakash ki pratyek madhyyam me gati aik si kyu hoti hai

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